यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

संक्रान्ति

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti

सूनी सड़कों पर ये आवारा पाँव
माथे पर टूटे नक्षत्रों की छाँव
कब तक
आखिर कब तक ?

चिन्तित माथे पर ये अस्तव्यस्त बाल
उत्तर पच्छिम, पूरब, दक्खिन- दीवाल
कब तक
आखिर कब तक ?

लड़ने वाली मुट्ठी जेबों में बन्द
नया दौर लाने में असफल हर छन्द
कब तक
आखिर कब तक?

-डॉ॰ धर्मवीर भारती

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