हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

तक़दीर और तदबीर

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi

तक़दीर 
यह तदबीर से बोली तक़दीर हँसकर--
नहीं कोई दुनिया में मेरे बराबर।

मैं दम भर में जो चाहूँ करके दिखा दूँ,
भिखारी को राजों का राजा बना दूँ।

करम-रेख कहते हैं मुझको जहाँ में,
ज़रा सोच जी में, कहाँ तू कहाँ मैं?

मुझे अपने सिर पर जगह सबने दी है,
मेरे हाथ में सबकी नेकी-बदी है।

मैं बनती हूँ तो काम बनते हैं सारे, 
मैं बिगड़ूँ तो है कौन जो कुछ सँवारे? 

चमकते हैं जो आसमाँ पर सितारे, 
फिरूँ मैं तो दम भर में फिर जाँय सारे।

मैं मारूँ तो है कौन जो आ बचाए!
बचाऊँ तो ताकत किसे जो सताए !

जो बदलूँ बदल जाय सारा ज़माना,
करे बैर की बात अपना बिगाना।

न करती जो मैं राज दुनिया में आकर, 
तो हो जाते छोटे-बड़े सब बराबर। 

जहाँ में मेरी बात सबसे बड़ी है, 
मेरी चाह हर एकको हर घड़ी है।

है कोई ऐसा मुझे जो न माने, 
मेरे भेद को आदमी कैसे जाने ? 

मेरे सामने तेरी है क्या हक़ीक़त? 
बता गर तू रखती है कोई करामत।

तदबीर
यह सुन बात तदबीर भी हँसके बोली, 
झड़े फूल मुँह से ज़बाँ जब कि खोल-- 

बहन, जो कहा तुमने सब वह सही है, 
बड़ाई मगर तुमको मुझसे मिली है।

करम-रेख हो तुम यह मैं जानती हूँ,
तुम्हारे गुणों को मैं पहचानती हूँ।

मैं मददगार हूँ और सहारा
न मुझ बिन चले काम कोई तुम्हारा।

मेरी चाल होती है सबसे निराली,
नहीं है मेरी बात मतलब से खाली।

जहाँ में जो रौनक़ नज़र आ रही है,
मेरी ही करामात दिखला रही है।

ज़मीं मैंने जोती, फसल मैंने बोई, 
न होता अगर नाज जीता न कोई।

ये सब बाग मेवों के मैंने लगाए, 
मज़ेदार मीठे सभी फल चखाए।

यह फूलोंकी क्यारी जो लहरा रही है,
मेरी रंगतें सबको दिखला रही है।

जो कपड़े हैं याँ रेशमी और ज़रीके,
नमूने हैं सब मेरी कारीगरी के।

हकीमों को मैं ही बताती हूँ हिकमत,
भरी है कलों में मेरी ही करामत।

मैं लोहे को देती हूँ सोने की कीमत,
मेरा हाथ लगने से खुलती हैं किस्मत।

जहाँ में जो है आदमी ने बनाया, 
वह सब मेरी हिकमत ने जलवा दिखाया। 

जो इक तख़्त ताऊस तुमने सुना है, 
वह मेरी ही कारीगरी से बना है ।

जो है ताज-बीबी का रौज़ा अनोखा, 
बनाया है मैंने, नहीं इसमें धोखा।

जो चाहूँ अभी आग को ख़ाक कर दूँ,
लगा हाथ नापाक को पाक कर दूँ।

सिखाऊँ वह कारीगरी आदमी को,
अचंभा जिसे देख हो हर किसी को।

ज़रा देख तू रेल को तार ही को,
मिले इनसे आराम कितना सभी को। 

'एयरशिप' है वह चीज़ भरकर, 
कि उड़ने लगे आदमी उसमें बेपर।

तेरी बात को भी मगर मानती हूँ, 
मैं अच्छी तरह तुझको पहचानती हूँ।

मेरे काम सब हैं तेरे आसरे पर, 
बिना मेरे हैं तेरे सब काम अबतर।

जो मैं और तू साथ हों तो मज़ा हो, 
मिलें जिसको दोनों वह सबसे बड़ा हो।

-आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 


शब्दार्थ 

तक़दीर - भाग्य, क़िस्मत, Fate, destiny, luck, fortune.
तदबीर - उपाय; युक्ति; तरकीब, Tactic, remedy, solution.
करम-रेख - कर्म-रेखा, The lines of Fortune.
हकीकृत - हस्ती, अस्तित्व, Existence. 
ज़मीं जोतना - हल चलाना, To till the land, To Plough.
करामत करामात, Miracle.
नाज - अनाज, Corn.
ज़रीके-सोनेके, Of Gold.
जलवा - शोभा, तड़क-भड़क, Light 
तख्त ताऊस - मोरकी शक्ल का सिंहासन, Peacock-Throne.
रौज़ा - क़ब्र, मकबरा, समाधि, Tomb.
पाक - पवित्र, साफ़, Pure.
अबतर - बुरे, ख़राब, बिगड़े हुए, Spoiled.

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