हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

बाबा | हास्य कविता

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

दूर बस्ती से बाहर
बैठा था एक फ़क़ीर
पेट से भूखा था
तन कांटे सा सूखा था।

बस्ती में फ़क़ीर की ऐसी हवा है
कहते हैं -
बाबा के पास हर मर्ज़ की दवा है।

आस-पास मिलने वालों की भीड थी
कोई लाया फूल, किसी के डिब्बे मे खीर थी।

फ़क़ीर से माँग रहे थे वे सब
जिनके मोटे-मोटे पेट थे
देखने में लगते सेठ थे।

बाबा के आगे शीश नवाते थे
फल, फूल, मेवे चढ़ाते थे
बदले में जाने क्या चाहते थे!

बाबा अपनी धुन में मस्त
कभी-कभी आँख उठाते थे,
'इनका पेट ना भरा, ना भरेगा'
सोचकर मुसकाते थे
फिर अपने आप में खो जाते थे।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश