हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

रूस के प्रो. लुदमिला खोखलोवा से बातचीत

 (विविध) 
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रचनाकार:

 डॉ संध्या सिंह | सिंगापुर

 “हिंदी दोस्ती की भाषा है, इससे अलग किस्म के सपने पूरे होते हैं।”

प्रोफेसर लुदमिला खोखलोवा जी मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। पिछले 45 सालों से रूस में हिंदी भाषा और साहित्य सिखा रही लुदमिला जी से जानते हैं उनकी जीवन यात्रा के बारे में, उनके शिक्षण के बारे में और हिंदी के बारे में उनके विचार।

आपका बहुत बहुत स्वागत है लुदमिला जी।

आप अपने बारे में और अपने परिवार के बारे में कुछ हमें बताएँ।

धन्यवाद संध्या जी। परिवार ज़्यादा बड़ा तो नहीं है। मेरे पति संस्कृत के प्रोफेसर हैं और हमारे विभाग के अध्यक्ष हैं इसलिए वह घर पर भी मुखिया हैं और विश्वविद्यालय में भी मुखिया हैं। वे हिंदी भाषा शास्त्र और संस्कृत पढ़ाते हैं। मेरे दोनों बच्चे जो कि जुड़वाँ हैं, अब 50 साल के हो गये हैं। यह भी ख़ास है कि वे दोनों शिक्षण से जुड़े हैं। एक बेटा अंग्रेज़ी भाषा सिखाता है और चीनी भी पढ़ाता है और दूसरा भाषा शास्त्र पर काम करता है। अब तो उन दोनों के दो-दो बच्चे हैं। मेरा बड़ा पोता अभी शादी करने के बारे में सोच रहा है। अब आपको मेरी उम्र का अंदाज़ा हो गया होगा!

उम्र तो सिर्फ एक संख्या है लुदमिला जी! वैसे आपका जन्म कहाँ हुआ, पढ़ाई-लिखाई कहाँ से हुई और आप कैसे हिंदी भाषा की ओर आकर्षित हुईं ?

मेरा जन्म ‘कीव’ में हुआ जो यूक्रेन की राजधानी है लेकिन दस साल की उम्र में मैं मास्को आ गई। मेरी विश्वविद्यालय की पढ़ाई मास्को में हुई। मास्को विश्वविद्यालय से मैंने एम. ए. किया और उसके बाद मैंने पी.एच.डी. की। वैसे मैं जब स्कूल में पढ़ती थी, मुझे किताबें मिलीं तो वहीं मैंने रवीन्द्र नाथ ठाकुर को पढ़ा। एक बार एक परीक्षा में मैंने उनके बारे में बताया और जो परीक्षा ले रहे थे उनको रवीन्द्र नाथ ठाकुर के बारे में सुनकर बहुत अच्छा लगा। और इस तरह मुझे रवीन्द्र नाथ के बारे में और जानकारी प्राप्त करने की बहुत इच्छा हुई । फिर भारत के बारे में जानने के लिए, उसका इतिहास जानने के लिए, बहुत सीखने की ज़रूरत थी। सौभाग्य से जब मैं विश्वविद्यालय में थी तो उस समय हमारे यहाँ पढ़ाई का प्रबंध उनके लिए विशेष था जो लोग भारतीय इतिहास या भाषा सीखना चाहते थे। भारत जाने का मौक़ा मिलता था जो अंग्रेज़ी और हिंदी सीखते थे । उस समय दूसरी भाषाएँ भी पढ़ाई जाती थीं जैसे , पंजाबी, उर्दू तमिल मराठी आदि। तो इस तरह मैं हिंदी की तरफ आई।

जब आप भारत गईं तो वहाँ कैसे हिंदी सीखी? ऐसा कुछ जो बहुत अच्छा लगा हो!

वैसे तो मैं भारत बहुत बार गई हूँ लेकिन जब पहली बार भारत तब गई तब मैं पाँचवें साल की विद्यार्थी थी। सोवियत संघ में एक आदान-प्रदान का कार्यक्रम था भारत के बारे में। अगर लोग भारत के बारे में कुछ जानना चाहते हैं तो उनको ज़रूर भारत जाने का मौका मिलता था। हमारे विद्यालय में जो लोग अच्छी हिंदी सीखना चाहते थे उनको भी यह मौक़ा मिल जाता था। और हाँ, वे छात्र पढ़ने में अच्छे होने चाहिए तो इस तरह मैं पहली बार हिंदी सीखने के लिए भारत गई।

मुझे बहुत अच्छी जगह मिली हिंदी सीखने के लिए, जयपुर। अगर आप दिल्ली जाएँगे, तो मेरा चेहरा देखकर सब लोग मुझसे अंग्रेज़ी में बात करेंगे। अगर मैं हिंदी में जवाब दूँगी। तो यह सोचेंगे कि यह महिला सोच रही है हमको अंग्रेज़ी नहीं आती, इसलिए यह बहुत प्रयत्न करके हिंदी बोल रही है। उनके साथ हिंदी में बात करने के लिए बहुत प्रयत्न करना पड़ता है क्योंकि वे लोग हिंदी में बात नहीं करना चाहते और मैं खुश हूँ कि मुझे जयपुर जाने का मौका मिला। वहाँ मैं सिर्फ अकेली रूसी विद्यार्थी थी तो बहुत अच्छा इंतजाम किया गया था। मेरे लिए अलग पढ़ाई का इंतजाम किया गया था । प्रोफेसर भार्गव मुझे संस्कृत पढ़ाते थे और प्रोफेसर नरेंद्र मुझे हिंदी पढ़ाते थे। मेरे दोनों प्रोफेसर बहुत अच्छे थे। मैं हिंदी और राजस्थानी दोनों सीख रही थी। उन्होंने भरसक प्रयत्न किया कि मैं हिंदी और राजस्थानी दोनों अच्छे से सीख सकूँ, इससे मुझे बहुत फायदा हुआ। मेरी पी.एच.डी. का थीसिस था “हिंदी और राजस्थानी का तुलनात्मक अध्ययन।”

‘इमोशनली’ भी मुझे बहुत अच्छा लगा। मैं हमेशा सपने देखा करती थी कि मुझे दोबारा भारत और ख़ासकर जयपुर जाने का मौका मिले। मुझे दोबारा मौका चंडीगढ़ जाने का मिला । वैसे मैं हिंदी पढ़ाना चाहती थी लेकिन उस समय कई हिंदी अध्यापक थे तो मुझे हिंदी पढ़ाने का मौका नहीं मिला तो मेरे प्रोफेसर ने कहा कि अगर तुम कोई जबान पढ़ाना चाहती हो तो तुमको पंजाबी सीखनी पड़ेगी तो इसलिए मैं चंडीगढ़ गई। मैंने पंजाबी सीखी और मेरे विद्यार्थियों ने भी पंजाबी सीखी और अमृतसर में भी मुझे बहुत अच्छे विद्वान मिले जिन्होंने मुझे मदद की। जब मैंने पंजाबी सीखी तो हमारे विदेश मंत्री ने एक नियम लागू किया, जो बहुत गलत नीति थी उस समय की। उनके अनुसार हमको ज़्यादा पश्चिम की ओर देखना चाहिए पूरब की ओर नहीं और इतनी ज़बानें नहीं सिखानी चाहिए लेकिन इसके बाद मुझे हिंदी पढ़ाने का मौका मिला।

आपने कहा कि आप अभी भी पंजाबी सिखाती हैं तो पंजाबी सीखता कौन है? क्या रूसी लोग सीखते हैं?

वैसे मास्को विश्वविद्यालय में ज़्यादातर रूसी लोग ही पढ़ते हैं लेकिन जब चीनी लोग आते हैं तो आपको आश्चर्य होगा वह चीनी ज़बान पढ़ते हैं जबकि हिंदुस्तानी लोग आते हैं तो वे हिंदी नहीं पढ़ते। यहाँ रूसी लोग से मेरा मतलब रूसी नागरिकों से है। उन्हीं में से कुछ लोग पंजाबी की ओर आकर्षित होते हैं।

आपने कहा कि हिंदी के प्रति रुचि रवीन्द्रनाथ टैगोर के कारण जागी तो टैगोर को उसके बाद किन -किन रचनाओं के माध्यम से पढ़ा?

अगर आपको ध्यान होगा तो उस समय हमारी सरकार बहुत ज़्यादा ध्यान देती थी कि भारतीय लेखकों ख़ासकर प्रगतिशील लेखकों का अनुवाद हो। इस तरह रवीन्द्र नाथ को पढ़ने का मुझे सौभाग्य मिला तो उनकी बहुत सारी रचनाएँ, उन रचनाओं का अनुवाद हमारे यहाँ उपस्थित था। मुझे उनका ‘गोरा’ उपन्यास बहुत पसंद है।

‘गोरा’ उपन्यास और बांग्ला में घरे-बाहरे यानी घर-बाहर वह मुझे बहुत पसंद है। इनको पढ़कर गंभीर समस्याओं पर सोच सकते हैं। राष्ट्रवाद आखिर है क्या, यह समझ सकते हैं। उस समय रवीन्द्र नाथ ठाकुर गांधी जी से प्रभावित थे लेकिन वे सोचते थे कि अपने आप का सुधार करना ज़्यादा महत्वपूर्ण है और मानव जाति की भलाई के लिए कुछ करना बहुत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रवाद को वे थोड़ा खतरनाक समझते थे अगर इसको गलत तरीके से समझा जाए तो ठीक नहीं होगा। यह प्यार के बारे में, राजनीति के बारे में, हर किसी चीज़ के बारे में है और मुझे बहुत पसंद है। इस पर फ़िल्म भी बनी थी वह फ़िल्म भी हमारे देश में आई थी और वह भी मुझे बहुत पसंद है। इस तरह मुझे उनकी रचनाओं से प्यार हो गया।

क्या आज भी रूस में हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति की वही ख़ास जगह है जैसा आपने पहले बताया या अब धीरे-धीरे कम या बदलाव हो रहा है?

नहीं, आकर्षण कम नहीं हो रहा है, लोगों में रुचि है। सोवियत संघ के समय बहुत कम लोग हिंदुस्तान जा सकते थे आज ज़्यादा लोग जा सकते हैं और बहुत लोग जाते भी हैं। भारतीय संस्कृति देखते हैं उनको हिंदी गाने, संस्कृति सब बहुत पसंद है।

पहले सोवियत संघ में रेडियो पर हिंदी और दूसरी भाषा में प्रसारण था। पहले प्रगति प्रकाशन में बहुत किताबें छपती थीं, हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की रचनाएँ छपती थीं, उस समय अनुवाद भी बहुत ज़्यादा थे। आजकल भी अनुवाद हो रहे हैं । वैसे उस समय प्रेमचंद, कृष्ण चंद, नागार्जुन, विजेंद्र यादव, कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, शिवमूर्ति, किरण वर्मा, बलराम, भीष्म साहनी आदि इनके बहुत अनुवाद हुए हैं। एक बहुत लंबी सूची है अगर मैं बताने लगूँ तो काफी लंबा समय उसके लिए भी जाएगा। हमारे विभाग में अभी भी दो अध्यापिकाएँ हैं जो साहित्य पढ़ाती हैं और अनुवाद पर काफी काम करती हैं। अभी भी हिंदी साहित्य का अनुवाद है लेकिन हाँ पहले के मुकाबले कम है।

हाँ, पहले के मुकाबले कुछ अच्छा भी है। हमारे समय में, जैसे मैं पुस्तकालय में काम करती थी तो हमारे पास अनुवाद के लिए कुछ आता था तो पहले सूची बनानी होती थी। यह लेखक कौन है, प्रगतिशील है कि यथार्थवादी है या इनकी विचारधारा क्या है आदि। तब वह छपती थी। जबकि आज ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। आप किसी के कार्य का अनुवाद कर सकते हैं और हाँ वह आप चाहें तो छपवा सकते हैं। पहले यह सुविधा नहीं थी, उन्हीं के अनुवाद छपते थे जो शासन की विचारधारा वाले लोग थे। तो दोनों बातें हैं जहाँ पहले अनुवाद बहुत चुने हुए लोगों का होता था लेकिन वह छप जाता था वहीं आज सबका होता है और अपने तरीके से आप उसे छपवा सकते हैं।

एक-दो ऐसी रचनाओं के नाम बताइए जिनका हिंदी से रूसी में अनुवाद हुआ हो और बहुत मशहूर हुई हों।

मैंने कहा कि वैसे तो बहुत बड़ी सूची है लेकिन शायद इसमें मैं कहूँगी उदय प्रकाश की ‘पीली छतरी वाली लड़की’ जो रचना है। यह जवान पीढ़ी के बारे में है इसको हमारे विद्यार्थी बड़ी खुशी से आज पढ़ते हैं। वे देखते हैं कि हिन्दुस्तानी विद्यार्थी क्या सोचते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं तो हमारे पास जो छात्र आते हैं जो हिंदी जानते हैं वह तो हिंदी में पढ़ते हैं लेकिन जो शुरू में हिंदी ज़्यादा नहीं जानते, वे रूसी में पढ़ते हैं। मेरे हिसाब से अनुवाद इसीलिए हर दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

‘चीफ़ की दावत’ वह भी बहुत पसंद की जाती है और वजह आपको मालूम ही होगी; उसकी कहानी। इस कहानी से बहुत सारी समस्याएँ हम दिखा सकते हैं; पीढ़ियों के बीच क्या रिश्ते हो सकते हैं, हम अपने माँ-बाप की बातें कर सकते हैं, कभी-कभी हम सोचते हैं कि वे बुज़ुर्ग हो गए और कुछ नहीं समझते हैं लेकिन जब हम कक्षा में पढ़ते हैं तो हम तथाकथित तुलनात्मक अध्ययन करते हैं कि भारत और रूस में परिवारों में किस तरह की समानता है और यह भी कि सिर्फ हिंदुस्तान में ऐसा होता है या इस तरह की पीढ़ियों की समस्या हमारे देश में भी है। हम अपने माँ-बाप की बातें कितनी मानते हैं। यह हर देश के लोगों की समस्या है इसीलिए तुलनात्मक अध्ययन करना आसान हो जाता है। जैसे मिसाल के लिए जब हम ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पढ़ाते हैं तो हम इतिहास के बारे में भी बात करते हैं। इतिहास के बारे में पाठ्यपुस्तक पढ़ना एक बात है लेकिन उसे महसूस करना दूसरी बात है। जैसे हमने ‘मौत का नगर’ भी पढ़ा। हालाँकि हमारे लिए ऐसी समस्या नहीं है फिर भी हम समझते हैं कि भारत में लोग क्यों झगड़ा करते हैं, क्यों दंगे-फसाद होते हैं अमरकांत के मौत के नगर में कहानी से हम यह सब सीखते हैं। कभी-कभी हम हिंदुस्तानी लोगों को भी बुलाते हैं और उनसे भी इस तरह के विषयों पर बातचीत करते हैं। साहित्य से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

बिल्कुल ठीक कहा आपने कि साहित्य से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। आपने अभी सिखाने की बात की तो अगर हम भाषा शिक्षण की बात करें तो इसमें किस तरह की चुनौतियाँ आप महसूस करती हैं?

भाषा सीखने में कभी-कभी व्याकरण की कोई समस्या होती है तो व्याकरण की जो समस्या है वह समझाना आसान है लेकिन इस्तेमाल करना कठिन होता है जैसे ‘ने’ का इस्तेमाल है तो यह सब ‘ने’ का इस्तेमाल सीखना आसान है लेकिन करना मुश्किल होता है तो वह अभ्यास करना पड़ता है बार-बार करना पड़ता है। बोल-चाल की भाषा और पढ़ने-लिखने की भाषा में भी थोड़ा अंतर हो जाता है तो जैसे सब लोग पढ़ेंगे ‘राष्ट्रपति’ लेकिन मैंने देखा है भारत में सब लोग ‘प्रेसिडेंट’ बोलते हैं तो भाषा सिखाते समय बड़ी समस्या होती है। जब रूसी लोग हिंदुस्तान जाते हैं तो यही कहते हैं कि यहाँ सब लोग एक विचार बना कर चलते हैं कि वहाँ सब लोग अंग्रेज़ी बोलते हैं जबकि यह ठीक नहीं है। अंग्रेज़ी बोलने वाले भारत में शायद पाँच से दस फ़ीसदी लोग होंगे जबकि ज़्यादातर लोग हिंदी बोलते हैं। लेकिन रूसी लोगों को जाने से पहले यही लगता है कि शायद हिंदी जानने की ज़रूरत नहीं है अंग्रेज़ी से उनका काम चल जाएगा लेकिन जब समाज में अंदर की ओर जाते हैं तो समझते हैं कि अंग्रेज़ी सिर्फ ऊपर-ऊपर है भीतर से देखने के लिए हिंदी की ज़रूरत है।

आपका 45 वर्षों से भी अधिक का अनुभव है तो कैसे हिंदी को रोचक बनाएँ? जो नए अध्यापक हैं उनके लिए क्या कहेंगी?

जवान लोग जो हिंदी अध्यापक की नौकरी करना चाहते हैं तो उनके लिए चुनौती है क्योंकि भाषा सिखाना एक जुनून है। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भारतीय प्रधानमंत्री बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन अफसोस की बात है कि अभी भी हिंदी की स्थिति बहुत नहीं सुधरी है इसलिए हमें हिंदी का इस्तेमाल करने के मौके कम मिलते हैं। हाँ, हमें इसका इस्तेमाल करना चाहिए।

विभाग में हम फ़िल्म दिखाते हैं विद्यार्थियों को। खासकर मैं और कुछ और अध्यापक हम लोग विद्यार्थियों से पूछते हैं कि आप किस तरह की सामग्री ज़्यादा पसंद करते हैं क्योंकि वह भाषा रोचक तभी होगी, जब विद्यार्थी की पसंद उसमें होगी। हर विद्यार्थी की रुचि अलग होती है। हम पाठ्यपुस्तक का तो इस्तेमाल करते ही हैं, फ़िल्में और नाटक दिखाते हैं। हम नहीं सोचते हैं कि बहुत ज़्यादा सामग्री का इस्तेमाल करना चाहिए । पहले साल के दौरान तो हमारा कार्यक्रम तय है फिर भी हम उनको काफी आज़ादी देते हैं। कई फ़िल्में वे खुद देखते हैं यूट्यूब पर और फिर हम इस तरह देखते हैं कि उसमें हम क्या कर सकते हैं। हम खेलते भी हैं जैसे एक हीरो बनता है दूसरी हीरोइन बनती है और फिर वे अभिनय करते हैं। हम सब चीज़ें विद्यार्थियों के साथ करते हैं और इस तरह रुचि बनती है। कभी-कभी राजनीतिक खेल भी खेलते हैं कोई प्रधानमंत्री बनता है और कोई मंत्री बनता है उनके बीच की बातचीत होती है या वे कोई भाषण देते हैं। यही कहूँगी कि रोचकता बनाए रखना बहुत ज़रूरी है।

क्या आपको कुछ याद है ऐसी कोई रोचक घटना जो आपकी कक्षा में हुई हो और आप उस को साझा करना चाहें।

कभी-कभी विद्यार्थी बहुत शरारती होते हैं मिसाल के लिए हमने जब एक बार भूतों के बारे में कहानी पढ़ी और उसका अनुवाद किया। हम भूतों के बारे में बातें करना चाहते थे तो एक बार मेरे आने से पहले मेरा छात्र अलमारी में भूत की तरह छुपा था और फिर अचानक एकदम बाहर आ गया और कहने लगा मैं सबसे बड़ा भूत हूँ। वे बड़े हैं छोटे नहीं है तो बहुत मज़ाक नहीं करते हैं और यह भी ज़रूरी बात है कि जब उनको चुनने का मौका मिलता है तो वह उसको अच्छी तरह करते हैं अगर उन पर थोप देते हैं तो वे इतने अच्छे से नहीं करते हैं।

आप हिंदी को कितना महत्व देती हैं आज बहुत लोग हिंदी की बजाय अंग्रेज़ी बोल कर काम चलाते हैं तो आपको क्या लगता है आज भी हिंदी सीखने की ज़रूरत है?

जैसा मैंने पहले कहा कि ऊपर-ऊपर से अंग्रेज़ी है लेकिन हाँ यह भी सत्य है कि हिंदी इस्तेमाल करने का मौका कई जगह नहीं मिलता है। देखिये, जैसे आप कुछ ख़रीद रही हैं और हिंदी आपको आती है पर उनको लगता है कि आपको हिंदी नहीं मालूम है तो वे हिंदी में बातचीत करने लगते हैं लेकिन आप समझ सकती हैं कि क्या बातचीत कर रहे हैं। लोगों को इसलिए सीखना चाहिए , व्यवहार के लिए , अनुसंधान के लिए भी। जैसे आजकल की राजनीति के बारे में या किसी और विषय के बारे में तो कुछ लोग सोचते हैं कि हम अंग्रेज़ी में पढ़ कर सब कुछ समझ लेंगे। सब कुछ अंग्रेज़ी में मिल जाएगा लेकिन ऐसा नहीं है जैसे मैंने बताया मैं चंडीगढ़ में पंजाबी सीख रही थी और यह 1984 की बात है याद होगा उस समय सिख दंगे हुए थे और स्वर्ण मंदिर पर हमला हुआ था तो मेरे गुरु जी हमेशा अपनी मेज़ पर हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, पंजाबी अख़बार रखते थे। मैं बोलती थी आपको इतनी भाषाएँ आती हैं, ठीक है, लेकिन आप अंग्रेज़ी अखबार में भी सब कुछ पढ़ सकते हैं। इतने अख़बार रखने की क्या आवश्यकता है! उन्होंने मुझे समझाया कि मेरा विचार बिल्कुल गलत है क्योंकि अलग-अलग भाषाओं के अख़बारों में जो ख़बरें लिखी हैं वे अलग-अलग नज़रिये से हैं तो किसी राजनीति को अच्छी तरह समझने के लिए अलग-अलग भाषाओं, अलग-अलग वर्ग के लोगों को समझना ज़रूरी होता है और जब हम अलग भाषाओं के अख़बार पढ़ते हैं तो उनका नज़रिया हमें पता चलता है। हम एक ही जबान वाले लोगों की बात पर अपना ध्यान या अपनी विचारधारा नहीं बनाते हैं।

किसी भी ‘फील्ड’ में अगर आप लोगों के नज़दीक आना चाहते हैं तो आपको वह ज़बान आनी चाहिए क्योंकि आप उनके मज़ाक नहीं समझेंगे, उनके बीच जो बातचीत हो रही है, नहीं समझेंगे। आप उनसे साधारण बातचीत कर सकते हैं लेकिन उस घेरे में नहीं घुस पाएँगे, इसीलिए मैं कहती हूँ हमेशा कि यह दोस्ती की जुबान है तो इससे अलग किस्म के सपने पूरे होते हैं।

आपका यह वाक्य “ हिंदी दोस्ती की जुबान है, इससे अलग किस्म के सपने पूरे होते हैं।” बहुत से प्रश्नों और सोच का सटीक उत्तर है। बहुत बहुत धन्यवाद लुदमिला जी । आज आपसे कई पहलुओं पर चर्चा हुई। बहुत सारी बातें आपसे करनी है लेकिन शायद आज हमें यही रुकना होग। आज की इस बातचीत के लिए मैं हृदय से आभार प्रकट करना चाहूँगी।
उम्मीद है कि हम फिर मिलेंगे!

डॉ. संध्या सिंह
सिंगापुर
ई-मेल: sandhyasingh077@gmail.com

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