हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। - गोपाललाल खत्री।

हिंदी में न्यूजीलैंड का माओरी साहित्य

 (विविध) 
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रचनाकार:

 रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

न्यूजीलैंड में तीन भाषाएं आधिकारिक रूप से मान्य हैं-- अंग्रेजी, माओरी और सांकेतिक भाषा। हिन्दी न्यूज़ीलैंड में सर्वाधिक बोली जाने वाली पाँचवीं भाषा है।

माओरी न्यूजीलैंड के मूल निवासी हैं। इनका लोक साहित्य व्यापक है। यूँ तो न्यूज़ीलैंड की हिंदी यात्रा नौ दशकों से भी अधिक की हो चुकी है लेकिन न्यूज़ीलैंड के साहित्य के अनुवाद इत्यादि पर अभी बहुत काम नहीं हुआ। इस देश व यहाँ के जनजीवन की जानकारी अवश्य 20वीं सदी के तीसरे दशक में हिंदी में प्रकाशित हुई। न्यूज़ीलैंड पर लिखा गया सबसे पहला आलेख 1930 के ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित हुआ था। इस आलेख के लेखक डॉ. बलवंत सिंह शेर थे। आलेख का शीर्षक था, ‘न्यूज़ीलैंड में जीवन’। ‘विशाल भारत’ का संपादन उस समय के सुप्रसिद्ध पत्रकार बनारसीदास चतुर्वेदी करते थे।

1931 में प्रकाशित ‘पृथ्वी के अन्वेषण की कथायें’ पुस्तक में जगपति चतुर्वेदी ने न्यूज़ीलैंड की खोज और यहाँ के निवासियों की चर्चा की है। न्यूज़ीलैंड को पहली बार डच नाविक एबेल तस्मान (Abel Tasman) द्वारा देखा गया लेकिन वह इसी भ्रम में रहा कि यह ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का ही एक भूभाग है। इस पुस्तक में एबेल तस्मान की न्यूज़ीलैंड के माओरी कबीलों से मुठभेड़ का भी वर्णन है। वह यहाँ से निराश होकर अपनी आगे की यात्रा पर निकल गया। एबेल तस्मान के आगमन के पश्चात एक सदी से भी अधिक बीत जाने पर कैप्टन जेम्स कुक द्वारा न्यूज़ीलैंड खोजा गया।

1930 व 1931 में प्रकाशित हिन्दी आलेखों में न्यूज़ीलैंड के निवासियों का उल्लेख तो हुआ लेकिन अभी तक न्यूज़ीलैंड के जनजीवन और यहाँ के निवासियों की अधिक जानकारी हिंदी साहित्य में नहीं थी।

1950 में तत्कालीन सांसद तथा हिंदी के साहित्यकार सेठ गोविंददास भारत से न्यूज़ीलैंड के आधिकारिक दौरे पर आए थे। वे भारत से न्यूज़ीलैंड के दौरे पर आए पहले ऐसे भारतीय थे जिन्होंने न्यूज़ीलैंड  के अपने दौरे को हिंदी में लिपिबद्ध किया। सेठ गोविंददास महात्मा गांधी के निकट सहयोगी रहे थे। वे यहाँ ‘कॉमनवैल्थ पार्लियामेंटरी कॉन्फ्रेंस’ में 5 सदस्यी भारतीय प्रतिनिधि मण्डल का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने न्यूज़ीलैंड, फीजी और ऑस्ट्रेलिया की यात्रा की और 1951 में इन तीनों देशों पर ‘सुदूर दक्षिण पूर्व’ नामक पुस्तक लिखी। यह पुस्तक 1951 में आदर्श प्रकाशन, जबलपुर व प्रगति प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई थी। 

सेठ गोविंददास भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात आधिकारिक तौर पर भारत से न्यूज़ीलैंड आने वाले पहले शिष्टमंडल का नेतृत्व कर रहे थे  वे अपनी पुस्तक में इसकी पुष्टि करते हुए लिखते हैं, “न्यूज़ीलैंड में आज तक भारत का कोई सार्वजनिक कार्यकर्ता नहीं आया था। पहले पहल हम ही लोग यहाँ आये थे।”

अपनी पुस्तक के बारे में गोविंददास लिखते हैं, “...जब न्यूजीलैंड जाने वाले भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नामों को घोषणा हुई और यह घोषित किया गया कि इस प्रतिनिधि मंडल के नेतृत्व का भार मुझे सौंपा गया है तब ऐसे कुछ मित्रों ने जिन्होंने मेरी अफ्रीका यात्रा पर लिखी हुई पुस्तक को पढ़ा था, मुझसे न्यूजीलैंड पर भी कुछ लिखने के लिये कहा। मेरा स्वयं भी अपनी इस समूची यात्रा पर कुछ न कुछ लिखने का विचार हुआ। अफ्रीका पर जो पुस्तक मैंने लिखी थी वह वहाँ से लौटते हुए, जहाज में लिखी थी। समय बचाने के लिये मेरी यह यात्रा हवाई जहाज से हुई। भारत लौटकर अन्य कामों में फिर से बुरी तरह फँस जाने की आशंका थी इसलिये इस यात्रा में ही मैंने इस पुस्तक का अधिकांश भाग समाप्त कर लिया।“

50 के दशक में भारत के लोग यूरोप और अमेरिका से तो परिचित थे लेकिन दक्षिण प्रशांत से अधिक परिचित नहीं थे। इस बारे में गोविंददास लिखते हैं, “...यह पुस्तक उन देशों से संबन्ध रखती हैं जहां का हमें योरोप और अमेरिका से भी कहीं कम ज्ञान है इसलिये मुझे विश्वास है कि इसे पढ़ने में पाठकों का कुछ न कुछ चाव अवश्य होगा।“

इस प्रकार किसी भारतीय द्वारा न्यूज़ीलैंड पर हिंदी में पुस्तक लिखने का श्रेय सेठ गोविंददास को ही जाता है। इस पुस्तक में उन्होंने न्यूज़ीलैंड के यूरोपियन और माओरी लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी दी है। उनके कुछ अनुभव काफी रोचक हैं, न्यूज़ीलैंड के एक नगर के बारे में वे लिखते हैं, “'रोटारुआ' माओरी भाषा का नाम था। ज्ञात हुआ कि न्यूज़ीलैंड में जहाँ तक स्थानों का संबन्ध है अधिकतर स्थानों के नाम माओरी भाषा के ही पुराने नाम हैं। उन्हें बदला नहीं गया है। यह बात न्यूज़ीलैंड में ही हुई है ऐसा नहीं, पुराने स्थानों के नामों को बदलने का प्रयत्न औरंगजेब के सदृश धर्मान्धों ने चाहे किया हो, परन्तु संसार में अधिकतर ऐसे प्रयत्न नहीं हुए हैं। इसका कारण कदाचित् यह भी है कि प्रचलित पुराने नामों के स्थान पर नये नामों का प्रचार बड़ी कठिनाई से होता है।

लंच के समय हम रोटारुआ पहुँचे और भोजन के बाद शहर घूमने निकले। साफ-सुथरा छोटा सा शहर । इतने पर भी सारी आधुनिक चीजें और सुविधायें मौजूद बड़ा अच्छा बाजार, होटलें, सिनेमाघर इत्यादि सब कुछ।

रोटारुआ में और उसके आस-पास माओरी जाति अधिक रहती है; न्यूज़ीलैंड का यह विभाग अधिकतर माओरियों से ही भरा हुआ है। आज रात को हमारा माओरियों द्वारा स्वागत हुआ, जिसमें माओरी नृत्य भी दिखाया गया तथा माओरी गान भी सुनवाया गया।“

उपर्युक्त पुस्तक के अतिरिक्त 1957 में प्रकाशित एक पुस्तक, ‘संसार के कुछ आश्चर्य’ में श्री व्यथित ह्रदय का एक रोचक आलेख ‘देश, जहां गर्म जल मिलता है’ प्रकाशित हुआ। इसमें न्यूज़ीलैंड के बारे में रोचक जानकारी दी गई है, “संसार विचित्रताओं का भंडार है! जिस ओर देखो, उसी ओर वैचित्र्य! इसीलिए तो बहुत से लोगों का कहना है, प्रकृति अपनी अनोखी कृतियों से मनुष्य के साथ खिलवाड़ करती है। यदि प्रकृति अपनी कृतियों से मनुष्य के साथ खिलवाड़ न करे, तो मनुष्य उसकी सत्ता ही न स्वीकार करे! कुछ भी हो, प्रकृति का भंडार बड़ा अनुपम है। इतना अनुपम है कि, बुद्धि उसका अनुभव भी नहीं कर सकती। हमारे देश में जब लोग भोजन बनाने के लिये तैयार होते हैं, तो सबसे पहले उन्हें अग्नि की आवश्यकता पड़ती है। बिना अग्नि के लोग अपना भोजन पका नहीं सकते, किन्तु संसार में एक ऐसा भी देश है, जहां मनुष्यों को अपना भोजन पकाने के लिए अग्नि की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहां बिना अग्नि ही के लोग अपना भोजन पका लिया करते हैं। हमारे देश में भोजन पकाने में अग्नि जो काम करती है, वहां वही काम जल करता है। इसी लिए तो लोग उस देश को गर्म जल का देश कहते हैं। उस देश का नाम न्यूज़ीलैंड है।“ इसी लेख के अंत में लिखा है, “माओरी बच्चों में सब से बड़ी विशेषता यह होती है कि, वे चलने-फिरने के पहले ही तैरना सीख जाते हैं।“

लेखक न्यूजीलैंड की तुलना भारत एवं अन्य देशों के साथ करते हुए आगे लिखता है, “न्यूजीलैंड की तरह और भी कई देशों में गर्म जल के फ़ौवारे पाये जाते हैं। हमारे देश में भी बहुत से गर्म जल के सोते हैं, किन्तु न्यूजीलैंड के गर्म जल के फ़ौवारों में जैसी विशेषता है, वैसी शायद और किसी देश के गर्म जल के सोतों में नहीं है। इसी लिए तो भूगोल शास्त्र के एक बहुत बड़े ज्ञाता ने लिखा है, न्यूजीलैंड के गर्म जल के फ़ौवारे प्रकृति की एक अनूपम देन हैं।“

माओरी लोक साहित्य से हिंदी का परिचय पहली बार ‘90 के दशक में न्यूज़ीलैंड के विदेश मंत्रालय की एक पुस्तिका, ‘न्यूज़ीलैंड के बारे में’ से होता है। न्यूज़ीलैंड में प्रकाशित इस पुस्तक में पहली बार किसी माओरी लोक कथा का हिंदी अनुवाद उपलब्ध करवाया गया था। सुंदर साज-सज्जा के साथ, हिंदी की यह लोक कथा, ‘माओई कथा’ शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई। अर्द्ध-देवता माओई की चमत्कारी उपलब्धियों का उल्लेख करने वाली यह लोक-कथा हिंदी में अनूदित पहली माओरी लोक-कथा थी।

1993 में भारत में एक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक था, ‘विश्व की प्रतिनिधि लोक-कथाएं’। आत्माराम एंड संस के इस प्रकाशन के संपादक थे, ‘श्रीकृष्ण’ और इस पुस्तक में ‘माउई, आग लाने वाला’ नामक न्यूज़ीलैंड की लोक-कथा प्रकाशित हुई थी। इसके लेखक मनोहर वर्मा हैं। वे न्यूज़ीलैंड के निवासी तो नहीं है लेकिन वे लोक-कथा साहित्य में एक जाना पहचाना नाम हैं। उन्होंने ‘बाइबिल की लोक कथाएँ’ नामक पुस्तक भी लिखी हैं।

न्यूज़ीलैंड व यहाँ के लोक-साहित्य से संबन्धित उपर्युक्त सामग्री के अतिरिक्त भी न्यूज़ीलैंड से संबन्धित कुछ रिपोर्ट मिली है। वर्ष 2013 में हिंदी में ‘न्यूज़ीलैंड : एन एक्सपोजर विजिट (रिपोर्ट)’ लिखी गई थी। जनवरी, 2013 में यूरोपियन कमीशन के ‘एक्सपोजर  विजिट’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘छत्तीसगढ़ शासन आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग’ का एक 5 सदस्यीय शिष्टमण्डल न्यूज़ीलैंड के दौरे पर आया था। इस शिष्टमण्डल का नेतृत्व छत्तीसगढ़ के मंत्री केदार कश्यप कर रहे थे। अपने दौरे के दौरान वे ऑकलैंड, रोटारुआ और फांगारे गए।  शिष्टमण्डल यहाँ माओरी समुदाय द्वारा संचालित  विद्यालयों व मराए (Marae) का भी दौरा किया और वे माओरी सांसद ‘होने हाराविरा’ (Hone Harawira) से भी मिले।

यद्यपि माओरी लोक साहित्य काफी समृद्ध है तथापि 2018 तक हिंदी में माओरी लोक साहित्य पर अपेक्षित काम नहीं हुआ। वर्ष 2018 में न्यूज़ीलैंड की लेखिका प्रीता व्यास की माओरी लोक-कथाओं की पुस्तक ‘पहाड़ों का झगड़ा’ राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (National Book Trust of India) द्वारा प्रकाशित हुई। हिंदी में माओरी लोक-कथाओं की यह पहली पुस्तक है। माओरी लोक-कथाएँ हिंदी में लिखना सरल कार्य न था। वे कहती हैं, “पिछले काफी समय से मैं न्यूजीलैंड की लोक कथाओं पर काम कर रही थी। उसी का परिणाम यह माओरी लोक कथाओं की पुस्तक, आज आपके हाथ में है।

प्रीता व्यास अपने एक साक्षात्कार में इस पुस्तक की चर्चा करते हुए कहती हैं, “हर देश की लोक-कथा वहां के खान पान व शैली के कारण भिन्न होती है, जैसे भारतीय लोक-कथाओं में अधिकतर राजकुमार, राजा-रानी व परियों इत्यादि की कल्पना की जाती है, वहीं माओरी लोक कथाओं में अधिकतर समुंदर, मछली, अन्य समुद्री जंतु व जादुई शक्तियां होती हैं।

लोक कथाओं में एक बड़ी समानता भी रहती है, उसके पात्रों में शक्ति पाने की। जादुई शक्ति पाने की इच्छा कि मेरे पास जादुई शक्तियां हो! शैलीगत अंतर होने के बावजूद लोक-कथाओं में धरती, आकाश, पाताल विद्यमान रहते हैं।“

वर्ष 2022 में भारत की आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर न्यूज़ीलैंड की पत्रिका भारत-दर्शन और न्यूज़ीलैंड में भारत के उच्चायोग ने माओरी कहावतों के हिन्दी प्रकाशन की परियोजना बनाई। एक कार्यक्रम के दौरान भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त, ‘मुक्तेश कु॰ परदेशी’ ने कहा कि स्थानीय साहित्य विशेषतः न्यूज़ीलैंड की जानकारी और माओरी सामग्री भी हिंदी में उपलब्ध होनी चाहिए। भारत-दर्शन इस दिशा में पहले से काम कर रहा था यथा भारत की आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर माओरी कहावतों के हिंदी अनुवाद की परियोजना को मूर्त रूप देने पर विचार किया गया। 

इन पंक्तियों के लेखक को माओरी भाषा और लोक-साहित्य का अनुभव है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य मित्र इस क्षेत्र में अनुभव रखते थे, जिनमें प्रीता व्यास ने माओरी लोक-कथाओं पर काम किया हुआ था, डॉ. पुष्पा भारद्वाज-वुड के पास अनुवाद का अनुभव था। उच्चायोग में द्वितीय सचिव के पद पर कार्यरत दुर्गा दास जी भी इस परियोजना को लेकर उत्साहित थे। उच्चायुक्त महोदय की सहमति से एक समिति गठित हुई और काम आरंभ हो गया। हमने 75 कहावतों का लक्ष्य निर्धारित किया।

लोकोक्तियां और कहावतें किसी देश की संस्कृति को सरलता से समझा देती हैं, तभी तो कहा गया, ‘Proverbs are the children of experience’ अर्थात लोकोक्तियां अनुभवों की संतति हैं। यूं तो विश्व भर की कहावतों में समानता देखने को मिल जाती है लेकिन माओरी कहावतों के अध्ययन करने पर भारतीय और माओरी संस्कृति एवं मूल्यों में बहुत समानता देखने को मिलती है। धरती, दर्शन, लोक-व्यवहार और समाज के प्रति समर्पण तो अत्यधिक समानता का भाव लिए हैं।

15 अगस्त 2021 से यह परियोजना क्रियान्वित की और हर सप्ताह चार माओरी कहावतों का ध्येय रखा गया। साहित्य का अनुवाद सरल काम नहीं है, क्योंकि इसका अनुवाद न होकर भावानुवाद होता है। शुरुआत में केवल 75 कहावतों का ही विचार था, जो 19 सप्ताह में हो गईं लेकिन इनको इतना सराहा गया कि इन्हें आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई और सबने सहर्ष 101 माओरी कहावतें करने का निर्णय लिया।

माओरी कहावतों में कई बातों पर ध्यान देना होता है, आपको इनके संदर्भ भी भलीभांति ज्ञात हों, अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने में देर नहीं लगती। दूसरे, आपको भाषा की प्रकृति का भी भान हो। कुछ कहावतें तो विशेष पूर्वज, हप्पु (hapū ) या इवी (iwi) के लिए विशिष्ट हैं। कुछ कहावतों (whakataukī) में शब्दांकन कभी-कभी iwi (जनजाति) से iwi में भिन्न हो जाते हैं।  हालांकि, आम तौर पर मूल संदेश समान रहते हैं। हर भाषा की तरह माओरी भाषा में भी कई बार एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं और मात्र एक दीर्घसूचक चिह्न (Macron) डालने या उसके मात्र स्थान परिवर्तित हो जाने से, अर्थ बदल जाते हैं, जैसे Wahine (महिला) और Wāhine (महिलाएं)।

इस समय सभी भाषाओं में लोकोक्तियाँ (Proverbs) और कहावतें (Sayings) पर्यायवाची हो चुके हैं। वर्तमान में इनके बीच अंतर करना न तो सरल है और न इसकी आवश्यकता है।  फिर भी, हमें यह ज्ञात हो कि कहावत का संबंध कथा से अवश्य होता है लेकिन लोकोक्ति लोक में प्रचलित उक्ति होती है। इन दोनों के अतिरिक्त मुहावरे (Idioms) भिन्न हैं। मुहावरे वाक्यांश के रूप में प्रयुक्त होते है, ये स्वतंत्र वाक्य नहीं होते। माओरी सामग्री संकलित करते हुए हमारा कुछ समय मुहावरों को कहावतों से पृथक करने में भी गया, लेकिन हमारे ज्ञान में वृद्धि हुई, इससे इनकार नहीं। 

इस प्रकार भारत के उच्चायोग और भारत-दर्शन का साझा प्रकाशन ‘माओरी की 101 कहावतें’ प्रकाशित हुआ और 2022 में इसका विमोचन न्यूज़ीलैंड में भारत के उच्चायोग में किया गया। इस पुस्तक में माओरी की कहावतों का हिन्दी भावानुवाद और अँग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध करवाया गया है।

2021 में केंद्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा रोहित कुमार हैप्पी की पुस्तक ‘प्रशांत की लोक-कथाएँ’ प्रकाशित हुई। इसमें न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया एवं फीजी के अतिरिक्त प्रशांत के अन्य द्वीपों सामोआ, टोंगा, रारोटोंगा (कुक आइलैंड) इत्यादि की लोक-कथाएँ भी सम्मिलित की गई हैं।

लेखक ने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है, “हालांकि पूरे विश्व की लोक-कथाएँ अनेक भाषाओं में प्रकाशित हैं लेकिन हिंदी में प्रशांत की लोक-कथाएँ पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। इन लोक-कथाओं को प्रकाशित करने का मुख्य उद्देश्य हिंदी पाठक वर्ग को प्रशांत के लोक-साहित्य से परिचित करवाना है। प्रत्येक देश के लोक-जीवन और लोक-वार्ता में अटूट संबंध है तभी तो लोक-जीवन की परम्पराएं और लोक-साहित्य में एकरूपता देखने को मिलती है। प्रशांत के अधिकतर द्वीपों के नायक एक से हैं, उनकी कथा-कहानियाँ भी एक सी हैं। न्यूज़ीलैंड, सामोआ, टोंगा, रारोटोंगा की लोक-कथाओं का आधार भी एक सा ही है।“

लोक-कथाओं में कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं। वे कहीं सूरज को बांध लेते हैं, कहीं चाँद को क़ैद कर लेते हैं। कभी आदमी से दैत्य बन जाते हैं, तो कभी पक्षियों से साक्षात्कार करते हैं। इनकी कल्पनाएँ अद्भुत हैं। इनमें पहाड़ चलते और बोलते हैं। पहाड़ों के भाई-बहन हैं, उनकी शादी भी होती है।  कभी-कभी मनुष्य पहाड़, नदी, वृक्ष इत्यादि में बदल जाते हैं। न्यूज़ीलैंड में ऐसी कोई नदी, पहाड़ या स्थान न होगा जिसकी कोई कथा न हो। इसी तरह प्रशांत के अन्य द्वीपों में भी हर जगह की एक कहानी है।

वैसे तो इस आलेख में पहले डच नाविक एबेल तस्मान (Abel Tasman) और कैप्टन जेम्स कुक का उल्लेख हुआ है लेकिन माओरी लोक-साहित्य की माने तो न्यूज़ीलैंड की खोज की कहानी कुछ और ही है। माओरी समाज की पौराणिक कहानी के मुताबिक न्यूज़ीलैंड, जिसे माओरी लोग आओटियारोआ कहते हैं। इसकी तलाश कुपे नाम के एक मछुआरे ने रंगातिरा नाम के एक जनजातीय मुखिया के साथ मिलकर की थी। ये लोग एक टापू के रहने वाले थे। कुपे के मछली मारने के ठिकानों पर ऑक्टोपस हमला कर रहे थे। वो मछलियों को फंसाने के लिए डाला गया चोगा खा जाते थे।

मछुआरों को शंका हुई कि ये ऑक्टोपस दूसरी जनजाति के मुखिया मुतुरांगी के हैं।

कुपे ने मुतुरांगी से कहा कि वह अपने पालतू ऑक्टोपस को उसका मछलियों को फांसने वाला चोगा खाने से रोके। मुतुरांगी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, इसपर क्रोधित कुपे ने उस ऑक्टोपस को मार डालने की शपथ ले ली। वो अपना घर-बार छोड़कर ऑक्टोपस की खोज में निकल पड़ा। प्रशांत महासागर में ऑक्टोपस की तलाश के दौरान ही कुपे न्यूज़ीलैंड के द्वीपों पर आ पहुंचा। वहां कुपे और रंगातिरा उतरे और अपनी नाव पर खानपान की चीजें रखीं। इसके बाद ऑक्टोपस से कुपे और रंगातिरा का भयंकर समुद्री युद्ध हुआ।

माओरी लोक साहित्य के अनुसार ये लड़ाई आज की कुक जलसंधि पर हुई थी। आखिरकार कुपे ने मुतुरांगी के पालतू ऑक्टोपस को मारने में कामयाबी हासिल कर ही ली। इस जीत के बाद कुपे ने न्यूज़ीलैंड के उत्तरी द्वीप का चक्कर लगाया और कई ठिकाने का नामकरण किया। कुपे ने शपथ ली कि वह अपनी तलाश की हुई इस नई जमीन पर दोबारा कदम नहीं रखेगा। इस लोक-कथा के अनुसार न्यूज़ीलैंड पर कदम रखने वाला पहला व्यक्ति कुपे था। अब आगे से कभी न्यूज़ीलैंड की खोज की चर्चा-परिचर्चा हो तो एबेल तस्मान (Abel Tasman) और कैप्टन जेम्स कुक के अतिरिक्त आपको कुपे का नाम भी याद रहे।

वर्तमान में न्यूज़ीलैंड के माओरी लोक-साहित्य में रुचि बढ़ रही है और अनेक नए प्रकाशन आ रहे हैं। यह निःसन्देह हर्ष का विषय है। 

रोहित कुमार ‘हैप्पी’
संपादक, भारत-दर्शन, न्यूज़ीलैंड
ईमेल: editor@bharatdarshan.co.nz

* लेखक न्यूज़ीलैंड से प्रकाशित इंटरनेट पर विश्व के पहले हिन्दी प्रकाशन ‘भारत-दर्शन’ के संपादक हैं। आप वर्ष 2020 के लिए मध्य प्रदेश शासन द्वारा ‘राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान’ से अलंकृत किए गए हैं।

[विश्व हिन्दी पत्रिका 2023, विश्व हिन्दी सचिवालय,मॉरीशस] 

 

संदर्भ

  • शेर बलवन्त सिंह. (1930, जनवरी). न्यूज़ीलैंड का जीवन. (चतुर्वेदी बनारसीदास, Ed.) विशाल भारत, 5, 36–40.
  • जगपति चतुर्वेदी. (1931). पृथ्वी के अन्वेषण की कथायें: कुक की यात्रायें (प्रथम).
    छात्र हितकारी पुस्तकमाला, दारागंज-प्रयाग.
  • गोविन्ददास. (1951). सुदूर दक्षिण पूर्व. आदर्श प्रकाशन जबलपुर भारत.
  • व्यथित हृदय. (1957). संसार के कुछ आश्चर्य : जहां गर्म जल मिलता है. आर्य प्रकाशन
    भारत.
  • विद्याबन्धु त्रिपाठी. (1965). ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूज़ीलैंड . किताब घर भारत.
  • मनोहर वर्मा. (1993). विश्व की प्रतिनिधि लोक-कथाएं: माउई, आग लाने वाला (श्रीकृष्ण,
    Ed.). आत्माराम एंड संस भारत.
  • भारत-दर्शन ऑनलाइन हिंदी पत्रिका. (1997). https://www.bharatdarshan.co.nz/
  • छत्तीसगढ़ शासन आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग. (2013). न्यूज़ीलैंड :
    एन एक्सपोजर विजिट (प्रथम). छत्तीसगढ़ शासन.
  • प्रीता व्यास. (2018). पहाड़ों का झगड़ा: माओरी लोक कथाएँ. राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत.
  • रोहित कुमार हैप्पी. (2021). प्रशांत की लोक-कथाएँ. केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा.
  • रोहित कुमार हैप्पी. (2021). न्यूज़ीलैंड की हिंदी यात्रा. केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा.
  • रोहित कुमार हैप्पी. (2022). माओरी की 101 कहावतें (रोहित कुमार हैप्पी, पुष्पा
    भारद्वाज-वुड एवं प्रीता व्यास, अनुवाद.; प्रथम). भारत का उच्चायोग एवं भारत-दर्शन  
    पत्रिका न्यूज़ीलैंड.
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