हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

आधी रात का चिंतन | ललित निबंध

 (विविध) 
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रचनाकार:

 डॉ. वंदना मुकेश | इंग्लैंड

‘सर’ के यहाँ घुसते ही लगा कि शायद घर पर कुछ भूल आई हूँ। लेकिन समझ में नहीं आया। अरे, आप सोच रहे होंगे , ये ‘सर’ कौन हैं? तो बताऊँ कि ‘सर’ हैं डॉ. केशव प्रथमवीर, भूतपूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग पुणे विद्यापीठ। कब गुरु से पितृ-तुल्य हो गये, पता ही नही चला। ...और भारत–यात्रा पर बेटी पिता से न मिले वह तो संभव ही नहीं है। सो पुणे पँहुचते ही रात सर के पास रुकने की तैयारी से चल दी। दिमाग में घूम रही थी उनकी वह दीवार जिसपर पुस्तकें ही पुस्तकें सजी हैं। मेरे सोने की व्यवस्था कर के सर बात्रा ‘सर’ के पास सोने चले गये।

उनके कमरे में रखे किताबों के भंडार को देख कर मैं बहुत ही उत्साहित हो रही थी कि रात-रात में सारी किताबें पढ़ लूँगी किंतु सर के जाते ही सोचा कि अगले दिन के लिये पति महोदय को फोन पर कुछ निर्देश दे दूँ, बैग में फोन नहीं मिला । उसे पूरा खंगाल डाला, नहीं मिला । सर जा चुके थे। भारत का नया फोन नंबर जो शाम को ही लिया था मैंने फोन पर ही नोट कर लिया था। टेबल पर सर का फोन था, लपक कर उससे अपनी भानजी गरिमा का नंबर मिलाया । घंटी जा रही थी ... घड़ी देखी ,फिर स्वयं ही फोन काट दिया। मन परेशान हो गया। यह मन भी बड़ा बेईमान है, जो है वह नहीं, जो नहीं है वही चाहिये। फिर गीता-ज्ञान से मन को प्रबोधित करने का प्रयास किया। बेचैनी भरे मन से सकारात्मक विचारों को निमंत्रण देने और दिन भर की थकान से कब आँख लग गई पता ही न चला । वैसे भी रात के ठीक बारह बज रहे थे। सो लेटते ही इस जगत के कार्यकलापों से नाता टूट.........
घड़ी के अलार्म बजने से आँख खुली, सर कह कर सोये थे कि वे सुबह साढ़े पाँच बजे उठकर तैयार होकर छह बजे घूमने निकल जाते हैं। मैंने सोचा, मैं थोड़ा और सो लूँ, सर के आने पर ही उठूँगी। लेकिन अलार्म ने जब तीसरी बार बीप बीप किया तो मैं उठ ही गई। फिर पानी पीकर घड़ी देखी तो दो बजकर तीस मिनिट ही हुए थे। बस फिर क्या था मन को पति महोदय से तुरंत संपर्क करने के लिये परेशान होने का मौका मिल गया। मुश्किल से उसकी लगाम कस के सोने की कोशिश करने लगी। फिर आँख लगी ही होगी कि कुत्तों के रोने से आँख खुल गई। आधी रात की अखंड शांति में कुत्तों का यों रोना! उनकी मनहूस-सी आवाज़ ने परेशान मन को और ज़्यादा विचलित करने में एकदम आग में घी का काम किया। प्रभु से सबके लिये उत्तम स्वास्थ, सुख-शांति की कामना की। फिर मन भटक कर फोन की ओर पँहुच गया। मेरा फोन चार्जर के साथ शायद, जल्दबाज़ी में गरिमा के यहाँ छूट गया। शुक्र है कि लैपटॉप मय चार्जर के, मेरे ही पास था। तभी तो यो आधी रात को आपसे बातें करने बैठ गई।

बचपन की कुछ यादें ताज़ा होने लगी। कई बार मम्मी–पापा सुबह की चाय पर यही चर्चा करते होते कि आज रात भर नींद नहीं आई क्योंकि रात को कुत्ते रो रहे थे। कुत्तों का रोना बड़ा अशुभ माना जाता था। मुझे हँसी आ गई। बेचारा कुत्ता, रोये तो भी आफ़त! रात में तो बच भी जाता है क्योंकि दिन में यदि आस-पास रोये तो मारकर तुरंत उसे भगा दिया जाता था।

मैं सोचने लगी कि कब मैं आखिरी बार में कुत्ते के भौंकने या रोने से जागी होऊँगी? फिर हँसी आई, पिछले पंद्रह वर्षों से इंगलैंड में हूँ तो यह सौभाग्य कैसे प्राप्त होता? यहाँ तो कुत्ते स्वेटर टोपा पहने अपने अच्छे- गुदगुदे बिस्तरों में, सॉफ्ट टॉय लिये सोते होंगे आधी रात को।

सो कुत्तों की गोष्ठी हुई और उसमें ससम्मान अपने इंगलैंड से पधारे मेहमान के पक्ष में निर्णय लिया और इतने वर्षों की कमी पूरी करने में सारी कॉलोनी के कुत्ते बिल्डिंग के ठीक सामने , उस कमरे के नीचे जमा होकर रोने–कूल्हने और भौंकने लगे। तरह-तरह की आवाजें, रात में माहौल को और डरावना बना देती हैं। कुत्तों का भौंकना खत्म हुआ तो एक बिल्ली कहीं आउँ, आऊँ की धमकी देने लगती।

मेरे मन पर बैचैनी हावी होने लगी, जिसे अंग्रेज़ी में एंगज़ायटी कहते हैं। स्वाभाविक है, रामनाम का जाप शुरु होता है। मन नहीं लगा। मैं सोचने लगी कि कुत्ते का रोना अशुभ क्यों होता है। उसे अपने दुख –तकलीफ़ व्यक्त करना क्यों मना है। भई, दुख-तकलीफ़ घड़ी देख कर थोड़े ही न आती है। और मुझे तो लगता है कि घनीभूत पीढ़ा की अभिव्यक्ति को रात की निस्तब्धता में ही होती है। बेचारे कुत्ते! लेकिन बेवक्त अपने दुखड़े का ढंका तो नहीं पीटना चाहिये, समय और मौका टटोल कर ही बात उठाई जाए तो बेहतर...
मेरी दृष्टि में, कुत्ता ही नहीं, रात की निस्तब्धता को भंग करने वाला कोई भी जीव नहीं सुहाता, चाहे उल्लू हो, टिटहरी हो या कोई और... बस फिर उड़ चला मन, कि प्रकृति हमें प्रति पल सिखाती है कि हम कैसे व्यवहार करें, कैसे बोलें, कैसे जागें, कैसे सोयें। लेकिन हम मनुष्य नामधारी जीव आधुनिकता और तकनीकी विकास के नाम पर उसे नज़रअंदाज़ करते हैं। बात बोलने की हैं। सुबह-सुबह पक्षियों की चहचहाट से आँख खुले तो मन भी चहकता है। लेकिन आधी रात टिटहरी बोल पड़े तो मन बैचैन हो जाता है! तो पहला पाठ तो यही कि बेवक्त न बोला जाए। दूसरा पाठ , धीमी आवाज़ में बातचीत की जाए और तीसरा- मीठा बोला जाए।

तीनों बातें ही आधुनिक समाज के मानदण्डों के आधार पर सही नहीं हैं। आज प्रजातंत्र के नाम पर जो अराजक तंत्र चल रहा हैं उसे क्या कहा जाए। बोलने की स्वतंत्रता के नाम पर नेताओं के उलजलूल वक्तव्य, फिर खिसियानी बहस परिणामस्वरूप मोर्चाबंदी, सार्वजनिक जान-माल को हानि....... क्या कुछ नहीं करते यह लोग।

और समाज में यह स्थिति है कि मीठी बानी की दुहाई देते-देते कबीर जैसे कई संत पोथियाँ लिख गये लेकिन हमें तो न तब समझ आई न अब। हमारे कई ऐसे परिचित हैं जो ‘चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी’ के फलसफे पर जीते हैं। सहजता से कोसों दूर। एक परिचिता हैं, अव्वल तो वे खुद होकर कभी फोन नहीं करतीं। उन्हें फोन करो तो उन्हें सारे विश्व के समाचार चाहिये होते हैं और समझदार इतनी कि कोई उनसे कोई उनके परिवार के बारे पूछना-जानना चाहे तो फट से कहती हैं कि अरे काफी देर हो गई आप व्यस्त हैं अब रखती हूँ। दूसरी उनसे भी महान हैं , वे फोन तो स्वयं करती हैं लेकिन पहला वाक्य होता है कि आप व्यस्त होंगी इसलिये बस....। दरअसल दूसरे व्यक्ति की व्यस्तता उन्हें फोन में से दिख जाती है।
बस सचमुच के कुत्ते-बिल्लियों और उल्लुओं के दुखड़े सुनते- सुनते साढ़े पाँच बज गए और देखिये दिन की शुरुआत भी हुई तो काँव-काँव से।

यह हिंदुस्तान है यहाँ सब एक साथ रहते हैं। कुत्ते, गधे , उल्लू , बिल्ली और हमारी क्या बिसात है सो हम इन्हें रोक सकें। प्रजातंत्र तो है ही, सो भइया बोलो, खूब बोलो , बोलते रहो। लेकिन, यहाँ तुम्हारी सुनेगा कौन?

-डॉ वंदना मुकेश
ब्रिटेन

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