तू स्वामिनी मैं चेरी | कविता

रचनाकार: डॉ सीमा अग्निहोत्री चड्ढा ‘अदिति’ 

आधुनिक नौकरानियां…
जैसे किसी नौका में सवार 
उद्दंड महारानियां।
जीवन रूपी नौका की
हाथ इनके पतवार है, 
नौकरीपेशा  नारियों के 
पलते इनसे परिवार हैं॥

मालकिनों से ज़्यादा वक्त 
मालिक संग बिताती हैं, 
भौंहें इनकी चढ़ी नहीं कि 
शामत घर की आ जाती  है।
इनकी अनोखी अदाओं का
कोई नहीं हिसाब है 
इनसे सेवा अपनी करवाना 
हर मालिक का ख़्वाब है॥ 

आलम यह है जनाब
करतीं घर का हिसाब ख़राब 
जब कभी मिल जाए अवसर
मालकिन जाए अपने काम पर, 
अप्सराओं सी सज संवर कर।
घर बैठे मालिकों को  फिर ये
उंगलियों पर अपनी नचाती हैं 
इसीलिए तो ये बलाएं 
देवांगनाएं कहलाती हैं॥

घर का कोना-कोना भी 
इनके नखरों को झेलता है, 
कांधे और ग्रीवा के बीच  
मोबाइल इनका डोलता है।
काम करते करते ये
घरवालों संग बतियाती हैं,
मालिकों की बेबसी की
खूब खिल्ली उड़ाती हैं॥

एक हाथ से चाय बनातीं 
दूजे दूध उबलता है 
मल्टीटास्किंग के नाम पर  
मोबाइल मन छलता है।
साथ काम संगीत चले 
तो इनका जी बहलता है 
इनकी अतरंगी हरकतों से 
घर सारा दहलता है॥

घर के विश्वामित्रों की 
करती तपस्या भंग हैं, 
इनकी इन अठखेलियों की
एक अजब तंरग हैं।
ज़रूरत जिस दिन ज्यादा हो,
दिखातीं असली रंग हैं
उसी दिन अवकाश ले 
रहतीं कुटुंब संग हैं॥

‘काम छोड़ मैं चली जाऊंगी’ 
बारम्बार धमकाती हैं,
फर्ज़ी दुखड़े रो रोकर के 
हम सब को भरमाती हैं।
चौबीसों घंटे घर में बस 
अनहद नाद गूंजता है 
ये न हों, घर कैसे चले?
मन यह प्रश्न पूछता है।
कामकाजी हर महिला का 
पति इन्हें पूजता है।
अनिवार्य हैं ये घर हेतु 
यही विकल्प सूझता है॥
 

षड्यंत्रकारी नीतियों से 
परस्पर भिड़ता परिवार है 
फूट डालो और राज करो 
इनकी यही दरकार है।
सास से कभी बहू को 
और बहू से कभी ननद को 
आपस में भिड़वाती हैं 
मंथरा बन कैकयियों के
घरों में फूट डलवाती हैं॥
 
कामकाजी महिलाओं का घर
इनके सहारे चलता है 
मालकिन का स्थान मिल जाए 
मन में सपना पलता है।
मालिकों को रिझाने के
प्रयास इनके जारी हैं 
काम वाली बाइयां ही
हर घर पर भारी हैं॥

कभी कभी बन अन्नपूर्णा 
भूख का करती हैं निवारण
इन्हें आते हैं टोटके सभी 
और जानतीं हैं वशीकरण।
घर के छोटे बाल सभी 
इनकी वाणी बोलते हैं 
बहन, मां और दादी की हिदायतों को 
शक़ के पलड़ों में तोलते हैं॥

मेरे पीड़ित हृदय के 
सच्चे ये उद्गार हैं 
किन्तु मैं भी जानती हूं 
हमें इनकी दरकार है।
जब गृहिणी नहीं होती घर पर 
शासन यही संभालती हैं 
हम जाते हैं पैसा कमाने 
ये परिवार पालतीं हैं॥

चाहे कर लें धन्यवाद जितना 
उतना भी शायद कम है।
सेवक हैं पूजा योग्य सभी 
इन के होने से ही हम हैं॥

-डॉ सीमा अग्निहोत्री चड्ढा ‘अदिति’ 
           [27.02.2026]