हास्य-व्यंग्य दोहे

रचनाकार: काका हाथरसी

अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज।
ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज॥

अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख।
ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख॥

अंधा प्रेमी अक्ल से, काम नहीं कुछ लेय।
प्रेम-नशे में गधी भी, परी दिखाई देय॥

अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद।
देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंद॥

अगर चुनावी वायदे, पूर्ण करे सरकार।
इंतज़ार के मज़े सब, हो जाएँ बेकार॥

अधिकारी के आप तब, बन सकते प्रिय पात्र।
काम छोड़ नित नियम से, पढ़िए, चमचा-शास्त्र॥

अपना स्वारथ साधकर, जनता को दे कष्ट।
भ्रष्ट आचरण करे जो, वह नेता हो भ्रष्ट॥

अपनी आँख तरेर कर, जब बेलन दिखलाय।
अंडा-डंडा गिर पड़ें, घर ठंडा हो जाय॥

अपनी ही करता रहे, सुने न दूजे तर्क।
सभी तर्क हों व्यर्थ जब, मूरख करे कुतर्क॥

अंध धर्म विश्वास में, फँस जाता इंसान।
निर्दोषों को मारकर, बन जाता हैवान॥

-काका हाथरसी