यूँ तो मिलना-जुलना चलता रहता है मिलकर उनका जाना खलता रहता है उसकी आँखों की चौखट पर एक दिया
दिन में जो भी प्यारा मंज़र लगता है अंधियारे में देखो तो डर लगता है आँगन में कर दीं इतनी दीवार खड़ी
वो समय कैसा कि जिसमें आज हो पर कल ना हो वो ही रह सकता है स्थिर हो जो पत्थर जल ना हो हाथ में लेकर भरा बर्तन ख़ुशी औ ग़म का जब