जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

सोऽहम् | कविता

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

करके हम भी बी० ए० पास
           हैं अब जिलाधीश के दास ।
पाते हैं दो बार पचास
           बढ़ने की रखते हैं आस ॥१॥

खुश हैं मेरे साहिब मुझ पर
           मैं जाता हूँ नित उनके घर ।
मुफ्त कई सरकारी नौकर
           रहते हैं अपने घर हाजिर ॥२॥

पढ़कर गोरों के अखबार
           हुए हमारे अटल विचार,
अँग्रेज़ी में इनका सार,
           करते हैं हम सदा प्रचार ॥३॥

वतन हमारा है दो-आब,
           जिसका जग मे नहीं जवाब ।
बनते बनते जहां अजाब,
           बन जाता है असल सवाब ॥४॥

ऐसा ठाठ अजूबा पाकर,
          करें किसी का क्यों मन में डर ।
खाते पीते हैं हम जी भर,
          बिछा हुआ रखते हैं बिस्तर ॥५॥

हमें जाति की जरा न चाह,
          नहीं देश की भी परवाह ।
हो जावे सब भले तबाह,
          हम जावेंगे अपनी राह ॥६॥

- चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
  [सरस्वती 1907 में प्रकाशित गुलेरी जी की रचना]

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