दोगलों का इलाज | व्यंग्य

रचनाकार: प्रो. राजेश कुमार

दोगलों का इलाज - व्यंग्य

यह कहानी एक डॉक्टर की है, और इसके साथ ही इसमें सामाजिक कुरीति भी जुड़ गई है, तो आप देख सकते हैं कि लेखक ने इसमें कितना नवोन्मेष कर दिया है। तो हमारे जो डॉक्टर थे, वे ईएनटी स्पेशलिस्ट थे यानी ओटोलरींगोलॉजिस्ट थे, मतलब ऐसे कि उनका नाम लेने में ही गले का बैंड बज जाए। और ये सचमुच बड़े स्पेशलिस्ट मतलब विशेषज्ञ थे। इन्हें आप अपने हिंदी भाषा के ऐसे विशेषज्ञ की तरह मत समझें, जो हिंदी के उच्चारण पर ज़ोर-शोर से भाषण फटकारते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि विशेषज्ञ में जो ष आता है, उसका उच्चारण तालव्य होता है या दंत्य या फिर मूर्धन्य और वे इसका उच्चारण मूर्धन्य ही करते हैं। सरल शब्दों में कहें, तो ये ष को स कहते हैं – विसेसज्ञ, और जब उन्हें बताया जाता है कि यह विशेषज्ञ होता है, तो वे कहते हैं कि हाँ, वही तो बोला है और बोलकर दिखाते हैं - विसेसज्ञ।

बहरहाल इस विसेसज्ञ... मतलब विशेषज्ञ डॉक्टर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत में बहुत इज़्ज़त थी यानी इनकी नियुक्ति परिवारवाद से नहीं हुई थी। बड़े-बड़े मुद्दों पर दूसरे डॉक्टर इसने सलाह लिया करते थे, और अंतरराष्ट्रीय जरनलों में उनके शोध प्रकाशित होते थे।

लेकिन पिछले दिनों उन्हें एक बहुत बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा। उनके पास साहित्य सभा के प्रधान अध्यक्ष अपने गले का इलाज करवाने के लिए आए। वैसे तो प्रधान और अध्यक्ष लगभग समान अर्थ रखते हैं, लेकिन ज़ोर देने के लिए उन्होंने पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सहारा लिया था।

तो डॉक्टर ने अध्यक्ष के कद का ध्यान रखते हुए, बहुत सावधानी से उनके गले का इलाज भी किया। लेकिन अध्यक्ष तो हाय-हाय करते हुए अगले ही दिन वापस आ गए कि उनका गला तो वैसे का वैसा है। उन्होंने सबके सामने डॉक्टर को डाँटा भी कि आपने कैसा इलाज किया है और कहा कि आप सचमुच के डॉक्टर हैं या आपकी डिग्री... खैर जाने दीजिए।

डॉक्टर उनकी बात सुनकर बहुत आहत हुए और साथ ही चकित भी हुए यानी उनके साथ भाव शबलता की स्थिति हो गई। उन्हें आज तक ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा था कि उनका रोगी वापस आ जाए। अब तो उन्होंने अध्यक्ष के इलाज के लिए बहुत सारा शोध किया, और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने साथी डॉक्टरों से भी इस बारे में सलाह भी ली, और यहाँ तक कि ग्रोक एआई से भी पूछा। लेकिन सभी ने उन्हें बताया कि उनका इलाज बिल्कुल सही है और उनकी समझ में नहीं आया कि वे उस डॉक्टर को क्या सलाह दें, जिनसे वे खुद सलाह लेते थे।

उधर साहित्य सभा के अध्यक्ष का बहुत नाम था। उनका तो दुनिया में डंका बजता था, जिसकी जानकारी उनका गोदी मीडिया बराबर प्रसारित करता रहता था। अध्यक्ष जी बहुत ज़बरदस्त वक्ता भी थे। वे संभाषण कला में इतने निपुण थे, मानो सरस्वती उनकी जुबान पर विराजमान हो गई हो। भाषा पर उनकी इतनी पकड़ थी कि वे दो विरुद्ध चीज़ों को भी एक साथ संभाल लेते थे। उदाहरण के लिए, वे नारियों के सम्मान पर लंबा-चौड़ा भाषण दिया करते थे, लेकिन उसके तुरंत बाद होटल में उनकी पत्नी उन्हें परकीया प्रेम का प्रैक्टिकल करते हुए पकड़कर सैंडल से उनकी पिटाई भी करती थी, जिसके बाद वे परकीया प्रेम को भगिनी प्रेम कहने लगते थे।

अध्यक्ष जी बताते थे कि उनकी साहित्य सभा में सबको बोलने की आज़ादी है और दुनिया भर में उनके इस लोकतंत्र का सम्मान किया जाता है और इसे लोकतंत्र की माँ कहा जाता है। लेकिन इसी के साथ वे अपना विरोध करने वाले साहित्यकारों के रास्ते में बैरिकेड लगवा देते थे और पुलिस से उन्हें पिटवाते भी थे। अध्यक्ष जी गर्व से कहते थे कि वे विधर्मियों को उनके रूप-रंग से पहचान लेते हैं और यह कहकर वे उनके इबादत घर में जाकर गंगा-जमुनी तहजीब पर तब्सिरा भी कर लेते थे।

अपनी डींगें हाँकने के लिए प्रधान जी कहते थे कि साहित्य सभा की आर्थिक स्थिति बुलेट ट्रेन की गति से आगे बढ़ रही है, और फिर लेखकों के सम्मान और आर्थिक सहयोग की राशि को यह कहकर रोक लेते थे कि इसमें सभा के पुराने अध्यक्ष की ग़लती है, जिनका नाम... खैर इसे भी जाने दीजिए। भला नाम में क्या रखा है। अध्यक्ष जी बहुत ओजस्वी स्वर में बताते थे कि कैसे बड़े प्रकाशक लेखकों को लूट रहे हैं और फिर अगले ही दिन बड़े प्रकाशक के बेटे की शादी में जाकर उसे बहुत आत्मीयतापूर्वक आशीर्वाद भी दे दिया करते थे।

लेकिन असल में तो हम ओटोलरींगोलॉजिस्ट यानी ईएनटी डॉक्टर की बात कर रहे थे, लेकिन अध्यक्ष जी का जलवा ही इतना ज़बरदस्त था कि वे बाकी सभी चीज़ों को आच्छादित कर लेते थे, इसलिए उनके बारे में न चाहते हुए भी कुछ बातें निकल आईं। 

अब डॉक्टर अपने सैद्धांतिक ज्ञान से आगे बढ़कर व्यावहारिक रूप से रोगी को समझने की कोशिश कर रहे थे। असल में यह बात उन्हें उनके जूनियर ने बताई थी, जिसे डॉक्टर ने वरिष्ठ साहित्यकार की तरह अपने नाम से आगे बढ़ा दिया था। जूनियर किसी बात से झल्लाकर कह रहा था कि आजकल लोग बहुत दोगले हो गए हैं। बस इसी से डॉक्टर के मन में एक विचार कौंध गया और जब अगले दिन अध्यक्ष जी उनके पास अपना गला लेकर आए, तो उन्होंने उनकी थोड़ी गहराई से जाँच की। वहाँ उन्होंने देखा कि उनका एक नहीं बल्कि दो गले थे। तब डॉक्टर को अपनी ग़लती समझ में आई और उन्होंने उन दोनों गलों का इलाज किया, और हमारे प्रधान अध्यक्ष पूरी तरह से स्वस्थ हो गए।

व्यंग्य तो समाप्त हो गया, लेकिन इसके बाद दो बातें और हुईं।

एक तो, स्वस्थ होने पर अध्यक्ष जी ने ईएनटी डॉक्टर की भूरी-भूरी प्रशंसा की और उन्हें अपने हृदय के तल से धन्यवाद भी दिया, लेकिन डॉक्टर को समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस धन्यवाद को स्वीकार करे या नहीं, क्योंकि उन्हें पता नहीं चल पा रहा था कि यह अध्यक्ष के किस गले से निकल रहा है और ऐसा न हो कि प्रशंसा के तुरंत बाद वे उसकी इज़्ज़त उतार लें।

दूसरे, डॉक्टर की इस खोज की अंतरराष्ट्रीय जगत में धूम मच गई और तब एक विदेशी डॉक्टर ने ईर्ष्या से मुँह बिचकाते हुए और उनकी उपलब्धि को कमतर करने के लिए कहा कि यह तो उन्हीं के देश की समस्या है, हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं होता।

(14 सितंबर 2025)

-आचार्य राजेश कुमार
पूर्व निदेशक, एनआईओएस
शिक्षा विभाग, भारत सरकार
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