न्यूज़ीलैंड में गांधी: स्मृति, प्रतीक और अहिंसक विरासत

रचनाकार: रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

न्यूज़ीलैंड की राजधानी वेलिंगटन में महात्मा गांधी की आदमकद कांस्य प्रतिमा,

न्यूज़ीलैंड की राजधानी वेलिंगटन में, रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थापित महात्मा गांधी की आदमकद कांस्य प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि अहिंसा, जन-संपर्क और नैतिक प्रतिरोध की जीवंत प्रतीक है। यह प्रतिमा भारत सरकार द्वारा उपहार स्वरूप प्रदान की गई थी और इसका औपचारिक अनावरण 2 अक्टूबर 2007 को गांधी जयंती के अवसर पर किया गया।

इस स्थान का चयन अपने आप में अर्थपूर्ण है। गांधी जी आम जनता से सीधे जुड़ने के लिए ट्रेनों और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना पसंद करते थे। इसलिए रेलवे स्टेशन के सामने उनकी प्रतिमा का होना उनके जीवन-दर्शन और आचरण—दोनों का प्रतीकात्मक विस्तार है। इस उत्कृष्ट कांस्य प्रतिमा का निर्माण प्रसिद्ध भारतीय मूर्तिकार गौतम पाल ने किया है, जिनकी कृतियाँ संवेदनशील यथार्थ और गरिमा के लिए जानी जाती हैं।

हर वर्ष 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) और 30 जनवरी (महात्मा गांधी की पुण्यतिथि) को इस स्थल पर भारतीय उच्चायोग और स्थानीय समुदाय द्वारा पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। ये आयोजन न केवल श्रद्धांजलि हैं, बल्कि अहिंसा और मानवता के सार्वभौमिक मूल्यों की पुनःस्मृति भी हैं।

ऑकलैंड के महात्मा गांधी के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर गांधी जी की एक आदमकद प्रतिमा लगी है। इसे ऑकलैंड इंडियन एसोसिएशन द्वारा भारत से मंगवाया गया था और 2 अक्टूबर 2005 को गांधी जी की परपोती, लीला गांधी, द्वारा इसका अनावरण किया गया था। 

क्या गांधी जी माओरी नेताओं से प्रेरित थे?

इस प्रश्न के साथ इतिहास की एक रोचक परत खुलती है—“गांधी से पहले गांधी”। न्यूज़ीलैंड के तारानाकी क्षेत्र में स्थित परिहाका (Parihaka) बस्ती के नेताओं— ती फिती ओ रोंगोमाई और तोहू काहकाई (Te Whiti o Rongomai and Tohu Kākahi ) ने 1870 के दशक के अंत में ही अहिंसक प्रतिरोध की युक्तियों का प्रयोग किया था। यह समय दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के पहले सविनय अवज्ञा आंदोलन से भी पहले का है।

ऐसे संकेत और प्रमाण मिलते हैं कि गांधी जी परिहाका के बारे में जानते थे। बताया जाता है कि परिहाका की बस्ती का दौरा करने वाला एक आयरिश प्रतिनिधिमंडल बाद में गांधी जी से मिला और उसने तारानाकी के लोगों द्वारा किए गए शांतिपूर्ण प्रतिरोध के प्रसंग उनके साथ साझा किए। यह संभव है कि इन कथाओं ने गांधी जी की सोच को और दृढ़ किया हो—या कम से कम उन्हें यह विश्वास दिया हो कि अहिंसा केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि व्यवहारिक शक्ति भी है।

इस प्रकार, परिहाका और महात्मा गांधी के बीच का संबंध अहिंसक प्रतिरोध की एक ऐतिहासिक कड़ी बनता है—ऐसी कड़ी, जो सीमाओं और संस्कृतियों से परे मानव गरिमा की साझा भाषा बोलती है। वेलिंगटन में गांधी की प्रतिमा इसी वैश्विक संवाद की मूक, किंतु सशक्त साक्षी है।

जून 1879 में ती फिती ओ रोंगोमाई ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन (British colonial authorities) और उसके द्वारा लागू किए गए उपनिवेशवादी भूमि-अधिग्रहण तंत्र के विरुद्ध अहिंसक प्रदर्शन का आह्वान करते हुआ अपने माओरी कबीले को संबोधित करते हुए हल जोतनेवाले अपने साथियों से कहा--“जाओ, अपने हाथ हल पर रखो और पीछे मुड़कर मत देखो। यदि कोई बंदूकें और तलवारें लेकर आए, तो भयभीत मत होना। यदि वे तुम्हें मारें, तो तुम प्रतिकार मत करना। यदि वे तुम्हें घायल करें, तो हतोत्साहित मत होना—कोई और इस अच्छे कार्य को आगे बढ़ा देगा। यदि बसने वालों के मन में बुरे विचार भर जाएँ, और वे पुराने युद्ध की तरह अपनी खेती छोड़कर नगर चले जाएँ, तो तुम उनके घरों में प्रवेश मत करो, उनके सामान या मवेशियों को हाथ मत लगाओ। मेरी नजर सब पर है।”

अहिंसक अशांति के उस दौर में सैकड़ों माओरी लोगों को गिरफ़्तार किया गया और बिना किसी मुक़दमे के उन्हें कारावास में रखा गया।

-रोहित कुमार हैप्पी
[भारत-दर्शन]