
एक बार शेखचिल्ली की माँ ने उसे आठ आने का तेल लाने के लिए बाज़ार भेजा। शेखचिल्ली खुशी-खुशी दुकान पहुँचा और दुकानदार के सामने गिलास बढ़ा दिया।
दुकानदार ने गिलास में छह आने का तेल भरा और बोला,
“बस बेटा, अब गिलास में और तेल डालने की जगह नहीं है।”
यह सुनते ही शेखचिल्ली अकड़ गया। बोला,
“नहीं-नहीं! मुझे पूरे आठ आने का तेल चाहिए।”
दुकानदार झुँझलाकर बोला,
“अरे भई, अब तेल कहाँ डालूँ?”
तभी शेखचिल्ली की ‘अकल’ चमकी। उसने झट से गिलास उल्टा किया और उसके पेंदे में बने छोटे से गड्ढे की ओर उँगली दिखाकर बोला,
“जो दो आने का तेल बचा है, उसे यहाँ डाल दो!”
दुकानदार ने जैसे ही वहाँ तेल डाला, गिलास के ऊपर भरा हुआ सारा छह आने का तेल छपाक! से ज़मीन पर फैल गया।
शेखचिल्ली निश्चिंत होकर गिलास लेकर घर पहुँच गया।
माँ ने पूछा,
“तेल ले आया?”
शेखचिल्ली बोला,
“हाँ माँ, पूरा आठ आने का!”
यह कहते हुए उसने गिलास सीधा किया, ताकि माँ पेंदे में बचा हुआ तेल देख सके।
पर गिलास सीधा होते ही वह थोड़ा-सा तेल भी टपककर नीचे गिर गया।
माँ गुस्से से उसे देखती रह गई और शेखचिल्ली मासूमियत से गिलास घूरता रहा—
मानो सोच रहा हो कि तेल आखिर गया कहाँ!
[भारत-दर्शन संकलन]