यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

छोटा-सा लड़का

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 श्रद्धांजलि हजगैबी-बिहारी | Shradhanjali Hajgaybee-Beeharry

शून्यता में झाँकती, पथराई आँखें, प्रश्नों को सुलझाने में लगी थीं । सन्नाटा इतना कि दिल को कचोट लेती। हल्की-सी गर्म हवा बह रही थी। ऐसे ही बीती थी वो शाम, घर के पीछे वाले बरामदे में बैठे हुए, मैं और भाई। और दोनों चुप... मानो कोई जीव है ही नहीं।

बचपन के किस्से मुझे हमेशा से लुभाते रहे हैं। लेकिन उस दिन भाई ने कुछ ऐसा कह दिया था, कि मन में उठा तूफ़ान आज तक शांत नहीं हो पाया।

गुस्सा, घृणा, ग्लानि, दर्द और उदासीनता के सम्मिश्रण से उपजा एक ऐसा एहसास था, जो उनके चेहरे पर छाया हुआ था । बचपन की तो आधी से ज़्यादा बातें मुझे याद भी न थीं। भाई ने बात कुछ इस तरह शुरू की--"छोटा-सा लड़का, 10 साल का, बाप के मर जाने के बाद घर का सामान खरीदने दुकान पहुँचा। पिताजी का अकाउंट था वहाँ, क्योंकि हर महीने उधार पर राशन आता था। …और जब पिताजी पैसे जुटा पाते तब उधार भरते!
पिताजी ने मरने से पहले सारा उधार चुका दिया था । लेकिन आगे के उधार के लिए कोई प्रावधान तो किया ही नहीं था। छोटा-सा लड़का हाथ में थैला लिए दुकान पहुँचा उधार पर सामान खरीदने। दुकानदार ने उस दिन माँ-बहन की ऐसी गाली दी थी...वह छोटा-सा लड़का आज तक घर वापस नहीं आया। उसका छोटा-सा मन वहीं कहीं दफ़न हो गया। दुकानदार ने उसे गाली देते हुए दुकान से बाहर ढकेल दिया । उसने थैला उठाया और चलने लगा । किस दिशा में उसे कोई सुध न थी। वह सोचता रहा कि ऐसा क्या हुआ, क्या मैं छोटा हूँ.. मैं गरीब हूँ... मेरे पास पैसे नहीं... हमारा अकाउंट बंद हो गया.... या मेरा बाप मर गया है ... इसलिए दुकानदार ने उधार देने से मना कर दिया।

घर पहुँचते ही माँ के पूछने पर उसने जवाब दिया-– “दुकान आज बंद है, शायद बड़े साहब के यहाँ पार्टी चल रही है।” घर पहुँचते-पहुँचते वह छोटा-सा लड़का बड़ा हो गया था। अगले दिन पता चला कि बगल वाले दुकानदार साहब इस भद्दे दुकानदार से कहीं अच्छे आदमी हैं। चावल, आटे की बोरी को पीठ पर लादकर ग्राहक के घर तक पहुँचाने के लिए, झाडू-पोंछा लगाने के लिए
और दुकान में सामान सजाने के लिए पूरे 10 रुपये मिले थे, उस छोटे-से लड़के को। लेकिन 10 रुपये में घर का राशन नहीं मिल पाया।

लम्बे मौन के बाद, ब्लाक कॉफ़ी की एक चुस्की लेते हुए, भाई ने कहा--"जीवन ने मुझे 3 बड़ी बातें सिखा दीं--एक, कुछ लोग अपनी और अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं, दूसरा, कुछ लोग अपनी प्राप्त संपत्ति से ही खुश हैं और तीसरा, कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनी नियति से परे कुछ कर दिखाने की सामर्थ्य रखते हैं, अपने लिए और अपने परिवार के लिए।
ये स्वार्थ की बात नहीं... बस दर्द की ... और दर्द के बाद की स्थिति की बात है...."

उस दिन शाम देर तक हम दोनों वहीं बैठे रहे, घर के पीछे वाले बरामदे में, मैं और भाई...

[विश्व हिन्दी साहित्य, 2019]

-श्रद्धांजलि हजगैबी-बिहारी, मॉरीशस
 ई-मेल: hajgaybeeanjali@gmail.com

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