
"अपने छोटे-से जीवन में मैं न-जाने कहाँ-कहाँ घूमा हूँ। न-जाने कितने सान्ध्य-प्रकाश में मैंने मानसिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया है; किन्तु..." मेरे मित्र गोपालकृष्ण कहते-कहते रुक गये। 2
शनिवार की रात, कॉलेज के होटलों में आनन्द-रात्रि (Golden Night) के नाम से पुकारी जाती है। रात के कोई आठ बज चुके होंगे। हम सब लोग व्यालु, कर चुके थे। आंज भी आनन्द-रात्रि थी। मैंने सोचा, चलो, आज गप्पें उड़ायें। इसी ख्याल से मैं अपने मित्र के कमरे में आया। गोपालकृष्ण हम सबों के प्यारे है। वे विचारशील है, हँसमुख हैं, क्लास के अच्छे विद्यार्थियों में से हैं। मेरी और गोपाल की ज्यादा पटती है। कमरे में घुसते ही मैंने देखा कि वे खिन्नमना बैठे हुए कुछ सोच रहे हैं। मैंने अपने स्वभाव-चापल्य के वशीभूत होकर पूछा- "क्या सोच रहे हो म्याँ?” उत्तर में उपयुक्त वाक्य उन्होंने बड़ी गम्भीरता से कहे। मैंने देखा कि मामला कुछ बेढब है। मैं चुपचाप उनके पास बैठ गया। बिजली की बत्ती से कमरा अब आलोकित हो रहा था। गोपाल 'किन्तु' कहकर रुक गये। मैंने धीरे से कहा- "किन्तु, किन्तु क्या गोपाल?"
"कुछ नहीं हरि, जाने दो।"
"आखिर कुछ कहो भी तो।"
"क्या करोगे सुनकर?"
"नहीं, जरूर कहो।"
"हरिशरण, सुनोगे?"
"जरूर सुनेंगे।"
"देखो, सोच लो।"
"सोचने का इसमें क्या है भाई, तुम कहो, मैं सुनूँगा।"
"हरि, एक कथा है। खैर सुनो।"
मैंने अपनी आँखों से बता दिया कि सुनाओ।
गोपाल बोले-"तो पहले कमरे का दरवाजा बन्द कर लो।" मैंने चटकनी लगा दी। गोपाल ने कुर्सी के हत्थे पर अपने बाँयें हाथ की कोहनी रखकर अपने सिर को अपनी हथेली पर रख लिया। फिर वे धीरे से कहने लगे- "हरि, मसूरी पहाड़ से मैंने सूर्यास्त का दृश्य देखा, समुद्र के तट पर खड़े-खड़े मैंने अंशुमाली को समुद्र में डुचकी लगाते देखा, और भी न-जागे कहाँ-कहाँ की सन्ध्याओं को आँख भरकर देखा। किन्तु वह नहीं। वह सूर्यास्त मैंने फिर कभी नहीं देखा जो मैंने अपने बाल्यकालीन क्रीड़ा-स्थल से देखा था। हम लोग पहले एक गाँव में रहा करते थे। एक दिन की घटना मेरे अन्तरतम-पटल पर अंकित है।
"सूर्य दल चला था। मेरी फूस की टेपरिया खूब साफ-सुथरी थी। आँगन लिपा-पुता नहीं था। किन्तु पानी बरस जाने से साफ हो गया था। सावन का महीना था। मेरी माँ, सूप में कुछ अन्न याद नहीं आता कौन-सा लिये हुए फटक रही थीं। मैं उसके पास ही खेल रहा था। मैं उस समय कोई छः-सात वर्ष का था। मेरे सब कपड़े केवल एक अँगरखी-धूल में सनी हुई थी। हाथ-पैर सूखे हुए कीचड़ से लथ-पथ थे। माँ मुझे 'भैया' कहकर बुलाया करती थीं-उसका नाम लक्ष्मी था; किन्तु हम लोग उसे 'लच्छी' कहकर पुकारा करते थे। मैं लच्छी का दूध पीता था; ख़ूब पुष्ट शरीर था। गाँव के पास एक आम का बगीचा था। गाय जब जंगल से आती, तो वहीं उस बगीचे में खड़ी-खड़ी रँभाया करती-"ओ म्हा म्हा!" जब तक माँ न बुलाती, तब तक यह वहाँ से रँभाया करती थी। माँ घर से चिल्लाकर कहती थी- "लच्छी, आजा, आ बेटी!" तब गाय दौड़ती हुई आती। हरि, बड़ा सुख था। बड़ी सुखद सन्ध्या थी।
"आकाश में बादल के टुकड़े दौड़ रहे थे। तब तक मैंने जन्म में कभी नाव या जहाज़ की तस्वीरें नहीं देखीं थी। बादल जब तरह-तरह की शक्लें बनाकर इधर से उधर दौड़ रहे थे, तब मैं किलक किलककर माँ से कहता था- "माँ, देख वह एक बड़ा-सा बैल बन गया। अब देख री माँ, लच्छी की सूरत बन गई। माँ! जो ये बादल भी लच्छी का-सा दूध बरसायें तो!"
माँ ने कहा-"और जो पत्थर बरसायें तो?"
"तो फिर हमारा घर टूट जाए।" मेरी बात सुनकर माँ हँस पड़ी।
"गाँव में सावन के महीने में बड़ा सुहावना लगता है। हरि, छोटा-सा गाँव मानो आनन्द से नहा रहा था। दूर-दूर तक हरियाली दिखाई पड़ती थी । घास के बिछौने पर बीरबहूटियाँ चलती थीं, और घरों में बहिनें मेंहदी लगाये घूमती थीं। नीम और आम के पेड़ों पर गाँव में जगह-जगह झूले बँधे हुए थे। गाँव की लड़कियाँ झूलों में झूलती थीं। झूल-झूल कर मधुर गीत गाती थीं––'अरे राम हरी-हरी चुरियाँ बाँह गहे पहिरावत गिरधारी!' क्या अच्छा समय था। वर्षों खासी हुई थी। अकाल या भय नाम-मात्र को न था। गाँव के वृद्ध लोग लड़कियों का गाना सुनकर मग्न हो रहे थे। उनकी वृद्ध सतेज आँखों में निर्मलता थी, और हृदय में प्यार के पुनीत भाव। इस लोकोत्तर आनन्द के लिए वे एक अज्ञेय तथा अज्ञात शक्ति के कृतज्ञ नहीं थे। कभी-कभी वे मौन होकर, शान्त स्थिर नेत्रों को, कृपा के भार से दबी हुई पलकों से, मूंदकर ऊपर की ओर बादलों को देखकर चुप रह जाते थे। मैं तब इन बातों को कुछ समझ नहीं सकता था।
हाँ, तो माँ ने कहा- "भैया, अब राखी आई। तेरी गोई जीजी आवेगी।"
"मेरी बड़ी बहिन का नाम गोदावरी था। मैं उसे गोई जीजी कहा करता था। जीजी आयेगी, यह सुनकर मैं बड़ा खुश था। माँ को बहुत-सी कथाएँ याद थीं। मुझे कथा सुनना बहुत आता था। माँ बोली-'भैया, राखी की कथा सुनेगा?'
"मैंने चाव-भरी आँखों से देखते हुए गर्दन हिला दी। पिताजी घर पर नहीं थे। वे जीजी को लेने उसकी ससुराल गये थे।
"माँ ने कहना शुरू किया- सुन, कृष्ण थे।'
"मैं झट-से बोल उठा-'अच्छा! फिर?'
"माँ बोली- 'उनके एक बहिन थी, जिसका नाम सुभद्रा था।'
"मैंने फिर बात काट दी। झट-से पूछा- “माँ, क्या वे अपनी बहिन को मलाई देते थे?” बात यह थी कि मैं बड़ा पेटू था। मैं लच्छी के दूध की मलाई जीजी को नहीं लेने देता था; लड़-झगड़कर मैं सब खा जाता था। माँ ने कहा- दुत् पागल, नहीं, क्या सभी तेरे-जैसे खाऊ होते हैं? वे दोनों बहिन-भाई आपस में बाँटकर खाते थे।'
"इतना कहकर माँ घर में अन्न रखने चली गई। माँ आकर फिर बैठ गई। मैं उसकी गोद में लेट गया। प्यार से माँ के स्तन को हिला-कर बोला-'हाँ फिर?’
"इतने में ही एक बैलगाड़ी आती हुई दिखाई दी। पिताजी की सफेद पगड़ी को माँ ने दूर से पहचानकर कहा 'गोदावरी आ गई।' सुनते ही मैं उठकर खड़ा हो गया। मैं बड़ा प्रसन्न था। जीजी आई। कुछ बाल-हृदयों में एक प्रकार का संकोच का भाव होता है। कभी-कभी अपनों के प्रति भी यही भाव प्रस्फुटित हो जाता है। इसलिए जब दीदी आई, तब मैं दूर खड़ा रहा। उसने मुझे दौड़कर गोद में उठा लिया।
मैंने कहा- 'गोई जीजी' शब्दों में आह्लाद-मिश्रित एक अद्भुत तरल-किलक थी।
बहिन बोली- 'भैया मेरा' शब्दों में थर्राइट! वत्सलता के आवेग ने कण्ठ भर दिया था।
"हरि, अब भी याद है, वही मुख, अहा! वत्सलता आँखों से टपक पड़ती है। अब भी याद है, चूड़ियों से भरी हुई लम्बी-लम्बी बाँहे, अब भी फैलाकर बुलाती है-'आ!' हरिशरण! अब भी अपने कमरे को बन्दकर, रात्रि की निस्तब्धता में बुलाता हूँ––'गोई जीजी’ मेरी वह पुकार शून्य हृदयाकाश में विलीन हो जाती है। हे आनन्द के क्षण, हे अमिट स्मृति, दीदी के माँग सी सुन्दर...हे पवित्र सुगन्धि, मेरे कपोलों को सिक्त करनेवाले हे वत्सलताश्रु, तुम न जाने किस वायु के झकोरे के साथ आ जाते हो?
"याद किसी क्षण की क्यों न हो, चाहे दुःखों के क्षण की हो अथवा सुखों के किन्तु इसके बिना जीवन उजाड़ हो जाता है।
"हाँ तो हरि, सुनो, दीदी की कथा सुनो। वर्षों गुज़र गये, हम लोग शहर में आकर बसे। बहिन की ससुराल पास ही के गाँव में थी। पिता ने मेरे शिक्षण-क्रम को ठीक किया। दीदी के दर्शन अब भी हो जाया करते थे। ससुराल से समय-समय पर आ जाती थीं-मुझे खिलाती थीं, मेरा दुलार करती थीं। कायर जीजा आलस्य की मूर्ति थे। जीजी ही उनका और अपना पेट पालती थीं। मजदूरी करके लाती थीं। खेतों में जाकर काम करती थीं, सावन-भादों के दिन; पानी कहता था आज ही बरस लूँगा। खेतों में घुटनों तक जल भर जाता था। तो भी पेट की ज्वाला न बुझती थी। इतना पानी, तो भी आग धधका करती थी। इसको बुझाने के लिये जीजी अपने वेदना-जन्य आँसू, कठोर परिश्रम-जनित स्वेद की बूँदें, और बचा-खुचा हृदय का लहू देती थीं, तब कहीं जाकर भूख की लपकती हुई लपटें बुझती थीं। दुष्ट जीजा खा-पीकर अथाई में जा बैठते थे। जब तक वह वहाँ पड़ा-पड़ा सोया करते थे, तब तक दीदी हँसिया लेकर कींचद गूँधा करती थीं। गाँव के लोग देखते थे; कहते थे––'गोदावरी सती है।' कुछ वृद्ध लोग जीजा से कहते थे––'भलेमानुस, जरा तो शरम खा। उसका खून क्यों चूस रहा है?'
"पुरुषार्थ-हीन प्राणियों में मनुष्यता का अभाव होता है। कभी-कभी आरम्भ में शूरता आ जाती है; किन्तु टिकती नहीं। भर्त्सना सुनते-सुनते जीजा निर्लज हो गये थे। स्वाभाविक आलस्य ने, और निर्लजता-पूर्ण बेपर्वाही तथा मस्ती ने जीजा के मान के चित्त से दया भाव नष्ट कर दिया था; जीजी के कठोर श्रम तथा हृदय विदारक स्थिति की ओर से जीजा की सहानुभूति बिल्कुल जाती रही थी।
"जीजी के शरीर पर एक ही साड़ी थी। नहाते समय उसी को पहने नहा लेती थीं। बाद को आड़ में छिपकर आधी साड़ी सुखाकर उसे पहिन लेती थीं; फिर वह भीगी आधी साड़ी सुखा पाती थीं। माता-पिता यह सच सुनते थे। कलेजा मसोसकर रह जाते थे। क्या करते? फिर भी यथा-सामर्थ्य सहायता करते ही थे; लेकिन कहाँ तक करते?
"इसीलिये कहता हूँ हरि, संसार में अधिकतर मनुष्य नहीं, शैतान बसते हैं।" गोपाल की यह कथा सुनकर मेरी आँखें छलछला आई। गोपाल बोले- "हरिशरण, रोते हो? रोओ-मैं न रोऊँगा। न जाने क्या हुआ-मेरी आँखों का पानी सूख गया है।"
मैं अपने को न सम्हाल सका। मैंने कुर्सी पर से उठते हुए कहा-"गोपाल! अब तुम अपनी इस करुण कथा को बस करो। मैं नहीं सुन सकता।"
गोपालकृष्ण का चेहरा तमतमा उठा। उसकी यह उत्तेजना देखकर मेरा बाँध और भी टूट गया। बेचारा गोपाल––गोपाल, तुमने इस उत्तेजना का क्या मूल्य दिया है- जानते हो?
यह उत्तेजना क्या थी? आन्तरिक यंत्रणा ने निर्दयतापूर्वक तारों को बजा दिया। स्वर नहीं निकले; एक विकृत तान उठी; वही यह उत्तेजना थी। गोपाल ने उत्तेजित होकर कहा––"हरि! तुम्हें सुनना होगा।"
मैंने हृदय पर पत्थर रखकर कहा––"कहो।"
गोपाल टूटे हुए स्वर में कहने लगा––"आपत्ति सहन करते-करते जीजी क्षीण हो चली। एक दिन, रात को नौ बजे हम लोगों को खबर लगी कि जीजी बहुत बीमार है। उसी समय हम चल खड़े हुए। रात के एक बजे गाँव में पहुँच गये। जंगल में सियार बोल उठे और गाँव में कुत्ते। जीजी को सन्निपात हो गया था। हम सब किंकर्तव्यविमूढ़ थे। प्रकृति का सौरभ, आकाश की निर्मलता तथा गाँव की अभग्न शान्ति, ये सब चिन्ता और विषाद की ज्वाला को न बुझा सके। दीपक का तेज कुछ अवशिष्ट था। अन्त होने में कोई विलम्ब नहीं था।
"हम सन्न देखते-देखते जीजी अपनी माँ, अपने 'काकाजी', और सब से अधिक अपने इस भैया को छोड़कर चल दी। हरि! हृदय फट जाएगा––हरि, हृदय न जाने क्यों नहीं फटता!"
इतना कहकर गोपाल पागलों के ऐसा, दौड़कर सन्दूक के पास गया। उसमें से कुछ निकालकर ले आया। देखा कि एक सादे कपड़े में सूत का डोरा लिपटा हुआ रखा है। और उसमें एक दुअन्नी रखी है। गोपाल भर्राई हुई आवाज से कहने लगा––"हरिशरण, ये ही दो स्मरण की चीजें रह गई है। उसका तैल-चित्र नहीं है। उससे सतत बरसनेवाले आशीर्वाद और उसकी निर्मल सदिच्छा की चिन्ह-स्वरूपा यह राखी है, और यह एक दुअन्नी है। पेट काटकर-न-जाने कितना खून देकर उसने अपने भैया की मिठाई के लिए यह दुअन्नी बचाई थी, यही वह दुअन्नी है। हरि मेरी गोई जीजी मेरे प्रति जननी, गोई जीजी की यही कहानी है। जिसकी उत्संग में पला, जिससे इतना लड़ा, जिससे मलाई छीनकर खाई, जिससे सदा-सर्वदा 'गोई जीजी' कहता रहा, हँसिया और खुर्पी थामने से ठाठ पड़े हुए जिसके पुनीत हाथों के फटने में अवर्णनीय वात्सल्य दान का रस चखा, उस सतत स्मरणीया, अवहेलिता, आपत्ति-प्रपीड़िता गोई जीजी की यही स्मृत्ति है। श्मशान का, उस रात्रि का और प्रातःकाल का अन्तिम दृश्य मेरे सामने आ जाता है। एक बार फिर एकान्त में उस स्थान के दर्शन करने की उत्कण्ठा होती है। वह स्थान मेरे लिए भयंकर है, रोमांचकारी है, दुःख की स्मृतियों को जाग्रत करनेवाला है, पर पवित्र है! हरि, मेरा मृतक शरीर भी उसी स्थान पर अग्नि को समर्पण किया जाए और रात्रि से प्रातःकाल तक जलता रहे ऐसी भावना मुझको अनेकों बार हो चुकी है!"
इतना कहकर गोपालकृष्ण का व्यथित हृदय न-जाने किस वेदना के रसास्वादन में लवलीन हो गया। मैंने देखा कि उनके मुख पर एक अमिट विषाद-रेखा खिंची हुई है।
घड़ी ने बारह बजा दिये। इस पुनीत गाथा को सोचता हुआ मैं अपने कमरे में चला गया।
-पं० बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'