मैं अपनी कविता जब पढ़ता उर में उठने लगती पीड़ा मेरे सुप्त हृदय को जैसे स्मृतियों ने है सहसा चीरा उर में उठती एक वेदना
उमड़ा करती है शक्ति, वहीं दिल में है भीषण दाह जहाँ है वहीं बसा सौन्दर्य सदा सुन्दरता की है चाह जहाँ उस दिव्य सुन्दरी के तन में
दीन दुखी मज़दूरों को लेकर था जिस वक्त जहाज सिधारा चीख पड़े नर नारी, लगी बहने नयनों से विदा-जल-धारा भारत देश रहा छूट अब मिलेगा इन्हें कहीं और सहारा
जो कुछ लिखना चाहा था वह लिख न कभी मैं पाया जो कुछ गाना चाहा था
धवल सिन्ध-तट पर मैं बैठा अपना मानस बहलाता फीजी में पैदा हो कर भी मैं परदेसी कहलाता यह है गोरी नीति, मुझे सब भारतीय अब भी कहते
गली-गली में घूमे नसेड़ी दुनिया यहाँ मस्तानी गज़ब यह सूवा शहर मेरी रानी। जिसकी जेब में पैसा नहीं है कोई न पूछे पानी