लिफ्ट में मिस्टर के साथ उतरते हुए डॉगी को भी साथ ले लिया। मैडम ने डॉगी को कमांड दिया- "नो, नो, स्टे दिस साइड।" डॉगी नहीं खिसका, तो मिस्टर ने कहा- "जैकी, इधर इधर।" मैडम की भौंहें थोड़ी तन गयीं। लिफ्ट में एक और मैडम ने कहा- "यूअर जैकी डजन्ट अंडरस्टैंड इंग्लिश?" चेहरा थोड़ा कसमसा गया। लगा कि सभ्यता के पायदान पर नीचे आ गये हैं।
घर पहुंचकर सास-ससुर से कहा- "आप लोग डॉगी को ठीक से कमांड नहीं देते। हमेशा कहते हैं- जैकी! इधर इधर। सोफे पर नहीं। थोड़ा सा सिखाइए। यह लर्निंग स्टेज है। अभी सीख गया तो मल्टी की सभ्यता में नीचे नहीं देखना पड़ेगा।"
सास ससुर तो हिन्दुस्तानी जबान रचे थे। पर तभी डॉगी दादा-दादी के पास चला गया। बच्चे की तरह दुलारने लगी दादी। बोली का सा स्नेह पाकर डॉगी चिपका हुआ था। अब वे अंग्रेजी-हिन्दी तो क्या बोली में सटाये हुए थे।
डॉगी इस फ्लैट में लाड़ला है। तीनों पीढ़ियों का अकेला किरदार। कभी सोफे पर। कभी गैलरी में। गोचारण की तरह मॉर्निंग-इवनिंग वाक। मल्टी की सभ्यता में बिन अंग्रेजी के सिक्का जमता नहीं है। मगर दादा-दादी, मम्मी-पापा उसे एलकेजी-यूकेजी में बिना इंग्लिश के ट्रेनिंग दे रहे हैं। यों मैडम डॉगी को इंग्लिश मीडियम की ऑर्डर कमान में ले आती हैं। सुबह-शाम श्वान-चारण ... ना... ना वाक के समय भी इंग्लिश छाई रहती है। वाक के दौरान देसी श्वानों से दुबककर पूंछ चिपकाए डॉगी मालिक के हाथ में डंडे से अपने को थाने की तरह सुरक्षित पाता है।
यों अकेला डॉगी और संवाद की तीन पीढ़ियाँ। बॉडी लैंग्वेज खूब समझता है। सूट-बूट में आए मेहमान को देखकर निगाहों ओर सिहरनों से मुस्कुराता सा है। कोई ऐसा- वैसा आए तो घूरता-बिदकता है। पर समस्या बॉडी लैंग्वेज की नहीं लैंग्वेज की है।
अब डॉगी की कोई मातृभाषा तो है नहीं। जो है, उसे मोटा-मोटा भांप लेते हैं। वैसे मशीनी नार्को या लाई-टेस्ट भी कितना ताड़ पाते हैं। पर नवदंपति भी मल्टी सभ्यता में डॉगी को देसी से मीडिया इंटरनेशनल बनाए बगैर चुप नहीं होते। डॉगी की मुश्किल यह कि दादा-दादी का बोली संवाद सीखे या मम्मी-पापा की हिन्दुस्तानी जबान में उतर आए। या अंग्रेजी ऑर्डर में सिट, गो देयर, ईट ब्रेड, कम, नो-नो... से यूकेजी पास करवा दें। तीन पीढ़ियाँ और थ्री लैंग्वेज फार्मूला तो यों भी जाम। स्नेह के धागे दादा-दादी, मम्मी-पापा की बोली में सिलाई कर देते हैं। पर अंग्रेजी क्रेडिट कार्ड के बिना मल्टी का एक्सचेंज रेट अप नहीं हो पाता। आखिर जैकी भी सुपर क्लास एक्सप्रेशन की कसौटी जो है।
डॉगी अकसर दादा-दादी, मम्मी-पापा से सटा रहता है। पर नवदंपति डॉगी को यूकेजी में इंग्लिश में ही डांट लगाते रहते हैं। सहमा सा डॉगी दादा-दादी की राह पकड़ ले, तो मैडम-मिस्टर उसे अबाउट टर्न करवा देते हैं।
इन दिनों डॉगी को टी. वी. रोग लग गया है। और जब से केबीसी शो देख लिया तो न पलकें झपकती हैं, न लटकी हुई जीभ अंदर जाती है। साफ सुनने के चक्कर में लंबी सांसें भी नहीं भरता। उसे अचरज होता है। हॉट सीट पर बैठे बच्चे से ठिठोली करते अमिताभ जी जब कहते हैं- कंप्यूटर जी, कंप्यूटर महाशय डी पर ताला लगाइए। तो लगता है कि ये "मालिकाना आर्डर जैसे गुस्सैल नहीं हैं।" बच्चा जब हँसते हँसते बतियाता है- "हम जानते हैं कि आप उत्तर बताने से पहले कुछ देर ठिठके क्यों रहते हैं? आप की आंखों में बचपन सी शरारत नजर आती है।" और डॉगी को लगता है कि ये नोनो, स्टैण्ड अप, ईट इट, डॉन्ट सिट जैसे आर्डर उसे कितना छिटका देते हैं। और ये महानायक बच्चे को भी "जी" लगा रहे हैं। और तो और, कभी कंप्यूटर को जी तो कभी कंप्यूटर महाशय कह रहे हैं।
अगर जमाना थोड़ा और हाई-फाई हो जाए तो लगता है कि लोग डॉगी जी की पीठ पर मॉर्निंग-इवनिंग वॉक के समय छोटे से बैग में 'टैब' रख देंगे। न होगा तो चिप लगवा देंगे। आखिर मॉल में नयी नस्ल को ब्रांडेड और स्पेशल दिखना ही चाहिए।
…पर डॉगी जी टीवी पर आंखें गड़ाए हैं। बच्चे की हाजिरजवाबी देखकर महानायक पूछते हैं- "आपके साथ कौन आए हैं?" बच्चा उत्तर देता है- "मेरे माता-पिता।" पूछते हैं- "कहाँ हैं?" और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ये केबीसी के "जी वाले" महानायक हिन्दुस्तानी का बाजार खड़ा कर देते हैं। डॉगी को लगता है कि इसी बोली से स्वाद और स्नेह के गोंद से चिपके संवाद में दादा-दादी के साथ पसर जाए। मगर तभी अंग्रेजी डांट से घबराया डॉगी का 'महाशय जी' तो स्वाहा हो जाता है। गंवई बोली की छुअन और माँ-बाप की आत्मीय हिन्दुस्तानी से निकलकर वह तनी हुई अँग्रेजी मुद्रा में इंग्लिश इंटरनेशनल हो जाता है। अब डॉगी जी महानायक के सामने यह गाना तो गाने से रहे--
"मैं पसंद हूं किसी और की
मुझे हाँकता कोई और है।"
-बी एल आच्छा
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नॉर्थ टाउन अपार्टमेंट
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चेन्नई, तमिलनाडु, पिन-600012