परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।

साँप!

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 अज्ञेय | Ajneya

साँप!

तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना-

विष कहाँ पाया?

- अज्ञेय

 

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Posted By nirmala   on Friday, 02-Oct-2015-12:00
इतने कम शब्दों में इससे बड़ी बात नही कही जा सकती
 
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