स्वारथ के सब ही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं । जैसे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ।। १ ।। मान होत है गुनन तें, गुन बिन मान न होइ ।
जाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस। रीते सरवर पर गये, कैसे बुझत पियास॥ दीबो अवसर को भलो, जासों सुधेरै काम।