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वृन्द के नीति-दोहे

स्वारथ के सब ही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं ।
जैसे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ।। १ ।।
मान होत है गुनन तें, गुन बिन मान न होइ ।

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कवि वृन्द के दोहे 

जाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस। 
रीते सरवर पर गये, कैसे बुझत पियास॥ 
दीबो अवसर को भलो, जासों सुधेरै काम। 

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वृन्द का जीवन परिचय