राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

रैदास के पद

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 रैदास | Ravidas

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥

Back
More To Read Under This
रैदास के पद -2
Posted By Surender Pal Bhatia Nastic(SPBN)   on Friday, 02-Oct-2015-14:32
शब्दस ऑफ़ जगत गुरु रविदास जी
Posted By vikram sahu   on Friday, 11-Oct-2013-12:10
ऐसे महान भक्त भारतीय साहित्य में अनुपम हैं. .......... बारम्बार नमन हमारा .................
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें


Deprecated: Directive 'allow_url_include' is deprecated in Unknown on line 0