हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

सिंगापुर में हिंदी का फ़लक | विश्व में हिंदी

 (विविध) 
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रचनाकार:

 डॉ संध्या सिंह | सिंगापुर

विश्व आज वैश्विक गाँव बनता जा रहा है और इस वैश्विक गाँव में तमाम भाषाएँ अपने वजूद को बरक़रार रखने की कोशिश में लगी हैं। एक भाषा का हावी होना कई बार दूसरी भाषा के लिए ख़तरा उत्पन्न कर देता है और ऐसा कई परिस्थितियों में देखा गया है कि इस जद्दोजहद की लड़ाई में कभी-कभी कुछ भाषाएँ और संकुचित होती जाती हैं लेकिन कुछ लड़कर और निखरती है। हिंदी को लेकर भी कई अटकलें उसके राजभाषा बनने के पूर्व से आज तक लगाई जाती रही हैं और हिंदी के भारत की राष्ट्रभाषा न बनने के कारण कई बार प्रसार में अड़चनें भी आई हैं। पर वहीं यह भी सत्य है कि भारत की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा भले ही हिंदी को न मिला हो लेकिन भारत से बाहर भारत की प्रतिनिधि भाषा के रूप में वह अवश्य अपने पंख पसार रही है। हिंदी भाषा के प्रति पिछले कुछ वर्षों में अधिक जागरूकता बढ़ी है। आज अगर कहें कि हिंदी वह रेलगाड़ी स्वरूप प्रतीत हो रही है जो वैश्विक पुल पर अपनी गति से आगे बढ़ रही है तो संभवत: अतिशयोक्ति नहीं होगी। दुनिया के मानचित्र में भारतीयों ने हर भाग में पहुँचने की कोशिश की है और अपने साथ भाषा और संस्कृति की मंजुषा भी ले जाने की कोशिश की है। जैसा कि माना जाता है कि भाषा ही चाहे व्यक्ति हो, समाज हो या राष्ट्र हो उसकी अस्मिता-पहचान की निकष है। हिंदी में इस दायित्व को निभाने और पूरा करने की सभी खूबियाँ मौजूद हैं जिनके बल पर आज वह भारत की भाषा के साथ ही कहीं न कहीं विश्व भाषा की ओर बढ़ रही है। लाख विरोधों के बाद भी हिंदी अपनी पहचान विश्व जनता से करा चुकी है और आगे बढ़ रही है। हिंदी का वैश्विक परिदृश्य बहुत व्यापक है और यही व्यापकता हिंदी की लोकप्रियता का कारण है।

बहुप्रजातीय विशेषता से भरा हुआ सिंगापुर विश्व नक़्शे पर एक छोटा सा बिंदु है जिसे अक्सर ‘लिटल रेड डॉट’ कहा जाता है। भारत में इस आकार के या इससे बहुत बड़े कई शहर हैं। सन् 2020 के आँकड़े के अनुसार सिंगापुर का कुल क्षेत्र 7.28.6 वर्ग किलोमीटर है जो क़रीब 60 द्वीपों का मेल है। इस देश की सीमाएँ छोटी और फैलाव का आकाश विस्तृत है। ख़ूबी यही है कि इस देश ने अपने आकार को अपनी पहचान बनाने में कभी आड़े नहीं आने दिया। सन् 2021 में इसकी कुल जनसंख्या 54.5 लाख दर्ज की गई। यह देश बनाम शहर दक्षिण-पूर्व एशिया में, निकोबार द्वीप समूह से लगभग 1500 कि.मी. दूर है। इसकी जनसंख्या में सबसे बड़ा प्रतिशत चीनी जनसंख्या का है। 2021 की जनसंख्या गणना के आधार पर चीनी 74.2%, मलय 13.7%, भारतीय 8.9% और अन्य 3.2% जिसमें यूरेशियन आदि लोग भी इस द्वीप के निवासी हैं। भारतीयों की बात करें तो दक्षिण भारतीयों की संख्या अधिक है। धीरे-धीरे उत्तर भारतीयों की संख्या भी बढ़ रही है और उनके साथ ही हिंदी भी।

पहले मलय और अब अंग्रेज़ी सिंगापुर की ‘लिंगुआ फ्रांका’ के रूप में अपनी जड़ें जमाती दिखती है लेकिन हिंदी भाषा का विकास और विस्तार जिस प्रकार से यहाँ सिंगापुर में हुआ है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। हालाँकि सिंगापुर में भारतीय ही अल्पसंख्यक हैं और उसमें भी हिंदी भाषी उनके भी अल्पसंख्यक क्योंकि तमिल भाषियों की संख्या और इतिहास अधिक पुराना है लेकिन सिंगापुर की द्विभाषी नीति और विदेशी प्रतिभाओं के स्वागत जैसी नीतियों के कारण भारतीयों की संख्या और हिंदी की स्थिति को अधिक सुदृढ़ता प्राप्त हुई है। छोटे से बिंदु के समान विश्व मानचित्र पर दिखाई देने वाले सिंगापुर में बहुभाषिकता अन्य कई बड़े देशों के मुक़ाबले न सिर्फ अधिक बेहतर है बल्कि यहाँ के नागरिकों को दूसरी भाषाओं, संस्कृतियों के प्रति अधिक सजग बनाती है।

भाषा का विस्तार उसके भिन्न रूपों में प्रयोग के कारण होता है। सिंगापुर में हिंदी के कई रूप दिखाई देते हैं। कहीं हिंदी बोलचाल और परिवारों या समारोहों तक सीमित रह गई है तो कहीं हिंदी अधिक बड़े रूप को साकार कर रही है। शिक्षण संस्थाओं में अपनी पकड़ के साथ हिंदी ने सिंगापुर के भारतीय समाज को एक नया अवसर दिया है जिससे न सिर्फ शैक्षणिक बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी अधिक सहेजकर रख सकें।

कोई भी भाषा कुछ मुख्य बिन्दुओं के आधार पर ही अपने वैश्विक आधार को तय करती है जैसे; भाषा के प्रयोग करने वालों की संख्या, भाषा में हो रहा साहित्यिक कार्य जिसकी सभी विधाएँ वैविध्यपूर्ण एवं समृद्ध हों, शोध कार्य की व्यापकता, कार्य करने की शक्ति, जिसकी शब्द-संपदा विपुल एवं विराट हो व एक -दूसरे को प्रेरित -प्रभावित करने में सक्षम हो आदि। सिंगापुर में हिंदी इनमें से लगभग सभी क्षेत्रों में पैठ चुकी है; कहीं सुदृढ़ तो कहीं लचीली। सिंगापुर में हिंदी आज जिस दायित्व बोध को लेकर संकल्पित है वह निकट भविष्य में उसे और भी बड़ी भूमिका का निर्वाह करने का अवसर प्रदान करेगा। हिंदी के लिए सिंगापुर के परिदृश्य में यह ज़रूर संभव है कि यह सबकी मातृभाषा न होकर दूसरी, तीसरी अथवा चौथी भाषा भी हो सकती है जो इसके विस्तार के पैमाने को अधिक समृद्ध करती है।

जब डायस्पोरा की बात करते हैं तो सबसे पहले उनकी लिंगुआ-फ्रांका भाषा का ज़िक्र भी होता है। भाषा-प्रसार का सबसे व्यापक और आसान रूप उसका व्यवहार या बोलचाल के रूप में प्रयोग होना है। सिंगापुर में हिंदी बोलने वाला वर्ग कौन-सा है? क्या वह दूसरी-तीसरी पीढ़ी का बसा भारतीय है या पहली पीढ़ी और नए प्रवासी हैं! दोनों में भिन्नता होती है क्योंकि भले ही संख्या की दृष्टि से हिंदी बोलने वाले बढ़ रहे हैं पर व्यावहारिकता को संज्ञान में लाया जाए तो यह प्रवासियों की पहली पीढ़ी तक ही अधिक सीमित रह जाती है। भारत से आया पहली पीढ़ी का प्रवासी समाज तो काफी हद तक अपनी बोलचाल और व्यवहार में हिंदी को क़ायम रखता है लेकिन उसी प्रवासी समाज के बच्चे हिंदी को अपनी आम बोलचाल की भाषा नहीं बना रहे। ज़्यादातर युवा अंग्रेज़ी को ही अपनी मुख्य भाषा के रूप में बढ़ाना चाहते हैं। यहाँ युवकों में बोलचाल की भाषा के रूप में हिंदी भले ही अधिक न सुनाई देती हो पर सर्वथा अभाव भी नहीं है जिसका बड़ा कारण मातृभाषा के रूप में हिंदी के अध्ययन की अनिवार्यता यानी हिंदी की औपचारिक शिक्षा भी है। सिंगापुर में आज किसी भी सार्वजनिक स्थल पर हिंदी कहीं-न-कहीं सुनाई पड़ ही जाती है।

हिंदी सीखने-सिखाने का सिलसिला जो कई दशक पहले शुरू हुआ अब और अधिक जोर पकड़ रहा है। भले ही घर में आम बोलचाल की हिंदी कम हो पर औपचारिक रूप से हिंदी सिखाने के केंद्र और संस्थाओं में विस्तार हो रहा है। सिंगापुर के दोनों नामी विश्वविद्यालयों नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर (NUS) और नान्यांग तेक्नोलौज़िकल यूनिवर्सिटी (NTU) में हिंदी भाषा के पाठ्यक्रम हैं। जहाँ NUS में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी भाषा के छहों स्तर, माइनर इन हिंदी स्टडीज़, भारत अध्ययन, बॉलीवुड और कई रूप ‘मोडयुल्स’ का हिस्सा बन गए हैं वहीं NTU में भी हिंदी भाषा के स्तर एक की कक्षाएँ संचालित होती हैं और भारत से जुड़े और कई ‘मोडयुल्स’ भी हैं। हिंदी के इतर भारत से जुड़े अन्य ‘मोडयुल्स’ सीखने वाले कुछ ‘हेरिटेज लर्नर’ यानी दूसरी-तीसरी पीढ़ी के प्रवासी हैं साथ ही कई विदेशी भी भारत और भारत-अध्ययन में रुचि रखते हैं जो इस ओर उन्हें केन्द्रित करता है। भाषा सीखना हमेशा ही विशिष्ट श्रेणी में रहा है।

सिंगापुर के स्थानीय पाठ्यक्रम में हिंदी भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में सिखाने की मान्यता प्राप्त है। स्थानीय विद्यालयों में इस समय लगभग 8000 विद्यार्थी इसे दूसरी भाषा के रूप में सीख रहे हैं और सबसे बड़ी बात इनमें प्रवासियों की दूसरी-तीसरी पीढ़ियों की संख्या काफी बड़ी है। द्वितीय भाषा के रूप में सीखने के कारण हिंदी का स्थायित्व यहाँ अन्य कई देशों से अधिक है। विद्यार्थी दसवीं या ग्यारहवीं कक्षा तक हिंदी सीखते हैं और उनका मातृभाषा परीक्षा में उत्तीर्ण होना आवश्यक है तभी विश्वविद्यालयी शिक्षा में आगे बढ़ सकते हैं। इस एक नीति ने हिंदी को सुदृढ़ता दी है। विदेशी शिक्षा प्रणाली में हिन्दी को मान्यता दिलाना इतना सहज नहीं था। इसके पीछे कई लोगों का अथक प्रयास है। 6 अक्तूबर 1989 का दिन सिंगापुर में हिन्दी भाषियों के लिए अत्यंत ख़ास रहा क्योंकि इसी दिन संसद में उस समय के शिक्षामंत्री श्री टोनी तान जी ने घोषणा की कि गैर तमिल भाषी भारतीय छात्र माध्यमिक विद्यालय में पाँचों (हिन्दी, गुजरती, पंजाबी, बंगाली, उर्दू) में से एक भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में सन् 1990 से पढ़ सकते हैं और यहीं से शुरुआत हुई आधुनिक सिंगापुर में हिंदी शिक्षण की। हिंदी सोसाइटी सिंगापुर और डी.ए.वी. हिंदी स्कूल नामक दो संस्थाओं के माध्यम से सिंगापुर में स्थानीय छात्रों को हिंदी सीखने का मौक़ा मिलता है। इन दोनों संस्थाओं में कुल मिलकर लगभग 250-300 हिंदी अध्यापिकाएँ हैं जो स्वयंसेवी के रूप में हिंदी शिक्षण का कार्य करती हैं। सैकड़ों साल पहले आए समूह की आज तीसरी-चौथी पीढ़ी अगर हिंदी सीख पा रही है तो हमारे पूर्वजों द्वारा किये गए प्रयास और सिंगापुर सरकार को इसका श्रेय जाता है।

स्थानीय विद्यालयों के अलावा सिंगापुर में कई भारतीय अंतरराष्ट्रीय विद्यालय हैं क्योंकि काम के लिए आनेवाले लोगों में भारतीयों की बड़ी संख्या यहाँ रुख करती है। शुरू में ज़्यादातर ये ‘प्रोफेशनल्स’ अपने बच्चों को भारतीय अंतरराष्ट्रीय विद्यालयों में ही डालते हैं और दूसरी भाषा के रूप में हिंदी ही पहली पसंद होती है। अगर इन विद्यालयों में देखें तो हज़ारों छात्र यहाँ भी हिंदी सीख रहे हैं और जैसा पहले भी कहा है कि भाषा के साथ संस्कृति से भी जुड़ने के अधिक मौके मिलते हैं। जब ये छात्र हिंदी दिवस पर सिंगापुर संगम संस्था और पत्रिका के मंच से ‘पन्ना धाय’ जैसे नाटकों का हिंदी में मंचन करते हैं तो इतिहास और संस्कृति की तमाम बातें स्वत: उनमें आत्मसात हो जाती हैं।

सिंगापुर में हिंदी का स्वर अब साहित्य समाज द्वारा भी मुखरित हो रहा है। जब बात सिंगापुर में रचे जा रहे प्रवासी साहित्य की आती है तो दायरा अभी कुछ सीमित हो जाता है। शुरूआती रूप में साहित्य की बात करने पर सन 1940-50 के आसपास हमें अध्यापक वशिष्ठ राय जी के बारे में पता चलता है जो ‘नेताजी हिंदी हाई स्कूल’ में हिंदी अध्यापन करते थे। उनके द्वारा लिखी कई पुस्तकों में दो उपन्यास भी शामिल थे। आज दस्तावेज़ों के सही रख-रखाव के अभाव में उन तक पहुँच नहीं बन पा रही है पर सिंगापुर में लिखी हिंदी रचनाओं में उन्हीं का नाम सबसे पहले आता है।

सिंगापुर के वर्तमान हिंदी साहित्य समाज के बारे में चर्चा करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह देश एक तरह से कई उभरते प्रवासी साहित्य समाज का प्रतिनिधि है जिससे दुनिया को रूबरू होना है। सिंगापुर से कविताएँ काफी लिखी जा रही हैं, कहानियाँ लिखने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। चित्रा गुप्ता, साक्षी प्रद्युम्न, आराधना झा श्रीवास्तव, श्रद्धा जैन, विनोद दूबे, गौरव उपाध्याय, शान्ति प्रकाश उपाध्याय, शार्दूला नोगजा, शीतल जैन, रीता पाण्डेय, प्रतिभा गर्ग, ख़ुशी मिश्रा, प्रतिमा सिंह, आलोक मिश्रा, डॉ अंकुर गुप्ता, आराधना सदाशिवम, अदिति अरोरा, स्मिता कंवर, डॉ स्मिता सिंह, संजय कुमार, हर्ष वर्धन गोयल, प्रेरणा मित्तल, रीना दयाल, प्रद्युम्न इंगले, अनुसुइया साहू आदि कविताओं के क्षेत्र में तथा कथा व गद्य लेखन में चित्रा गुप्ता, डॉ संध्या सिंह , विनोद दूबे, आराधना झा श्रीवास्तव, गौरव उपाध्याय, शांति प्रकाश उपाध्याय, प्रतिभा गर्ग आदि नाम मुख्य हैं। यहाँ से एकमात्र उपन्यास अभी तक ‘इण्डियापा’ लिखा गया है जिसे विनोद दूबे ने बनारस को केंद्र में रखकर लिखा है। सन 2021 तक यहाँ से आठ कविता-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं जो गौरव उपाध्याय की ‘हाफ फ़िल्टर कॉफ़ी’, शान्ति प्रकाश उपाध्याय की ‘मेरी अनुभूतियाँ’, सिंगापुर के नौ कवियों की ‘सिंगापुर नवरस’, विनोद दूबे की ‘वीकेंड वाली कविता’ और डॉ अंकुर गुप्ता की ‘माहीमीत’, हर्ष वर्धन गोयल की ‘स्मृति के पदचिह्न’, खुशबू मिश्रा की ‘एहसासों की खुशबू’, ‘सत्य की अस्मिता’ हैं। ऐसे कई युवा हैं जो प्रवासी साहित्य के मानचित्र पर नए हैं, उभरकर सामने आ रहे हैं। ‘लॉक डाउन’ की सबसे बड़ी उपलब्धि हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में हुई है। सिंगापुर से कई कवि-गोष्ठियाँ आयोजित हुईं तथा यहाँ के रचनाकारों ने भिन्न मंचों से अपनी रचनाएँ सुनाईं। सिंगापुर से उपन्यास, कविताएँ, ग़ज़ल, शेर, गीत, कहानियाँ, संस्मरण, आलेख, डायरी आदि हर विधा में रचनाएँ लिखी जा रही हैं। धीरे-धीरे रचनाकारों की सूची लम्बी हो रही है और रचना का स्तर भी बेहतर हो रहा है। हिंदी रचनाएँ लिखने वाले ज़्यादातर लोग किसी न किसी व्यावसायिक पेशे से जुड़े हैं जैसे आई टी या बैंकिग। हिंदी भाषा से लगाव पहले से रहा है और अब सुनने-सुनाने का मंच मिलने लगा है तो लोगों की प्रतिभाओं में निखार भी आने लगा है।

‘सिंगापुर संगम’ नामक एकमात्र सिंगापुर में पंजीकृत हिंदी पत्रिका की जनवरी 2018 में शुरुआत हुई । इस पत्रिका के कारण सिंगापुर के रचनाकारों को प्रारंभ में विश्व मंच से जुड़ने का ख़ास मंच मिला। साहित्य के प्रति रुचि भी अधिक विकसित हुई। पत्रिका ने छात्रों में लेखन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हिंदी के वाहकों को हर अंक में स्थान देने के साथ ही छात्र-विशेषांक भी निकाला। इस पत्रिका की सम्पादक डॉ संध्या सिंह हैं। इस तरह यहाँ विद्यालयों में हिंदी सीख रहे छात्रों को भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए मंच मिल रहा है।

सन 2019 में सिंगापुर में पंजीकृत और स्थापित लाभ निरपेक्ष हिंदी संस्था ‘संगम सिंगापुर’ साहित्य , भाषा और लोक-संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए कई अनोखे प्रयास कर रही है। इस संस्था कि अध्यक्ष डॉ संध्या सिंह, उपाध्यक्ष संगीता सिंह और सचिव अरुणा सिंह है। यह संस्था प्रति वर्ष अपने अग्रज साहित्यकारों के रचना-संसार पर एक सार्वजनिक आयोजन ‘साहित्य के ख़ज़ाने से’ नामक कार्यक्रम के माध्यम से करवाने के साथ ही भिन्न प्रतियोगिताओं द्वारा छात्रों और वयस्कों को हिंदी से जोड़ने का कार्य कर रही है। खासकर छात्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय कवि-गोष्ठी के आयोजन और उसकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर मौक़े उपस्थित हों तो भावी पीढ़ी में जोश कम नहीं। संगम सिंगापुर संस्था हिंदी दिवस, विश्व हिंदी दिवस जैसे आयोजन तो करती ही है, समय-समय पर साहित्यिक गोष्ठियाँ, छात्रों के मध्य राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताओं का भी आयोजन करवाती है। कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा और विमर्श के आयोजन भी इस संस्था द्वारा किये जा रहे हैं जिसमें देश-विदेश के कई विशेष व्यक्ति भाग लेते हैं। ‘ग्लोबल हिंदी फाउंडेशन’ नामक संस्था द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर 2016-18 तक ‘प्रेरणा अवार्ड्स’ का वार्षिक रूप से आयोजन किया गया जिसमें विद्यालयों के छात्रों के साथ ही वयस्कों के लिए प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं। इसकी संस्थापक ममता मंडल सिंह हैं। ‘हिंदी परिवार सिंगापुर’ नामक टोस्ट मास्टर क्लब भी पिछले दो वर्षों से टोस्ट मास्टर गतिविधियों के साथ कवि गोष्ठियों और युवाओं के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है। इसके संस्थापक हर्षवर्धन गोयल हैं। संगम सिंगापुर, सिंगापुर संगम, ग्लोबल हिंदी फाउंडेशन, सिंगापुर टोस्ट मास्टर्स क्लब जैसे मंचों के माध्यम से हिंदी को बल मिल रहा है। आज लोगों के पास कई विकल्प हैं जो उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे हिंदी से जुड़ें। मीडिया में भी सिंगापुर में हिंदी स्वयं को वैश्विक परिदृश्य से जोड़ रही है। ‘दस्तक’ के नाटक या हिंदी रेडियो ‘रेडियो मस्ती’ के शो सभी आज हिंदी के बहाने अपनी पहचान बना रहे हैं और हिंदी को यहाँ बढ़ा रहे हैं।

सांस्कृतिक आयोजनों के बिना सिंगापुर या किसी भी बाहरी देश में हिंदी इस रूप में नहीं बढ़ पाएगी। सिंगापुर में भी आर्यसमाज सिंगापुर, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, भारतीय भवन, भोजपुरी असोशियेशन, बिजहार जैसी संस्थाएँ संस्कृति की जड़ों को और गहरे तक जमाने के प्रयास में लीन हैं। श्री लक्ष्मी नारायाण मंदिर या भारतीय भवन जैसी संस्थाओं में जाने पर आज से 70-80 साल पुरानी भोजपुरी और हिंदी के भाव आपको सुनाई देंगे। हर मंगलवार को श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में हनुमान चालीसा, सुन्दर काण्ड और दुर्गा पाठ का आयोजन उन्हीं लोगों के कारण जीवित है जो बहुत पहले इस धरती पर कुछ मूर्त और अमूर्त साधनों के साथ आए थे। इन संस्थाओं के द्वारा होली, दिवाली, दशहरा से लेकर तीज और तुलसी विवाह तक का आयोजन अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी को इस द्वीप पर बढ़ाने में सहायक है।

निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि हिंदी भाषा, साहित्य, संस्कृति के विविध रंग अपनी छटा सिंगापुर में बिखेर रहे हैं। सिंगापुर में हिंदी का वैश्विक फ़लक व्यापक है। घर, विद्यालय, समाज, मनोरंजन, साहित्य शायद ही ऐसा कोई कोना हो जिस संसार में हिंदी ने अपनी पैठ बनानी शुरू न की हो। कहीं जमकर बैठी है तो कहीं प्रवेश कर चुकी है और कहीं घुसने की फ़िराक में है।

- डॉ संध्या सिंह - सिंगापुर
  ई-मेल : sandhyasingh077@gmail.com


सन्दर्भ:

बर्मन, अमृत २००९, इंडिया फ़ीवर द न्यू इन्डियन प्रोफेशनल्स इन सिंगापुर: सिंगापुर इन्डियन एसोसिएशन बुक सिरीज़ नंबर २

ब्रिज वी. लाल, पीटर रीव्स एंड राजेश राय (एडिटेड) २००६. द इन्सैक्लोपीडिया ऑफ़ इन्डियन डायस्पोरा, सिंगापुर: एडिशन डिडिएर मिलेट.

अर्नेस्ट सी.टी. चिऊ एंड एडविन ली (एडिटेड) १९९१. सिंगापुर अ हिस्ट्री ऑफ़ सिंगापुर: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी     प्रेस.

मजूमदार मौसमी, २०१०, काहे गइले बिदेस, व्हेअर डिड यू गो? ऑन भोजपुरी माइग्रेशन सिंस द १८७० एंड कन्तम्पररी कल्चर इन उत्तर प्रदेश एंड बिहार, सूरीनाम एंड द नीदरलैंड: रॉयल ट्रोपिकल इंस्टिट्यूट प्रेस.

द स्ट्रेट टाइम्स, सिंगापुर, ७ अक्तूबर, १९८९, पेज २४

सिंगापुर डिपार्टमेंट ऑफ स्टैटिक्स, पॉपुलेशन ट्रेड्स, २०२१

www.singaporesamgam.com

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