पल की ख़बर नहीं .. | कहानी 

रचनाकार: गिरीश पंकज

पल की ख़बर नहीं ..!

किसने सोचा था उस अंतिम उड़ान के बारे में। और यही जीवन की सच्चाई है। कई बार हम जो कुछ सोचते हैं, वह चाह कर भी पूरा नहीं हो पाता। इसी का नाम  तो जीवन है। किसी शायर ने कहा है "हजारों ख्वाहिश है ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले"। किसी ने यह भी कहा है "सामान सौ बरस का, पल की खबर नहीं।" दरअसल हम सब की जिंदगी अधूरी ख्वाहिशें का कोलाज है। अधूरी ख्वाहिशें..अधूरी यात्राएँ..और अधूरी उड़ान भी!... हम चाहते हैं कि हमारा सोचा हुआ सब कुछ पूरा हो लेकिन कहीं-न-कहीं एक अधूरापन जीवन में अभिशाप की तरह चस्पा हो जाता है। हम जाना कहीं और चाहते हैं, लेकिन कहीं और निकल जाते हैं। यही तो हुआ पिता रामफल और बेटी अदिति के साथ।

बहुत दिनों से बिटिया अदिति जिद कर रही थी कि पापा एक बार तो लंदन आ जाओ। देख लो हमारा घर.. मैंने कुणाल के साथ मिलकर अपनी घर-गिरस्ती कैसी जमाई है। आइए, आपको पूरे ब्रिटेन के सैर कराएँगे। कितना सुंदर देश है। यहाँ आपको भारतीयों की कमी नहीं मिलेगी। यहाँ से वहाँ तक हर जगह भारतवंशी छाए हुए हैं। साउथहॉल देख कर आपको लगेगा, आप भारत में ही हैं। यहाँ स्वामीनारायण का भव्य मंदिर देखकर आपको बहुत अच्छा लगेगा। हम लोग यहाँ अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, अपने त्यौहार सभी मानते हैं। नौकरी की विवशता है इसलिए यहाँ  चले आए, लेकिन अपना देश तो अपना देश है। बस, एक बार आकर आप हम सबको आशीर्वाद देकर वापस चले जाइएगा। हमें संतोष होगा।"

बिटिया की बात सुनकर रामफल बहुत भावुक हो गए। उन्होंने कहा, "ठीक है बेटा! मैं जल्द ही टिकट कटा कर पहुँचता हूँ। तुम लोगों के कारण मेरा वीजा तो पहले ही बन चुका है।" 

अदिति ने रूठते हुए कहा,  "आपको टिकट-फिकट काटने की जरूरत नहीं। आपका दामाद इतना सक्षम है कि वह आपके आने-जाने की व्यवस्था कर सकता है। आपका टिकट हम भेज रहे हैं। बस, आपको मन बनाकर यहाँ चले आना है। कम-से-कम एक महीना आपको हमारे साथ रहना है। इस बीच आपको ब्रिटेन की हर वो जगह हम दिखाएँगे, जिसे बाहर से आने वाले लोग देखते ही हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी है, लेखक शेक्सपियर का घर है, टेम्स नदी के किनारे घूमने लायक हाइड पार्क है। ब्रिटिश म्यूजियम है, विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम है। ब्रिटिश लाइब्रेरी भी देखने लायक है। बकिंघम पैलेस है। लंदन टावर है। बर्मिंघम भी देखने लायक शहर है। कई सौ साल पुरानी आलीशान इमारतें देखने लायक हैं। शहर के बीच में बहने वाली नहरें देखकर आपको आनंद आ जाएगा। बस आप आ जाइए।"   

बेटी का उत्साह देखकर रामफल गदगद हो गए। आज के ज़माने में अपनों से इतना प्यार मिले, तो कोई भी भावुक हो जाएगा। रामफल भी हो गए। उनकी आँखों में आँसू आ गए। 

...और वह इंतजार करने लगे उस पल का कि कब बेटी-दामाद टिकट भेजें और वह उड़कर उनके पास पहुँच जाएँ। उन्होंने पूरी कॉलोनी में ढिंढोरा पीट दिया कि मैं अपनी बिटिया के पास लंदन जा रहा हूँ। यह सुनकर पड़ोसी सुमन कुमार बोले, "धन्य हो रामफल कि आपको ऐसी बेटी मिली। वरना विदेश जाने के बाद तो क्या बेटे--क्या बेटी, अपने माता-पिता को सब भूल जाते हैं। लेकिन आपकी बेटी आपको याद करती रहती है और अब तो अपने पास भी बुला रही है. बड़े नसीब वाले हो।"

रामफल ने कहा, "भाई मेरे, वैसे तो बेटे ने भी अमेरिका से फोन किया था कि जल्द आपको अपने पास बुलाऊँगा लेकिन उसका यह जल्द अब तक नहीं आया। मगर कोई बात नहीं। जल्दी ही जल्द आएगा, ऐसा विश्वास है। लेकिन बेटी ने तो कंफर्म कर दिया है कि वह एक-दो दिन में टिकट भेज देगी।"

...और सचमुच एक सप्ताह बाद कोरियर से रामफल का टिकट आ गया। वीजा तो पहले ही मिल चुका था। बस, सामान पैक करके हवाई जहाज में बैठना भर था। बेटी के पास जा रहे हैं, खाली हाथ तो जा नहीं सकते इसलिए बेटी-दामाद और पोते-पोतियों के लिए कुछ खरीदारी करनी थी, इसलिए रामफल ने अपनी पत्नी सुजाता के साथ बाजार जाकर कपड़े-लत्ते खरीद लिए.बच्चों के लिए खिलौने भी ले आए। सुजाता का मन भी बेटी के पास जाने का था, लेकिन चलने-फिरने में अशक्त होने के कारण वह चाह कर भी नहीं जा सकी। इसका उसे दुख था। लेकिन संतोष था कि अदिति के पाप तो जा रहे हैं। वहाँ पहुँचकर वीडियो कॉल करके बेटी दामाद का घर भी दिखा देंगे। मैं इसी में खुश हो लूँगी। उधर अदिति भी बहुत खुश थी कि पापा आएँगे और महीने भर उनके साथ रहेंगे। उसने भी पापा के लिए कुछ कपड़े खरीद लिए। भारत में तो पापा सादे पैंट-शर्ट में रहते हैं। यहाँ मैं उन्हें ब्रांडेड कंपनी की जींस पहनाऊँगी, लाल रंग की शर्ट भी। वह पापा को खूब फबती है। वही खरीदूँगी, यह सोचकर उसने बाजार जाकर दो जींस के पेंट और दो शर्ट खरीद कर पहले से रख ली। फिर महीने भर का कार्यक्रम भी बना लिया कि किस दिन पापा को कहाँ ले जाना है। आसपास के रहने वाले भारतीयों से भी पापा की मुलाकात करवानी है। एक दिन इंडिया हाउस में ग्रैंडगाला पार्टी देनी है। अदिति ने जब पड़ोस के ब्लॉक में रहने वाली सुष्मिता को अपने पापा के आने की जानकारी दी तो वह भी बहुत खुश हुई। उसने कहा, " अरे, कमाल है. मेरे मदर-फादर भी इसी तारीख में अहमदाबाद से उड़ान भरने वाले हैं। कितना अच्छा लगेगा कि अपने देश के लोग परदेस में आकर एक-दूसरे से मिलेंगे.साथ-साथ घूमेंगे फिरेंगे।"        

अदिति ने कहा, "यह बहुत सुंदर को-इंसीडेन्स है। हमें साल में एक-दो बार ऐसा करना चाहिए। अपने बुजुर्गों को अपने पास बुला लेना चाहिए। बिना किसी स्वार्थ के। वरना लोग तो अपने बुजुर्गों को विदेश सिर्फ नौकर-चाकर समझ कर बुलाते हैं, जबकि होना यह चाहिए कि हम उनकी सेवा करें। उनके आराम का ख्याल रखें। उनका शोषण न करें।"  

अदिति की बात सुनकर सुष्मिता ने कहा, "तुमने मेरे मन की बात कह दी। आजकल हम सब यही देख रहे हैं कि बूढ़े माता-पिता का इस्तेमाल बच्चे एक टूल की तरह करते हैं। कितने खुदगर्ज हो गए हैं इस दौर के बच्चे। हालांकि माता-पिता भी यह सब समझते हैं लेकिन वे किसी से कहते नहीं। बस मन में रखते हैं और बच्चे समझते हैं कि उन्होंने माता-पिता को उल्लू बना दिया। जबकि ऐसा है नहीं। खैर, कोई बात नहीं। हम अपने माता-पिता के साथ भूलकर भी कभी ऐसा न करें तो ठीक है। अदिति! हम उनके आने का इंतजार करते हैं और उस दिन को अच्छे से सेलिब्रेट करेंगे।"  

इतना बोलकर दोनों अपनी-अपनी खरीदारी में लग गई। वे अक्सर बाजार में एक-दूसरे से टकराते और कहते, "जमकर खरीदारी हो रही है!" फिर हँस पड़ती।

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समय बीतता गया। और वह दिन भी आ गया जब रामफल अपने साजोसामान के साथ तीन घंटे पहले हवाई अड्डे पहुँच गए। चेक-इन किया। अपना सूटकेस बैगेज ड्राप के हवाले किया और कंधे पर एक थैला लटकाए सुरक्षा जॉच की ओर चल पड़े। सुरक्षा जॉच के समय कुछ दिक्कत हुई। सुरक्षा कर्मी ने उनका सामान चेक किया तो बोला, "अपना बैग दिखाइए!"

रामफल में बैग दिखा दिया। उसमें एक छोटी-सी कैची निकली।  

सुरक्षा कर्मी ने कहा, "आप इसे नहीं ले जा सकते।"

रामफल ने कहा, " छोटी-सी तो कैची है।"

सुरक्षाकर्मी ने गंभीर स्वर में कहा, "छोटी हो या बड़ी, विमान के भीतर इसे ले जाने की इजाजत नहीं है। इसे आपको यही जमा करना पड़ेगा।"

मजबूरन रामफल को कैची जमा करनी पड़ी। फिर वे आगे बढ़ गए। फ्लाइट के लिए अभी भी एक घंटा बाकी था। वहाँ एक कुर्सी में बैठकर उन्होंने बेटी को वीडियो कॉल किया। बेटी ने प्रसन्न होकर कहा, "प्रणाम पापा! वाह, आप एयरपोर्ट में हैं। बढ़िया..."  फिर उसने फोन कुणाल को दे दिया। उस ने कहा, "वेलकम पापा! कल सुबह हम आपका गेटविक एयरपोर्ट पर इंतजार करेंगे।"

रामफल ने कहा, "बिल्कुल!कल सुबह मिल रहे हैं।" 

फिर उन्होंने फोन काट दिया।    

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दोपहर 1:30 बजे की फ्लाइट थी, जो दूसरे दिन सुबह लंदन पहुँचने वाली थी। रामफल बेहद खुश थे कि कल दो साल बाद बिटिया से मुलाकात होगी। दामाद से भी भेंट होगी। दो प्यारे बच्चों के साथ रहने का सौभाग्य मिलेगा। बस नौ-दस घंटे की बात है। इन्हीं खयालों में खोए-खोए समय कब बीत गया पता ही न चला। उनका ध्यान बार-बार उसी अनाउंसमेंट की ओर था कि कब उन्हें आवाज़ सुनाई दे कि बोर्डिंग का समय हो गया है। यानी हवाई जहाज में बैठने का समय। जैसे ही यह घोषणा हुई, वे उठे और सभी यात्रियों के साथ कतार में लग कर विमान के भीतर प्रवेश कर गए। अपनी सीट देखी, और विंडो वाली सीट पर जाकर बैठ गए। उनके बगल वाली सीट में बैठे सज्जन सुरेश कुमार भी उन्हीं की उम्र के आसपास थे. पता चला वे भी अपने बेटे राहुल से मिलने लंदन जा रहे हैं। प्लेन में ज्यादातर लोग अपने परिजनों से मिलने ही जा रहे थे। कुछ ब्रिटेन के ही मूल निवासी थे, जो भारत घूमने आए थे।    

रामफल ने प्रसन्न हो कर कहा, "अच्छा साथ हो गया। नौ घंटे आपके साथ गप्पे मारते हुए समय का पता ही नहीं चलेगा।" 

फिर रामफल ने अपने बारे में सब कुछ बताया। सुरेश कुमार ने भी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में सहजता के साथ बता दिया। दोनों बुजुर्गों में देखते-ही-देखते गहरी आत्मीयता हो गई।

रामफल बता रहे थे, "एक महीना बेटी के पास रहकर वापस लौटूंगा और विवेक विहार के 'गोल्डन टॉवर' में एक नया फ्लैट बुक किया है, उसमें  शिफ्ट हो जाएँगे। फ्लैट दसवें माले पर है। लिफ्ट की सुविधा है। अभी हम जहाँ रहते हैं,  वह पुरानी कॉलोनी है। तीसरी मंजिल में घर है। पत्नी को और मुझे भी सीढ़ी चढ़ने में दिक्कत होती है। इसलिए इसे बेचकर फोर बीएचके का फ्लैट ले लिया है। बेटी-दामाद ने भी कुछ मदद की है। वहाँ हम मजे से रहेंगे।"

अचानक रामफल ने कुर्सी के सामने रखी मैगजीन उठाकर पंखे की तरह झलते हुए कहा, "लगता है, प्लेन का एसी बंद है। गर्मी लग रही है।"

सुरेश कुमार भी बोले, "हाँ, काफी देर से एसी बंद है. देखिए न, सब कितने परेशान हैं। फ्लाइटवालों को ध्यान देना चाहिए। इंटरनेशनल फ्लाइट है। बताइए भला, इसमें ये हालत है। लोगों ने कंप्लेंट भी की मगर कोई सुनवाई नहीं। अपने यहाँ यही तो दिक्कत है। खैर...यह बहुत अच्छी बात है कि आप विवेक विहार में मकान ले रहे हैं।  मेरा फ्लैट भी आपके पास ही है। लंदन से लौटने के बाद हम दोनों आपस में मिला करेंगे। अच्छा लगेगा। मैं भी एक महीने बाद वापस आ जाऊँगा।"

दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर नोट कर लिया. तभी पायलट की घोषणा सुनाई दी। "अब हम उड़ान के लिए तैयार हैं। अहमदाबाद से लंदन की उड़ान नौ घंटे में पूरी होगी... दूसरे दिन सुबह 10:45 बजे हम गेटविक एयरपोर्ट पर लैंड करेंगे...आप सब की यात्रा मंगलमय हो। यही शुभकामना है।" 

...और धीरे-धीरे प्लेन रनवे में आगे बढ़ने लगा... रामफल रोमांचित होकर बाहर के दृश्य को देख रहे थे... प्लेन आगे बढ़ रहा था और धीरे-धीरे उसने टेक ऑफ किया, फिर देखते-ही-देखते धरती से चार-पाँच फीट ऊपर तक पहुँच गया. रामफल बच्चों की तरह प्रसन्न होकर खिड़की से बाहर देखते हुए कल्पना करने लगे कि कल सुबह लंदन में होंगे। 

तभी.... विमान में यकायक शोर बढ़ गया... सभी यात्रियों के चेहरे पर दहशत दिखाई देने लगी.. कोई कह रहा था, यह विमान ऊपर जाने की बजाय नीचे क्यों जा रहा है... पता नहीं, क्या हो रहा है.. अरे! यह तो बिल्कुल नीचे ही नीचे चला जा रहा है... ओह भगवान! यह क्या हो रहा है?.. सभी यात्री  भगवान को याद करने लगे। उधर पायलट की का अनाउंसमेंट सुनाई दिया। "चिंता मत कीजिए... विमान में कुछ तकनीकी खराब आ गई है... हम इसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं..." लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ... और देखते-ही-देखते आधे मिनट में ही प्लेन पहले एक पेड़ से टकराया और पास ही खड़ी बिल्डिंग में जा घुसा...

रामफल के हृदय की धड़कन बढ़ चुकी थी... उन की आँखों में आँसू थे। उन्हें समझ में आ गया था कि वह मृत्यु के मुँह में समा रहे हैं.. क्या सोचा था, पल भर में यह क्या हो गया। बेटी के पास जा रहे थे लेकिन अब तो किसी अनंत यात्रा की ओर निकलने का समय आ गया है... वर्षों बाद हवाई यात्रा कर रहे थे, जो अब उनकी अंतिम उड़ान बन चुकी थी। उनकी क्या, प्लेन में सवार सब की अंतिम उड़ान! जो  जीवन के 'रन वे' से 'टेक ऑफ़' करने के बाद कभी 'लैंड' नहीं होने वाली थी।

रामफल ने हाथ जोड़कर आँखें बंद कर लीं, और अपने ईश्वर को याद करने लगे।

फिर जोर का धमाका हुआ और विमान... आग के गोले में तब्दील हो गया। और इस के साथ ही रामफल समेत सारे यात्री जल कर खाक हो गए...

उधर लंदन में बैठी बेटी टीवी चैनलों पर जलते विमान को देखकर बुरी तरह चीख पड़ी, "अरे! यही तो वह फ्लाइट है, जिससे पापा जी आने वाले थे...! यह क्या हो गया...?  कहीं मैं कोई सपना तो नहीं देख रही..? …नहीं-नहीं, यह सपना नहीं, हकीकत है...यह वही विमान है, जिसमें उसके पापा सवार थे... हे भगवान!.. ये कैसा अनर्थ!!.. तीस सेकेण्ड भी नहीं हुए थे कि प्लेन क्रेश हो चुका था... और उसके साथ अदिति के,  उसके पापा के, विमान में सवार दो सौ से अधिक यात्रियों के सारे सपने क्रेश हो चुके थे। 

अदिति का रो-रो कर बुरा हाल था। आँसुओं का सैलाब उमड़ आया था। लोग उसे संभाल नहीं पा रहे थे। अंततः रोते-रोते वह कब बेहोश हो गई, उसे पता ही न चला। 

-गिरीश पंकज
 सेक़्टर -3, एचआईजी - 2/2, 
 दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010
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