यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

पुर तानह लौट यानि तानह लौट मंदिर

 (विविध) 
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रचनाकार:

 प्रीता व्यास | न्यूज़ीलैंड

तानह लौट मंदिर
तानह लौट मंदिर में लेखिका, 'प्रीता व्यास' 

(प्रीता व्यास की सद्य प्रकाशित पुस्तक 'बाली के मंदिरों के मिथक' से एक मंदिर की कथा)

पहले भाषा इंडोनेशिया के कुछ शब्द जान लेते हैं-- पुर (Pura)- मंदिर परिसर , चंडी (Candi)- मंदिर, तानह (Tanah)- भूमि, मिट्टी, लौट (Lot)- समुद्र, तानह लौट (Tanah Lot)- समुद्र में से बाहर आई (लौटी) भूमि, बतारा सेगारा (Batara Segara)- समुद्र देवता, देवा (Dewa)- देव या देवता, सिलेनडांग (Selendang)- शॉल, दुपट्टा, केरिस (Keris)- कटार। 

बाली की राजधानी का नाम है डेनपसार। यहाँ से उत्तर- पश्चिम की ओर लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर है ताबानान और वहीँ है ये मंदिर। समुद्र की लहरों के बीच तीन सौ मीटर ऊँची उठी चट्टान पर बना हुआ है ये। इसका निर्णाण भी पंद्रहवीं सदी में उन्हीं हिंदू साधु डेंग ह्यांग निरार्था (Dang Hyang Nirartha) द्वारा किया गया जिनको उलूवातू के निर्माण का श्रेय दिया जाता है।

मजे की बात है कि उलूवातू में काफी बंदर हैं और कहते हैं कि ये बंदर दरअसल डेंग ह्यांग निरर्थ के सैनिक हैं जिन्हें डेंग ह्यांग निरर्थ ने अपने मोक्ष के दिन से ठीक पहले अपनी शक्तियों का प्रयोग करके बंदरों में बदल दिया था, जो अब मंदिर की रखवाली के लिए तैनात रहते हैं लेकिन इस मंदिर (तानह लौट) के नीचे भूमि में कई छोटी-छोटी गुफाएं सी हैं जिनमें काली-सफ़ेद धारियों वाले काफी जहरीले सांप हैं। इनके बारे में कहते हैं कि डेंग ह्यांग निरर्थ ने यहाँ से जाने से पहले अपना सिलेनडांग हिला कर अपने कुछ अनुयाइयों को सांपों में बदल दिया था और तब से वे मंदिर की रखवाली के लिए तैनात रहते हैं।

जब मैं इस मंदिर को देखने गई तो मुख्य मंदिर के समीप एक छोटी गुफा में एक स्थानीय पुजारी ने बहुत से ऐसे काली सफ़ेद धारियों वाले सांप दिखाए और कहा कि इनका स्पर्श करने से आपके ऊपर की बुरी नज़र दूर होती है। ये भाग्य लाते हैं। हालाँकि इस स्पर्श के लिए कुछ फीस लगी थी लेकिन मैंने ये दुस्साहस किया।

बाली की समुद्री सीमाओं की बुरी शक्तियों से रक्षा के उद्देश्य से बने हैं सात मंदिर। इनमें से उलूवातु एक है, दूसरा तानह लौट। शेष पांच मंदिर हैं- पुर पुलकी, पुर गेडे पेरांचक, पुर रामबुत सिवी, पुर मास सुका और पुर साकेनान।

...तो कहानी जो सुनाई जाती है वो कुछ यूँ है कि सदियों पहले पूर्वी जावा के दाहा साम्राज्य में एक हिंदू पुजारी रहा करता था। नाम था उसका डेंग ह्यांग निरर्थ। कुछ लोग उसे डेंग ह्यांग द्विजेन्द्र के नाम से भी पुकारते थे। लोग कहते थे कि वह बहुत पहुंचा हुआ पुजारी है जिसने व्रत-उपवास और ध्यान-साधना से कई सिद्धियां भी प्राप्त की हैं। काफी मान था उसका। ये तब की बात है जब बाली और जावा के बीच समुद्र नहीं था।

एक बार डेंग ह्यांग निरर्थ को राज्यादेश मिला कि वह धर्म प्रचार के लिए यात्रा करे और स्थान-स्थान पर मंदिरों का निर्माण करवाए। सो उसने यात्रा करने की ठानी और वह चल दिया अपने ठिकाने से और घूमता-घामता आ पहुंचा बाली। यहाँ उसने कई मंदिरों का निर्माण किया। तानह लौट भी उन्हीं में से एक है।

बाली में उस समय दालेम वातुरेंगगोंग (Dalem Waturenggong) का राज चलता था। राजा दालेम वातुरेंगगोंग ने डेंग ह्यांग निरर्थ की आवभगत की और उनके हिन्दू धर्म प्रचार के मिशन को जानकार प्रसन्नता व्यक्त की। इस तरह निरार्था को प्रचार की अनुमति मिली। कहते हैं कि बाली द्वीप के सौंदर्य पर रीझे डेंग ह्यांग निरर्थ ने जिन स्थलों को अपनी साधना के लिए चुना वहां उसने बाद में मंदिरों का निर्माण किया।

कहते हैं कि एक दिन निरर्थ को द्वीप के उत्तर- पश्चिम की ओर एक अद्भुत दैवीय प्रकाश दिखाई दिया। उन्होंने उस प्रकाश की दिशा में चलना आरम्भ किया और जहाँ पहुंचे वहां बना है ये मंदिर - तानह लौट। ये मंदिर मुख्य रूप से समुद्र देवता (Bhatara Segara or Dewa Baruna) की उपासना के लिए बनाया गया। एक अर्थ में कहा जा सकता है कि ये वरुण देवता का मंदिर हैं।

भतारा सेगारा (Bhatara Segara), इस नाम पर गौर करें, संभवतः भतारा आया है- भरतार (भरण-पोषण करने वाला) से और सेगारा आया है सागर (समुद्र) से।

निरर्थ से जुड़ीं जो जानकारियां मिलती हैं उनके अनुसार, उस जगह पर पंद्रहवीं सदी में गाँव था बेराबान ताबानान (Beraban Tabanan) जिसका प्रमुख था बेनदेसा बेराबान सक्ति (Bendesa Beraban Sakti). वह एकेश्वरवादी था और वह नहीं चाहता था कि निरर्थ वहां किसी हिंदू मंदिर का निर्माण करें। उसने उनका भरसक विरोध किया और उनकी साधना में भी भरसक विघ्न डाले।

निरर्थ ठान चुके थे कि इस स्थान पर मंदिर का निर्माण होगा क्योंकि दैवीय प्रकाश का दिखाई देना इसका संकेत है कि ये ईश्वरीय इच्छा है। सो एक दिन ध्यान के समय अपने तपोबल से उन्होंने भूमि के एक बड़े खंड को मुख्य द्वीप की भूमि से काट कर अलग कर दिया और उसे कुछ दूर समुद्र में ले जा कर स्थापित कर दिया। इस तरह बना स्थल तानाह लौट यानि समुद्र के बीच से झांकती पृथ्वी।

इस चमत्कार को देख कर गांव का प्रमुख बेनदेसा बेराबान सक्ति निरर्था का भक्त हो गया। ना सिर्फ बेराबान सक्ति बल्कि पूरा गाँव निरार्था को मानने लगा और हिन्दू धर्म के प्रति सहज झुकाव दिखाने लगा। बाद में इस टुकड़े पर भव्य मंदिर का निर्माण हुआ जो कई जीर्णोद्धारों के बाद आज भी स्थानीय साधकों के साधना स्थली और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

निरर्थ के वहां से जाने से पहले दो बातें हुईं। पहली तो ये कि गांव के प्रमुख बेनदेसा बेराबान सक्ति को उन्होंने एक केरिस उपहार में दी और कहा कि जब तक ये केरिस गाँव में रहेगी और इसकी पूजा होगी तब तक गाँव के पेड़ -पौधे सदा हरे रहेंगे, खूब फलेंगे-फूलेंगे। बताते हैं कि ये केरिस आज भी पुरी केदिरी में स्थापित है और साल में दो बार मंदिर में धार्मिक आयोजन के दौरान इसे निकाल कर पूजा जाता है। इस केरिस की उपस्थिति आशीर्वाद देती है और गाँव में हमेशां भरपूर पैदावार होती है।

दूसरी बात का ज़िक्र मैंने शुरू में किया था, वो ये कि इस मंदिर (तानह लौट) के नीचे भूमि में कई छोटी-छोटी गुफाएं सी हैं जिनमें काली-सफ़ेद धारियों वाले काफी जहरीले सांप हैं जिनके बारे में कहते हैं कि डेंग ह्यांग निरार्था ने यहाँ से जाने से पहले अपना सिलेनडांग हिला कर अपने कुछ चुने हुए अनुयाइयों को सांपों में बदल दिया था और तब से वे मंदिर की रखवाली के लिए तैनात रहते हैं। पूजा की रात्रि (मध्यरात्रि से भोर के बीच) वे मनुष्य बन जाते हैं लेकिन उस समय मंदिर में किसी को जागने की अनुमति नहीं होती।

तो ये हैं समुद्र के बीच उभरी विशाल चट्टान पर स्थित, समुद्र देवता या वरुण देवता की पूजा वाले, काली- सफ़ेद धारियों वाले साँपों की निगरानी में खड़े, सुन्दर दृश्यावली वाले पुर तानाह लौट की दिलचस्प कहानी।

--प्रीता व्यास

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