भारतमाता का यह मन्दिर, समता का संवाद यहां,
सबका शिव-कल्याण यहां है, पावें सभी प्रसाद यहां।
नहीं चाहिये बुद्धि वैरकी, भला प्रेम-उन्माद यहां,
कोटि-कोटि कण्ठों से मिलकर, उठे एक जयनाद यहां।
जाति, धर्म या सम्प्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहां,
सबका स्वागत, सबका आदर, सबका सम-सम्मान यहां।
राम-रहीम, बुद्ध-ईसा का, सुलभ एक सा ध्यान यहां,
भिन्न-भिन्न भव-संस्कृतियों के, गुण-गौरव का ज्ञान यहां।
सब तीर्थो का एक तीर्थ यह, हृदय पवित्र बना ले हम,
आओ यहां अजातशत्रु बन, सबको मित्र बना लें हम।
रेखाएं प्रस्तुत हैं अपने, मन के चित्र बना ले हम,
सो-सो आदर्शों को लेकर, एक चरित्र बना लें हम।
मिला सत्य का हमें पुजारी, सफल काम उस न्यायी का,
मुक्तिलाभ कर्तव्य यहां है, एक-एक अनुयायी का।
बैठी माता के आँगन में, नाता भाई-भाई का,
समझे उसकी प्रसव वेदना, वही लाल है माई का।
-मैथिलीशरण गुप्त
* विशेष: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इस मंदिर के सम्मान में और इसके उद्घाटन के अवसर पर विशेष रूप से इस कविता (मातृ-मन्दिर) की रचना की थी। यह कविता मंदिर के मुख्य सभास्थल में एक बड़े बोर्ड पर अंकित है। यह मंदिर उस समय स्वतंत्रता सेनानियों, कवियों और विचारकों के मिलन का एक प्रमुख केंद्र था। यह कविता आज भी मंदिर के उस हॉल की शोभा बढ़ा रही है जहाँ अविभाजित भारत का विशाल त्रि-आयामी (3D) संगमरमर का मानचित्र बना हुआ है। कविता की पंक्तियाँ जैसे "सब तीर्थों का एक तीर्थ यह, हृदय पवित्र बना लें हम" सीधे तौर पर इस मंदिर की पवित्रता और एकता के संदेश को समर्पित हैं।
उद्घाटन: मंदिर का उद्घाटन 25 अक्टूबर 1936 को महात्मा गांधी द्वारा किया गया था।