भीमसेन के लट्ठ | कहानी

रचनाकार: वृंदावनलाल वर्मा

बात लगभग सन् 1390 की है, जब दिल्ली में राज्य फीरोजशाह तुगलक का था।

फीरोजशाह थट्टे की लड़ाई में नाममात्र की विजय पाकर लौटा। दिल्ली में जश्न की बाढ़-सी आ गयी। कवियों ने चिल्ला-चिल्लाकर, गा-गाकर कहा कि फीरोजशाह सिकन्दर से भी बाजी मार ले गये, सिवाय खलीफों के—क्योंकि उनका प्रसंग धर्म से सम्बन्ध रखता था—फीरोजशाह ने करीब-करीब सबको मात कर दिया! फीरोजशाह को सैरबाजी और शिकार भी पसन्द थी। सैर-सपाटे के लिए एक समाचार ने विवश कर दिया।

समाचारदाता ने बतलाया था कि दिल्ली के उत्तर-पूर्व में हिमालय पहाड़ के एक सिलसिले के नीचे साफ-सुथरे चिकने गोल लम्बे ऊँचे पत्थर पर, जो हजारों बरस से वहाँ गड़ा हुआ है, कुछ लिखा है, हिन्दी में है। मालूम नहीं उसमें क्या लिखा है, और इस तरह का दूसरा मेरठ गाँव के नजदीक खड़ा हुआ है।

बादशाह ने अपना लाब-लश्कर तैयार किया और मेरठ के निकटवाले पत्थर के पास गया। देखा तो हैरान हो गया। बड़ा चिकना पत्थर—मक्खन जैसा चिकना। समाचारदाता ने बतलाया कि उस पर हिन्दी में कुछ अजीब-सा लिखा है। बहुतेरे हिन्दीवाले पकड़ बुलाये गये पर उसे पढ़ कोई न सका। हो सकता है इसके नीचे या आस-पास बेशुमार खजाना गड़ा हो क्योंकि इस पर शेर बने हैं और चक्र भी, हो सकता है इस देश के बहुत पुराने लोगों ने इस पत्थर पर अपने हिसाब से लिख डाला हो कि बाबा आदम कब हुए और दुनिया कब बनी। तरह-तरह के अटकल लगाये गये। अन्त में तय हुआ कि किसी बहुत पढ़े-लिखे ब्राह्मण को बुलाया जाये, वह इस लेख पर प्रकाश डालेगा। परन्तु हिन्दुओं को आमतौर पर और ब्राह्मणों को खासतौर पर फीरोजशाह के जजिया कर ने इतना खिन्न कर दिया कि बड़ी मुश्किल से वैसा एक ब्राह्मण हाथ लग पाया।

पूछने पर ब्राह्मण ने कहा: "जहाँपनाह, यह लेख पढ़ा नहीं जा सकता। जिसने बहुत तपस्या की हो वही इसे पढ़ सकता है।"

"तो तुमने क्या अब तक भभड़ ही झोंफा है?" फीरोजशाह ने भर्त्सना की। 

फीरोजशाह ने समझा कि ब्राह्मण छिपा रहा है। उसकी मरम्मत की गयी, परन्तु जो कुछ उसने पहले कहा था उसमें केवल इतना जोड़ा: "सुनते आते हैं, जहाँपनाह, कि चैत्र द्वापर में कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ तब यह लाट खड़ी की गयी थी।"

उस ब्राह्मण को मुश्किल से छुटकारा मिला, परन्तु फीरोजशाह को चैन कहाँ! अन्य 'बहुत पढ़े-लिखे' ब्राह्मणों की खोज की जाने लगी। अन्त में एक ब्राह्मण बादशाह को मिल गया। यह बुद्धू न था, बहुत चतुर था।

बादशाह के सामने पेश होने पर जब उससे सवाल किया गया तब उसने उत्तर दिया: "जहाँपनाह, मैंने सब पढ़ लिया।"

"खूब, खूब! क्या लिखा है उसमें?"

"उसमें, जहाँपनाह, यह लिखा है कि यह भीमसेन पाण्डव का लट्ठ है, किसी की हिम्मत नहीं, ताकत नहीं जो इस जगह से हटाकर कहीं और ले जा सके; कलियुग में केवल एक ऐसा सम्राट होगा जो इसे सँभालकर उठा ले जायेगा और सुरक्षा के साथ रखेगा। उसका नाम होगा शहंशाह सुल्तान फीरोजशाह तुगलक। इस पत्थर पर यह भी लिखा है कि यह बादशाह जब इस लाट को उठाकर ले जायेंगे और दिल्ली के किसी प्रमुख स्थान में सुरक्षा के साथ गाड़ देंगे, तब उनका राज्य तो बहुत समय तक चलेगा ही, जब तक यह लाट वहाँ खड़ी बनी रहेगी उनके वंशजों का राज्य भी अनन्त काल तक चलता रहेगा।"

"वाह, पण्डित, वाह! इसे कहते हैं इल्म और ज़हन! अच्छा, यह और बतलाओ कि क्या इसमें इतना ही लिखा है या कुछ और?" बादशाह ने प्रश्न किया।

चतुर ब्राह्मण ने तुरन्त उत्तर दिया: "नहीं, जहाँपनाह, इसमें हमारे शास्त्र और पुराण का हवाला देकर बतलाया है कि भीमसेन पाण्डव का लट्ठ है। भीमसेन पाण्डव इसका क्या उपयोग करते थे यह पुराण की बात है। इसमें केवल इतना ही लिखा है।"

"तो जिस पुराण का हवाला इस लेख में है, उसमें क्या बात बतलायी गयी है भीमसेन की बाबत?"

"जहाँपनाह, वह बात पुराण पढ़कर बतला सकूँगा। जब से मेरे ऊपर जजिया लगा है तब से पैसे की इतनी चिन्ता में लगा रहता हूँ कि पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता।"

"तुम्हारा जजिया उतने दिन के लिए माफ़ किया जाता है जितने दिन में तुम पुराण पढ़कर इस शिला-लेख की सब बातें बतला सको।" ब्राह्मण को मानना पड़ा—इस समय कुटाई-पिटाई से बचे, जैसी एक और की हुई थी, और, कम से कम कुछ दिन का जजिया तो न देना पड़ेगा, सम्भव है भविष्य और भी कुछ सुधर जाये। ब्राह्मण मुहलत लेकर चला गया।

फीरोजशाह ने इतनी मेहनत, इतनी सावधानी से उस लाट को वहाँ से उखड़वाकर दिल्ली ले जाने में की कि दूर-दूर तक उसकी ख्याति फैली। सुननेवाले दंग रह गये। पड़ोस के ही क्या अन्तर्वेद से दूर-दूर तक के हजारों आदमी बुलाये गये। अधिकांश सेना उस काम में जुटाई गयी। सैंकड़ों मन सेमल का रूआँ इकट्ठा करवाया गया। सेमल के रुएँ की गाँठें बना-बनाकर लाट के आस-पास रखी गयीं कि खुदाई होने पर जब लाट लटके या गिरे तब किसी प्रकार की भी उसे क्षति न पहुँचने पाए। खुदाई होते-होते जब लाट एक ओर लटकी और गिरी, तब उसे एक खरोंच तक नहीं लगी। लाट को नरम रुई और पशुओं की खालों में लपेटा गया। एक गाड़ी बनायी गयी या यों कहिये कि एक भारी-भरकम गाड़ा बनाया गया जिसमें बड़े-बड़े बयालिस पहिये थे। हजारों आदमियों की सहायता से लाट इस तरह उठाकर उस गाड़ी पर लादी गयी जैसे कोई नवजात शिशु को सावधानी के साथ उठाकर पालने में लिटाये। गाड़ी चलाने के लिए बैल नहीं जोते गये—दो-चार भी उनमें से भड़क गये, क्योंकि जानवर ठहरे, तो लाट को नुकसान पहुँच जाएगा, शायद टूट ही जाए—टूटी तो फीरोजशाह का राज्य शायद बीच में ही समाप्त हो जाए और आगे की एक पीढ़ी तक भी न पहुँचे। तो गाड़ी खींचने के लिए साढ़े आठ हजार मजदूर लगाये गये। किसी तरह लाट यमुना तक आ गयी। फिर बहुत बड़ी-बड़ी नावों से पार लायी गयी और किसी तरह बड़ी सावधानी के साथ फीरोज कोटला पहुँचायी गयी।

उस ब्राह्मण के पास समाचार और बुलावा भेजा गया। ब्राह्मण ने आकर निवेदन किया: "जहाँपनाह, डर के मारे मेरे घरवालों ने पुराण इधर के उधर कर दिये थे। अब पता लगा है। दूर पहाड़ों में हैं। मैं वहाँ से ले आने के लिए जानेवाला ही था कि बुलावा आ गया। जहाँपनाह, लाट को ठिकाने से खड़ा करवा दें तब तक मैं पहाड़ों से पुराण लाता हूँ। फिर पढ़कर सब बतला दूँगा।"

ब्राह्मण को और समय मिल गया। फीरोजशाह ने कुशल से कुशल कारीगरों की सहायता से लाट लगवायी। लगभग पचास फीट ऊँची थी। इसकी एक चौथाई नीचे गाड़ी गयी, बाकी ऊपर रही। तैयारी में काफी समय लगा। फीरोजशाह ने उसके शीर्ष पर ताँबे का कलश भी चढ़वाया, जिस पर सोने के पत्र मढ़े थे। आखिर क्यों न करता! जिस शिला पर हजारों बरस पहले लिख दिया गया हो कि सिवाय कलियुग में होनेवाले शहंशाह सुल्तान फीरोजशाह तुगलक के और कोई भी इस लाट को यहाँ से न हटा सकेगा, उसकी उतनी इज्जत-खातिर क्यों न हो? परन्तु एक समस्या हल होने के लिए बाकी थी—लाट वहाँ गाड़ी क्यों गयी? पुराण में इसके बारे में और क्या लिखा है? जब तक ब्राह्मण आये एक और लाट का पता फीरोजशाह को लगा। यह शिवालिक पर्वत श्रेणी के नीचे थी। ब्राह्मण ने भी सुन लिया कि फीरोजशाह ने लाट को बहुत आदर-सम्मान प्रदान किया है—उसके सिरे पर कलसा तक चढ़ा दिया है!

ब्राह्मण आया। दूसरी लाट के लेख के सम्बन्ध में पहले प्रश्न हुआ।

ब्राह्मण ने बतलाया—"जहाँपनाह, इसमें भी वही लिखा है। दूर-दूर तक ऐसी लाटें खड़ी मिलेंगी। कलियुग के लोगों को हर जगह सावधान कर देने के लिए ही ये लाटें हजारों बरस पहले खड़ी की गयीं थीं। परन्तु दिल्ली में उन सबको उठाने की आवश्यकता नहीं है। एक ओर आ जाए तो बहुत होगा।"

बादशाह ने मान लिया। वह उस ब्राह्मण पर प्रसन्न था। अब सवाल रह गया था लाट के पौराणिक इतिहास का।

"पढ़ लिया तुमने अपना पुराण?" फीरोजशाह ने पूछा।

"जहाँपनाह, मैंने पढ़ लिया, परन्तु पुस्तक यहाँ नहीं ले आ सका हूँ, क्योंकि पहाड़ों में जहाँ पहुँच गयी थी, वहीं के एक नातेदार ने रख ली है।"

"कोई हर्ज नहीं। तुमने पढ़ तो ली है। सुनाओ पत्थर की लिखावट में से पुराण का जो हवाला है उसमें तुमने क्या पाया?"

"जहाँपनाह, भीमसेन पाण्डव पाँच भाई थे। यह सब से बड़ा था। उसमें इतना बल था कि पेड़ उखाड़कर फेंक देता था, पहाड़ उठाकर इधर से उधर धर देता था।"

फीरोजशाह के एक आलिम ने, जो इतिहास लिखता और पढ़ता भी था, समर्थन किया: "खुदावन्द, मैंने भी उसके बारे में पुरानी तारीखों में यही पढ़ा है। एक हजार मन खाना रोज खाता था वह। उस जमाने में उसका मुकाबला कोई भी नहीं कर सकता था।"

"जहाँपनाह!" ब्राह्मण बोला— "पत्थर की ये भारी-भरकम लाटें उसी भीमसेन के लट्ठ हैं।"

"भीमसेन के लट्ठ हैं!" फीरोजशाह को आश्चर्य हुआ।

उस आलिम ने फिर समर्थन किया: "जहाँपनाह, भीमसेन के भाई उनके बड़े दुश्मन थे। भीमसेन को इन भाइयों के ढोर चराने पड़े। उस जमाने के जानवर भी तो बहुत बड़े होते थे। ये लाटें भीमसेन के लट्ठ थे, जिनसे वह जानवरों को हाँकता-चराता था।"

ब्राह्मण ने कहा—"हुजूर, ये पाँचों भाई दिल्ली के निकट ही रहते थे।"

"जरूर रहते होंगे", फीरोजशाह ने विश्वास प्रकट किया—"बड़े-बड़े जानवर के चराने लायक जंगल मेरठ के पास से लेकर हिमालय की तली तक फैले होंगे। वह सबेरे निकल पड़ता होगा अपने ढोर लेकर और सैकड़ों कोस घूमकर शाम के वक्त दिल्ली लौट आता होगा। इसलिए लाटें मेरठ से लेकर हिमालय तक मिलती हैं।"

ब्राह्मण ने व्याख्या की—"श्रीमान्, उसका स्वर इतना भारी और ऊँचा था कि जब चिल्लाता था, पृथ्वी काँप उठती थी। ढोरों को इकट्ठा करने के लिए जब हाँक लगाता था, ढोर गोबर कर देते थे!"

फीरोजशाह ने तुरन्त टोका—"म्याँ, तुम्हारी समझ में इतनी ही तो कमी है। अगर भीमसेन की हाँक से ढोरों का वह हाल हो जाता था, जैसा कि तुमने बयान किया, तो इन लाठियों या लट्ठों की क्या जरूरत थी? असल में बात यह है कि भीमसेन हो या मीर हमजा या सोहराब रुस्तम! अकेली आवाज से उतने और वैसे जानवर काबू में नहीं रखे जा सकते थे। बात ठीक यह है कि ये लाटें भीमसेन के लट्ठ ही हैं, जिससे वह जानवरों को चराता-हाँकता था।"

ब्राह्मण ने तुरन्त अपनी गलती स्वीकार करके हाँ भरी।

आलिम ने पुष्टि की: "जहाँपनाह, बड़ी पुरानी तारीखों में मैंने भी यही पढ़ा है। अब ये लाटें बन्दापरवर हुजूर के इकबाल के सबूत बनकर हमेशा खड़ी रहेंगी।"

उस समय किसी को क्या मालूम था कि पाँच सौ वर्ष उपरान्त इन लाटों के लेख पढ़ लिये जायेंगे और ये भीमसेन के लट्ठ न रहकर अशोक के स्तम्भ हो जायेंगे।

—वृंदावनलाल वर्मा