सुनाएँ ग़म की किसे कहानी हमें तो अपने सता रहे हैं। हमेशा सुबहो-शाम दिल पर सितम के खंजर चला रहे हैं।। न कोई इंग्लिश न कोई जर्मन न कोई रशियन न कोई टर्की।
कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएँगे आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे। हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से