लेबर चौक | कविता

रचनाकार: डॉ पवन कुमार जैन 'प्रबल'

डॉ पवन कुमार जैन 'प्रबल'

हर रोज, सुबह सुबह ही 
स्त्रियां, पुरुष और युवक 
खड़े होते हैं, लेबर चौक पर 
कुछ काम की तलाश में 
जो आये हैं, इस शहर में
जब बचा नहीं काम गांव में।

वे दौड़ पड़ते हैं, बड़ी आशा से 
देखकर किसी महाजन को
जो तलाश में है मजदूरों की
और उन सभी को जरूरत है
अपने लिए कुछ काम की।

कुछ भाग्यशाली पा लेते हैं
अपने लिए आज कुछ काम 
उठेगा धुआं फिर झोपड़ी से
जल सकेगा फिर आज चूल्हा 
बंद पड़ा था,जो कई दिनों से।

और कुछ मायूस हो जाते हैं 
कटी हुई डालियों की तरह 
और लौट पड़ते हैं, घरों को
बिना काम के ही, थके हुए 
अगले दिन की, प्रतीक्षा में। 

  ई-मेल: pawankumarjain63@gmail.com