रामेश्वर ने 'लीडर' खोला और रिजल्ट शीट पर उसने अपनी नज़र दौड़ाईं एम. ए. के उत्तीर्ण विद्यार्थियों में उसका नाम छपा था और उसके नाम के आगे लिखा था-फर्स्ट डिवीजन !
अपने अन्य साथियों का परीक्षा-फल देखकर उसने 'लीडर' बन्द कर दिया। फिर उसने एक क्षण के लिए मुस्कराते हुए अपने चारों ओर देखा।
और उसने देखा कि सारी प्रकृति उसकी प्रसन्नता से हँस रही है। चिड़ियां चहक रही थीं और मोगरा महक रहा था और सुबह की ठण्डी हवा अपनी मस्ती के साथ सौरभ से अठखेलियां कर रही थी और आम के बौरों में बौराई हुई कोयल भी पंचम की अलाप भरने में बेसुध थी।
अपनी उमंग की मादकता में चकित और पुलकित रामेश्वर एक अजीब तन्यमता के साथ यह सब देख रहा था। और फिर उसका हाथ अपने आप बिना उसके जाने हुए जेब में चला गया। उसने शान्ता का पत्र निकाला और पिछले कई दिन पढ़ चुकने के बाद भी उसने उस पत्र को फिर पढ़ा। शान्ता ने उसे फिर बुलाया था और भी उसने बहुत-सा लिखा था और उससे भी अधिक उसने बिना लिखा छोड़ दिया था। मोती के से सुन्दर और छोटे-छोटे अक्षर तथा लेटर-पेपर से निकलती हुई भीनी-भीनी खुशबू ! - और फिर उसके साथ शान्ता का पवित्र प्रेम ! शान्ता अपूर्व सुन्दरी थी। यूनिवर्सिटी के सबल लड़के रस के लोभी भौंरों की भांति शान्ता के पीछे मंडराया करते थे। पर रामेश्वर उन सब लड़कों से अधिक भाग्यवान था, क्योंकि शन्ता उससे प्रेम करती थी। पत्र को आदि से अन्त तक उसने एक बार पढ़ा, दो बार पढ़ा; फिर उसने पत्र का चुम्बन करके अपनी जेब में रख लिया।
इसके बाद उसने अपने पिता का पत्र खोला। उसके पिता ने उसे विलायत जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा में सम्मिलित होने की सलाह दी थी।
रामेश्वर उठ खड़ा हुआ हुआ। भैरवी का स्वर भरते हुए वह अपने बंगले से निकल पड़ा - घूमने के लिए।
बाईस वर्ष का लम्बा-सा सुन्दर नवयुवक रामेश्वर अपनी सफलता पर प्रसन्न धीरे-धीरे चला जा रहा था, उसके शरीर में बल था, उसके हृदय में उमंग थी, उसकी धमनियों में गरम रक्त प्रवाहित हो रहा था, उसके विचारों में स्फूर्ति थी। उसका मस्तिष्क ऊंचा था, अस्तित्व की सार्थकता का उसमें पूर्ण प्रतिबिम्ब था।
उसके कानों में एकाएक कोलाहल का कठिन प्रहार पड़ा जिसने उसकी तन्मयता को भंग कर दिया। वह चौंक उठा। सामने आज़ादी के दीवानों का एक जुलूस चला आ रहा था। वह खड़ा हो गया- जूलूस धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा था।
उसने पीछे देखा, और वहां उसने देखा, एक दूसरा जुलूस शासन को कायम रखने वालों का। पुलिसवालों के हाथों में लाठियां थीं, और कन्धों पर बन्दूकें। रामेश्वर ने न जाने क्यों अपने अन्तर में पीड़ा से भरी हुई एक प्रकार की हलचल का अनुभव किया।
दोनों ओर से दोनों जुलूस एक-दूसरे की तरफ बढ़ रहे थे और बीच में रामेश्वर खड़ा हुआ तमाशा देख रहा था।
और फिर दोनों दल अचानक रूक गए, ठीक वहां जहां रामेश्वर खड़ा था। जुलूस वालों में और पुलिसवालों में कुछ कहा-सुनी हुई रामेश्वर ठीक से देख नहीं सका कि क्या हुआ, पर उसे यह आर्डर स्पष्ट सुनाई पड़ा-"जुलूस गैर-कानूनी करार दिया जाता है। अगर दो मिनट के अन्दर यह भंग नहीं हो जाता तो बल प्रयोग से भंग कर दिया जाएगा!" और दूसरी ओर से नारे लगे, "भारत माता की जय! महात्मा गांधी की जय ! स्वतन्त्रता की जय!"
लाठियां चलीं, और उसके बाद गोलियां चलीं। और उन नवयुवकों में जो छाती खोलकर गोलियां खाने को आगे बढ़ आए थे, रामेश्वर भी था। रामेश्वर की छाती में गोली लगी। "भारत माता की जय !" कहकर वह ज़मीन पर गिर पड़ा।
और मैं पूछ रहा हूँ-कल्पना के किस वर्ग को पाने के लिए वह नवयुवक अपने जीवन के स्वर्ग को ठुकराकर चला गया?
चिथड़ों से ढके हुए मक्खियों से घिरे हुए उस बूढ़े भिखारी ने बड़े करुण स्वर में पुकारा, "एक मुट्ठी अन्न !"
तीर्थराज प्रयाग में माघ-मेला के अवसर पर संगम के किनारे वह बुड्डा भीख मांग रहा था। उसकी उम्र साठ के ऊपर रही होगी! उसके बाल सफेद थे, और उसका मुख विकृत तथा कुरूप ! उसकी आंखें पथराई हुई सी तथा भावना से शून्य और उसका स्वर रूखा, कर्कश और कांपता हुआ। उसके हाथ-पैर की उंगलियां कुष्ठ से गलकर गिर गयी थीं और उसके शरीर से एक ऐसी भयानक दुर्गन्ध निकल रही थी जो उसके पास से निकलने वाले को अपनी नाक दबाने को विवश करती थी।
एक औरत ने उसके सामने अपनी जूठन की पूड़ी का एक टुकड़ा फेंका और उसके सामने उस टुकड़े के गिरते ही उस टुकड़े का अधिकारी एक कुत्ता झपटा। पूड़ी के उस टुकड़े को भिखारी ने और उस कुत्ते ने साथ-साथ पकड़ा, दो सैकिण्ड तक नर और पशु में छीना-झपटी हुई और अन्त में कुत्ते पर भिखारी ने एक डंडे के सहारे विजय पाई।
माघमेला की उस भीड़ में किसी-किसी ने उस भिखारी की उपस्थिति पर आपत्ति भी की; पर वह मेला था! पुण्य का क्षेत्र था; और पुण्य कमाने का छोटे-बड़े सबको समानाधिकार प्राप्त है। हां, मनुष्य स्वयं अपने को उस भिखारी से दूर रख सकता था।
और फिर वहां पर उस भिखारी से कहीं अधिक भाग्यवान, वैभव से युक्त तथा गद्दीदार भाई-बन्द भिखारियों का एक शानदार जुलूस निकला। तरह-तरह के बाजे बज रहे थे, सोने और चांदी के सामान साथ में थे। हाथियों पर मखमल की झूलें लटक रही थीं, और चांदी के हौदों पर भिखारी लोग बैठे हुए राजाओं को चुनौती दे रहे थे। घोड़े सोने-चांदी के गहनों से लदे थे, और ऊंटों पर भिखारी लोग अपना निशान फहरा रह थे।
कर्ज काढ़कर और पेट काटकर एकत्रित रुपयों का उपयोग करके पुण्य कमाने के लिए आए भक्तों का समूह उन भिखारियों के दर्शन करने के कारण स्वर्ग का अधिकारी
बनने के लिए उमड़ा पड़ रहा। उस भीड़ में बूढ़े थे, जवान थे, स्त्रियां थीं, बच्चे थे।
उसी समय एक दुर्घटना हो गई। महन्त जी का हाथी उस मेले की भीड़ में अचानक बिगड़ खड़ा हुआ। एकत्रित जन-समूह अपने-अपने प्राण लेकर भागा।
और उस भागती हुई भीड़ में स्त्रियों और बच्चों को धक्का देकर भागता हुआ वह बुड्डा और कोढ़ी भिखारी अपने प्राण बचाने के लिए सबसे आगे था।
और मैं पूछ रहा हूँ-कल्पना के किस नरक से बचने के लिए वह बुड्डा कोढ़ी भिखारी अपने जीवन के नरक से बुरी तरह चिपटा हुआ था?
—भगवतीचरण वर्मा