वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

हँसी का इनजेक्सन | बाल कविता

 (बाल-साहित्य ) 
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रचनाकार:

 दिविक रमेश

दादा-पोता संवाद

क्या होता है बी.पी दादू
हुआ आपको सब कहते जो?
मुस्कान देख कर तेरी बस 
दौड़ कहीं पर जाता है जो।

पर बेचैन आपको करता
कहती दादी मुझको दादू।
अरे नहीं, ये बी.पी क्या हॆ
बहुत स्ट्रांग हैं तेरे दादू।

‘अच्छा फिर तो पिट्टी कर दो
बी.पी. की अब झट से दादू।‘

‘पर इनजेक्सन ज़रा हँसी का
पहले आकर मुझे लगा तू!’

-दिविक रमेश 

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