इस बरसात में हम कई जिलों की यात्रा पर थे। मानसून लगभग पूरे देश को अपने आगोश में ले चुका है। लोक संस्कृति में रुचि रखने के कारण हम यात्रा के दौरान उस जिले की लोकल खबरों को बड़े ध्यान से पढ़ते हैं। इस यात्रा में हमने हर जिले के अखबार में लोकल पन्ने पर एक ही शीर्षक से समाचार छपा हुआ देखा। "नगर निगम की पोल खुल गई"! बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक, महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा तक एक की खबर। ऐसा लगता है जैसे पूरे देश के अखबारों ने तय कर लिया है, बरसात के मौसम में नगर पालिका या नगर निगम की "पोल खुल गई" वाला समाचार रोज छापना है। कहीं नाला उफान पर है तो कहीं शहर की चिकनी सड़क बरसाती पानी के साथ भाग गई! मुझे लगा कहीं अखबार वाले पिछले साल की खबरों को तो नहीं छाप रहे। पर लोगों से बात करने पर पता चला, नहीं अभी जो स्थित है, पिछले साल से भी बदतर है। बरसात के साथ ही "पोल खुल गई" वाला मौसम हर साल आता है।
एक शहर का लोकल पत्रकार टकराया। हमने पूछा एक ही शीर्षक वाली खबर सारे देश के अखबारों के लोकल पन्ने पर क्यों है। हमने उससे कहा कम से कम आप तो इसे "कलई खुल गई" शीर्षक से छाप सकते थे। उसने मुझे घूरा और कहा, लोग अब पीतल के बर्तन नहीं रखते, जिनमें कलई होती थी। हम आम आदमी की समझ वाले शीर्षक देते हैं। कलई को लेकर भी भ्रम है। कोई कलई खुलना कहता है तो कोई कलई उतरना। हम इस दुविधा में नहीं पड़ते। हमने एक आम पाठक से पूछा, क्या बरसात में नगर निगम की पोल खुल गई के बारे में आप जानते हैं। उसने कहा, नहीं। इस बरसात में हमारे घर के सामने बिजली का पोल उखड़ गया है, शायद इसलिए पोल खुल गई वाला समाचार छपा है। दूसरे पाठक ने बताया पोल का तो पता नहीं पर हमारे मोहल्ले की सड़क पर बनी पुलिया खुल गई है। अब पानी दुकानों में भर रहा है। शायद पुलिया खुलने को ही पोल खुलना कहा जा रहा है। मेरे सामान्य ज्ञान में काफी वृद्धि हो चुकी थी।
बरसात आती है तो सब झूमने लगते हैं। बाढ़ के दौरान नगर आयुक्त को आप फोन करना चाहें कि आपके मोहल्ले में नाव चाहिए तो वह फोन हरगिज़ नहीं उठाएगा। दरअसल उसकी गलती नहीं है। सारी गलती शायर की मानी जाएगी जिसने लिखा है__
"आई बरसात तो सब झूमने लगे। सावन ने पेड़ पौधों को भी मोर कर दिया।"
ये सरकारी मोर केवल नाचते ही नहीं, अपने घर में बैठकर पकौड़े भी खाते हैं।
पर पब्लिक को कोई शायरी मुसीबत में अच्छी नहीं लगती। इस बीच एक खबर यह भी छपी कि एक गांव में बाढ़ का पानी घरों में घुसा तो गांव वालों ने सरपंच को ही पीट दिया। यह सुविधा अभी तक शहरों को नहीं मिली है। आशा है इसी तरह का माहौल रहा तो शहर भी इससे लाभान्वित हो सकते हैं।
बहरहाल, धुआं जब आंखों को चुभने लगे तो हवन कुंड से दूर हो जाना लाजिमी है। इसमें पंडित जी से पूछने की जरूरत नहीं होती। शहर के बाशिंदे अब खुद नाव का इंतजाम कर रहे हैं। बरसात के दिनों में दुनिया के सब छल प्रपंच जिम्मेदार व्यवस्थापक अधिकारी के कार्यालय में शिफ्ट हो जाते हैं। आखिर उन्हें भी तो सुरक्षित स्थान चाहिए न। आम आदमी मोबाइल की टॉर्च से बरसात में सड़क ढूंढ़ता है। उधर व्यवस्था, दांत भींचे और जबड़े सटाए हुए, अंधेरों का सतत उत्पादन कर रही होती है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी पोल खुल गई वाला समाचार रोज छप रहा है। बरसात में कीचड़ होना ही होना है। इसमें कोई कुछ नहीं कर पाता।
बरसात में पब्लिक परेशान है, इसका सियासी नेताओं को बेहद अफसोस है। उनकी अफसोस वाली किस्तबंदी देखते ही बनती है! पत्रकार "पोल खुल गई" वाले शीर्षक से समाचार छाप कर सियासत के मोरपंखी सपने तोड़ने की कोशिश अवश्य करते हैं पर तोड़ नहीं पाते। बरसात में हमारे देश का "संपूर्ण स्वच्छता अभियान" अक्सर नगर निगम या नगर पालिका के दफ्तर में जाकर आत्महत्या कर लेता है! पत्रकार रोज रोज पोल खोलने वाले समाचार छाप रहे हैं। वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। पर जिम्मेदार मुख्य अधिकारी उन्हें बुद्धू समझता है। सही भी है, तलवार से पानी को चीरना युद्ध नहीं है, बुद्धू होने की निशानी है। पर ये अधिकारी यह भूल जाते हैं, अपने ही वृत्त में खेली जा रही लुका छिपी अंततः पकड़ में आ ही जाती है।
पब्लिक बहुत भोली भाली है। वह स्वार्थ के चौराहे पर संबंधों की तलाश करती है। सम्बन्ध बरसात की तबाही में नहीं मिल सकते। वे चुनावों तक ही सीमित होते हैं। बरसात में तो सियासत की जलकुंभी तक बाहर आने को उद्धत हो जाती है! हुकूमत हर बरसात में मदद के नाम पर एक पर से, सौ कौए तैयार कर लेती है। जब काल पात्र में गड़ा सच, किसी न किसी दिन बाहर आता ही है तो पोल खुलने से भी सच बाहर आयेगा ही। हमारे देश की पब्लिक धैर्य रखना जानती है।
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