सूनापन रातों का, और वो कसक पुरानी देता है टूटे सपने,बिखरे आँसू,कई निशानी देता है दिल के पन्ने इक-इक करके खुद-ब-खुद खुल जाते हैं
फिर नये मौसम की हम बातें करें साथ खुशियों, ग़म की हम बातें करें जगमगाते थे दिए भी साथ में
झरे हों फूल गर पहले, तो फिर से झर नहीं सकते मुहब्बत डालियों से फिर, कभी वो कर नहीं सकते कड़ी हो धूप सर पर तो, परिंदे हाँफ जाते हैं
बीता मेरे साथ जो अब तक, वो बतलाने आई हूँ जीवन के इस उलझेपन को मैं सुलझाने आई हूँ पाया जिससे जैसा भी था, मैंने अपने जीवन में
किसी के आँसुओं पर, ख़्वाब का घर बन नहीं सकता भरी बरसात में फिर, शामियाना तन नहीं सकता दुआओं का अगर हो हाथ सर पर तो भला डर क्या
लम्हा इक छोटा सा फिर उम्रे दराजाँ दे गया दिल गया धड़कन गयी और जाने क्या-क्या ले गया वो जो चिंगारी दबी थी प्यार के उन्माद की
कभी तुम दूर जाते हो, कभी तुम पास आते हो कभी हमको हँसाते हो, कभी हमको रुलाते हो हमारे दिल के हर कोने में, रहते हो अगर तुम ही
यूँ जीना आसान नहीं है,इस दुनिया के इस मेले में ईश के दर पे रख दे सर को, क्यूँ तू पड़े झमेले में नाखूनों की बाड़ लगी है,उगते जहाँ विरोध बहुत
किसी की आँख में आँसू, किसी की आँख में सपने पराए हैं कहीं घर के, कहीं अनजान भी अपने बिछाई राह में तुमने, भले शीतल हवाएँ हों
अब अँधेरों से लिपटकर यूँ ना रोया कीजिए हो घड़ी भर के लिए पर, कुछ तो सोया कीजिए बन्द रहने दो ये आँसू,अपने दिल की सीप में
अकेला बीज धरती से मिलके फूटा खिलके।