दरख्त | लघुकथा

रचनाकार: बलराम अग्रवाल

“आप कहते हैं कि घर के बाहर खड़े आपके दरख्त को ये अपने घर उठा ले गये!”

“जी हुजूर!”

“किस फल का दरख्त था?”

“फलदार नहीं था हुजूर!”

“किसी फूल का था?”

“वह फूलों वाला भी नहीं था!”

“ओह! तो उसके पत्ते काम आते होंगे?”

“वर्षों से सूखा खड़ा था जनाब, लेकिन था तो हमारा ही!”

‘हम्म्म्… ईंधन का लालच!’ सोचते हुए मजिस्ट्रेट ने प्रतिवादी से पूछा, “आपको कुछ कहना है?”

“बीवी-बच्चों ने उसकी सेवा-टहल करना, उसे खाद-पानी देना शुरू किया है हुजूर!” प्रतिवादी ने कहा, “कोंपलें फूटने की उम्मीद-सी जागी है. इसकी तरफ गया तो…!”

“हमारी तरफ जिये या मरे…” यह सुनते ही पहला दूसरे पर बिफर पड़ा, “हमारा बुजुर्ग पड़ोसी के टुकड़ों पर पले, यह बेइज्जती हम सह नहीं सकते!”

मजिस्ट्रेट आंखें फाड़कर उनकी ओर देख उठा. अकेला और बेगाना-सा, ऐसा ही एक दरख्त उसके अपने बरामदे में भी पड़ा है, वर्षों से! अपने खुद के भाई भी उसकी ओर से नजरें फेरकर निकल जाते हैं!!

-बलराम अग्रवाल