ज़्यादातर लोग कलम ले कर चलते हैं, उसके सहारे ही लिखते हैं। लेकिन हमारे मित्र छदामीराम ज़ेब में रबर (या रबड़) ले कर निकलते हैं। कलम से लोग मन की बात लिखते हैं, मगर छदामीराम लोगों के लिखे को मिटाने की कोशिश में लगे रहते हैं। उनकी इसी हरकत के कारण लोग उन्हें अब 'मिस्टर रबरवाला' भी कहने लगे हैं। कुछ लोग कभी सरेस बेचने का काम करते थे, तो सरेसवाला हो गए। कुछ लोग बंदूकें बेचते थे, तो बंदूकवाला हो गए। कुछ लोग घर-घर जा कर के भोजन के डिब्बे पहुँचाते हैं, तो उन्हें सब डिब्बेवाला कहते हैं। मगर इन श्रीमान के बारे में आम चर्चा यही है कि ये अपनी ज़ेब में रबर लेकर घूमते हैं, इसलिए लोगबाग इनको रबरवाला कहने लगे। अपनी इस उपाधि पर वे बड़े प्रसन्न रहते हैं। उन्हें लगता है वह सुपारी लेने वाले हिंदी के आलोचक हो गए हैं। इस मामले में वे बड़े खानदानी हैं। यानी खानदानी परम्परा वाले। इनके पिताश्री भी रबर लेकर स्कूल जाया करते थे। जिस किसी बच्चे की कॉपी में शीशपेन्सिल से कुछ लिखा देखते थे, उसे फौरन मिटाना शुरू कर देते थे। लिखने में उनकी कोई रुचि नहीं रही, मगर उन्हें दूसरे बच्चे का लिखा मिटाने में मज़ा आता था। कभी-कभी तो किसी पढ़ाकू बच्चे की कॉपी भी फाड़ देते थे। हद तो यह थी कि रबर द्वारा स्याही से भी लिखी बातों को भी मिटाने का असफल प्रयास करते थे, भले मिटे-न-मिटे। मगर वे अपने हिसाब से उस कर्म से पीछे नहीं हटते थे। अब उनके कुपुत्र-सुपुत्र छदामीराम भी ऐसा करते हैं। एक रबर घिस जाए तो दूसरी रबर निकाल लेते हैं।
उनकी जेबें रबर से भरी रहती हैं। वैसे अब तो डॉट पेन का ज़माना है। किसी की लिखावट को रबड़ से मिटाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। लेकिन ये भाई साहब प्रयास करते रहते हैं, क्योंकि उन्होंने कहीं पढ़ रखा था कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। आसपास के बच्चे इनको अब रबरवाले अंकल कहते हैं। आप श्रीमान बच्चों को बड़ी उदारता के साथ रबर बाँटते हैं। कारण यही है कि वे चाहते हैं कि आज के बच्चे शुरू से ही मिटाने की कला में पारंगत हो जाएँ। कहीं यह बला की कला लुप्त न हो जाए।
उस दिन जब वे अचानक मुझसे टकरा गए, तो मुझसे रहा न गया।
पूछ ही लिया, "आप तो खुद कभी कुछ लिखते-पढ़ते नहीं, लेकिन जो लोग लिखते-पढ़ते हैं, उनसे आप भयंकर खार खाए रहते हैं। आखिर इसका कारण क्या है कि आप सबकी निंदा करते रहते हैं?"
मेरी बात सुनकर वे मुस्कुराते हुए बोले, "अरे भाई, हर कोई सृजन ही करता रहेगा तो दुनिया का काम कैसे चलेगा। किसी-न-किसी को विध्वंस भी तो करना चाहिए ताकि संतुलन बना रहे।" फिर मुस्कुराते हुए अँग्रेज़ी में बोलने लगे, "एम आय राइट? अरे, कोई बनाए, तो कोई मिटाए भी न! तभी तो बनाने के महत्व का भी पता चलेगा। बस, यही सोचकर मैं रबरवाला बन गया। आपको लिखने में आनंद आता है, तो मुझे मिटाने में। इस दुनिया में सबके अपने-अपने काम बँटे हुए हैं न। गोस्वामी तुलसीदास जी भी कहते हैं, 'होहिए वही जो राम रचि राखा'। तो शायद राम ने रच रखा होगा कि मुझे यह रबर लेकर घूमना है। इसलिए इसमें मेरी कोई गलती नहीं है।"
उनके तर्क में दम था। बंदे ने तो मेरी बोलती ही बंद कर दी। मैंने ऐसी दुर्लभ किस्म की प्रतिभा को सामने पा कर हाथ जोड़ लिया और कहा, "ठीक है, महाप्रभु! जैसी आपकी मर्जी। फिर भी 'रब' (यानी ऊपर वाले) के लिए अब रब करना थोड़ा-थोड़ा कम कीजिए। इस से आपकी आत्मा पवित्र बनी रहेगी। उस बेचारी को कुछ सुकून मिलेगा।''
मेरी बात सुनकर वे एक बार फिर हँसे और बोले, "अरे भाई साहब! सुकून तो मुझे रब करने में ही मिलता है। अगर वही करना छोड़ दूँगा, तो कहाँ का सुकून… कैसा सुकून? मेरी हरकत को देखकर किसी ने पिछले दिनों कहा कि अगर यही रफ्तार रही तो धीरे-धीरे मैं 'सुपारी' लेकर साहित्य की दुनिया में भरे-पड़े धंधेबाज़ आलोचकों की जमात में भी शामिल हो सकता हूँ। मगर प्लीज़! अब आप मुझे ज्ञान न दें। हमें अपना पारम्परिक काम करने दें।"
मुझे खामोश होना पड़ा। फिर मन-ही-मन सोचने लगा, ठीक है भाई। अपन को क्या। कुएँ में गिरना है तो कुएं में गिरो या नाली में, अपन को क्या। हम तो शुद्ध नदी में तैरने वाले लोग हैं।
मैं जाने लगा तो उन्होंने आवाज़ दी और कहने लगे, "मुझे याद आ रहा कि पिछले दिनों आपकी चिरकुट-सी एक कविता पढ़ी थी। माफ करें, मज़ा नहीं आया। असल में कविता क्या होती है, अब दुनिया को मैं बताऊँगा, मैं! लोग भूल जाएँगे कविता करना।"
मैंने चौंकते हुए प्रसन्नता के साथ कहा, "अरे वाह! यह तो बड़ी खुशी की बात है कि आप कविता भी करते हैं। मैं भी कभी पढ़ना चाहूँगा आपकी कविताएँ।"
मेरी बात सुनकर वे बत्तीसी निकाल कर हँसने लगे और बोले, "अरे बंधु, अभी शुरू नहीं किया है। अभी तो केवल मूड बना रहा हूँ। पहले वह तो बने। अब यह ससुरा मूड कब बनेगा, कब लिखना शुरू करूँगा, आय डोंट नो। लेकिन जब भी कविता उगलने लगूँगा, ओह, मेरा मतलब है, लिखने लगूँगा, तो उस समय दुनिया को पता चलेगा कि कविता होती क्या है। आप तो जानते हैं कि आजकल उसका ज़माना है... वो क्या बोलते हैं... हाँ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। चैट जीपीटी का। उसकी सहायता से कविता लिखूँगा। जैसा कुछ लोग लिख रहे हैं। तब माँ कसम! मिस्टर पोपटलाल की तरह दुनिया हिला दूँगा। लेकिन इसका मुहूर्त कब आएगा, यह अभी कह नहीं सकता।"
उनकी यह बात सुनकर मैं जोर-से हँसने लगा और बोला, "मतलब अब अगर ये श्रीमान कवि हो जाएँगे तब तो मज़बूरी में हमें भी रबरवाला बनना पड़ेगा!"
-गिरीश पंकज
सेक्टर -3 एचआइजी -2, घर नंबर- 2,
दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर-492010