वृन्द साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 2
वृन्द के नीति-दोहे
स्वारथ के सब ही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं ।
जैसे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ।। १ ।।
मान होत है गुनन तें, गुन बिन मान न होइ ।
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जैसे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ।। १ ।।
मान होत है गुनन तें, गुन बिन मान न होइ ।
कवि वृन्द के दोहे
जाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस।
रीते सरवर पर गये, कैसे बुझत पियास॥
दीबो अवसर को भलो, जासों सुधेरै काम।
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रीते सरवर पर गये, कैसे बुझत पियास॥
दीबो अवसर को भलो, जासों सुधेरै काम।