ज़िंदगी मुझको सुन रही हो क्या
तुम यक़ीनन ही ज़िंदगी हो क्या
क्यों तबाही ये इतनी..ऐ कुदरत
ख़ूब ग़ुस्से से भर उठी हो क्या
चांदनी ने ये धूप से पूछा..!
इस क़दर आग.. दिलजली हो क्या
ऐ सियासत ज़हर की ये बारिश
नफ़रतों पर ही अब टिकी हो क्या
चीखती है जो हर घड़ी हर पल
दिल में बैठी वो खामुशी हो क्या
जिसको सुनकर कभी न सुन पाया
रूह की बात अनसुनी हो क्या
झूठ कहने लगा सचाई से
मुझसे कुछ कुछ डरी डरी हो क्या
इश्क को आजमाए जो हर पल
ऐसे आशिक़ से आशिक़ी हो क्या
ख़ूब सुविधाएं तो जुटा ली हैं
सच बताना..मगर सुखी हो क्या
जो भी होना था हो चुका वह तो
अब दुखी हो के सोचती हो क्या
तुमने मनवा लिया कि सब थे ग़लत
ख़ुद से पूछो कि तुम सही हो क्या
दर्द बस्ती का जो न महसूसे
उससे फिर सच्ची शायरी हो क्या..!
क्यों अंधेरे हैं हर तरफ फैले
बस दिखावे की रोशनी हो क्या
काम शैतानों जैसे क्यों हैं फिर
सिर्फ कहने को आदमी हो क्या
-लक्ष्मी शंकर वाजपेयी