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गिरमिटियों को श्रद्धांजलि (भाग 2)‘ का लोकार्पण

 (विविध) 
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रचनाकार:

 सुभाषिनी लता कुमार | फीजी

नरेश चंद की ऑडियो सीडी ‘गिरमिट गाथा- गिरमिटियों को श्रद्धांजलि (भाग 2)‘ का लोकार्पण

Girmit CD

मई महीने में 143वीं गिरमिट दिवस के सुअवसर पर फीजी नेशनल युनिवर्सिटी, लौटोका कैंपस पर श्री नरेश चंद की ऑडियो सीडी ‘गिरमिट गाथा- गिरमिटियों को श्रद्धांजलि (भाग 2)‘ का लोकार्पण किया गया। गायक एवं गीतकार श्री नरेश चंद ने बताया कि यह सीडी उन्होंने अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित की है। उनके आजा स्वर्गीय चुन्नी लाल एक गिरमिटिया मजदूर थे। वे बीसवीं शताब्दी की शुरुआती दौर में उत्तर भारत के बसती नामक जिला से उज्जवल भविष्य का सपना लिए फीजी आए थे। ‘गिरमिट गाथा- गिरमिटियों को श्रद्धांजलि (भाग एक और दो )‘ ऑडियो सीडी भारतवंशियों की स्मृतियों से भरे-पड़े हैं। नरेश जी ने गिरमिट काल की गद्यात्मक कथाओं को अपनी सृजन शक्ति द्वारा पद्यात्मक शैली में लिखकर, उसे संगीत के माध्यम से और भी प्रभावशाली बना दिया है। उन्होंने गिरमिटिया पूर्वजों के इतिहास को अपनी मधुर वाणी और संगीत के तरंगों से हृदय को झंकृत एवं संवेदनशील करने वाली एल्बम तैयार की है जिसे युग-गायन के रूप में लोक-मानस के बीच भावपूर्ण एवं सुमधुर शैली में फीजी के स्थानीय कुशल संगीतकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

अठारह सौ उन्यासी में भारत से एक अनजान द्वीप की यात्रा पर निकले भारतीय मजदूरों के साथ उनकी भाषा, साहित्य और संस्‍कृति भी फीजी आ पहुँची। गिरमिट प्रथा की समाप्ति के पश्चात अधिकांश गिरमिटिया मजदूर फीजी में ही बस गए और उनके वंशज यहाँ जीवनयापन कर रहे हैं। फीजी के गिरमिटिया मजदूरों ने अपनी संस्‍कृति को संभाला और हिन्‍दी शिक्षण का व्‍यवस्‍थित कार्य भी शुरू किया। आज फीजी में भारतीय मूल के फीजियन जिनकी जन आबादी 37.5% हैं, मुख्य रूप से हिंदी का एक स्थानीय संस्करण ‘फीजी हिंदी’ बोलते हैं।

संगीत भाषा एवं संस्कृति के प्रचार का बहुत बड़ा माध्यम है। इसके ज़रिये समाज में सांस्कृतिक चेतना , सामाजिक समरसता एवं वैयक्तिक सद्भावना व संवेदनशीलता जागृत रहती हैं। ‘गिरमिट गाथा- गिरमिटियों को श्रद्धांजलि (भाग 2)‘ ऑडियो सीडी में आठ गीत संकलित हैं। इन गीतों के बोल स्वंय नरेश ने लिखे हैं। उनका यह प्रयास अति सराहनीय है। नरेश का कहना है कि इन गीतों के द्वारा वे गिरमिटिया वंशजों को उनके इतिहास से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान पीढ़ी को अपना इतिहास जानना बेहद जरूरी है क्योंकि बीता हुआ कल आने वाले कल के लिए बहुत कुछ सिखा जाता है। इतिहास का अध्ययन महज अतीत का अध्ययन ही नहीं है बल्कि वह हमें बताता है कि आज हम जिन संस्थाओं को देखते हैं, उनकी जड़ें कहाँ हैं।

कभी-कभी इतिहास लेखन में कुछ महत्वपूर्ण घटक छूट जाते हैं- जैसे मॉरिशस के कवि अभिमन्यु अनत अपनी कविता ‘वह अनजान अप्रवासी’ में मॉरिशस गए प्रवासी भारतीयों के इतिहास के संबंध में लिखते हैं-

फिर याद आया मुझे वह काला इतिहास
उसका बिसरा हुआ वह अनजान आप्रवासी देश के
अंधे इतिहास ने न तो उसे देखा था
न तो गूँगे इतिहास ने कभी सुनाई उसकी पूरी कहानी हमें
न ही बहरे इतिहास ने सुना था
उसके चीत्कारों को...

नरेश जी ने फीजी आए प्रवासी भारतीयों के इतिहास के पन्नों को दोबारा खोला और अपने पूर्वजों के इतिहास को नए सिरे से ‘हरा भरा कर दिया देश’, ‘कितनी यातनाएं’, ‘बहुत याद आवत है’, ‘गिरमिटियों की माता कहलाई’, ‘आभार प्रकट करने को’, आदि गीतों के माध्यम से पुनर्जीवित कर दिया है। उन्होंने प्रो. ब्रिज विलास लाल, पं. तोताराम सन्नाढ्य, प्रो. विजय मिश्रा, प्रो. सुदेश मिश्रा, प्रो. कै.एल गिलियन जैसे विद्वानों के आलेखों एवं पाठ्यात्मक स्त्रोतों का अध्ययन करके गीतिकाव्य को रचा। संगीत के साथ निर्मित इन गीतों की अपनी अलग महत्ता है।

नरेश चंद का जन्म 1960 को बा के नदादी नामक गाँव में हुआ। वे फीजी नेशनल युनिवर्सिटी, नातम्बुआ लौतोका में संगीत एवं एजुकेशन के प्राध्यापक हैं। नरेश फीजी के जाने-माने गीतकार एवं संगीतकार हैं। उनके अध्ययन का विषय काफी विशाल है, जिसके अंतर्गत उन्होंने हिंदी साहित्य स्नातकोत्तर डिप्लोमा, मास्टर्स इन एजुकेशनल लीडरशिप, बेच्लोर ऑफ़ एजुकेशन एवं टीचर्स सर्टिफिकेट की डिग्री हासिल की है। वे एक समाज सेवी भी हैं; भागवत कथा, राम कथा के साथ-साथ वे फीजी में हिंदी भाषा एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में कार्यरत हैं। वे रामचरितमानस, भगवद्गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से सामाज में नैतिक, मानवीय एवं धार्मिक मूल्यों की स्थापना में हमेशा तत्पर रहते हैं। सन् 2018 से नरेश चंद जी हिंदी परिषद् फीजी (पश्चिमी शाखा) के अध्यक्ष भी हैं।

एक कुशल संगीतकार के रूप में नरेश ने कई मौलिक गीतों की रचना की है। उनकी मौलिक गीतों की सीडी ‘गिरमिट गाथा-भाग एक’ में ‘फीजी में गिरमिट’ विषय पर आधारित गीतों को रिकॉर्ड किया गया है। उनकी सुरीली आवाज से प्रभावित होकर फीजीवासी नरेश को फीजी का जगजीत सिंह मानते हैं। श्री नरेश जी का मानना है कि हिंदी में गीत, कविता और कहानी लेखने से हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार होगा और हम अपनी भाषिक परंपरा को कायम रखने में सक्षम होगे। उन्हें बचपन से ही रामचरितमानस के पठन एवं गायन में रुचि रही है और इसे ही वे अपने सृजनात्मकता का स्त्रोत मानते हैं।

प्रस्तुत ऑडियो सीडी संगीतकार के दो सालों के कठिन परिश्रम का फल है। नरेश ने बतलाया कि सन् 2020 से उन्होंने सीडी पर काम करना शुरु कर दिया था मगर कोविड-19 महामारी के चलते उनके संगीत दल को साथ मिलकर रिहर्सल करने में कई बाधाएं उत्पन्न हुईं। लेकिन, उन्होंने हार न मानी और अपना काम जारी रखा। ‘गिरमिट गाथा ‘ ऑडियो सीडी के संगीत निर्देशक श्री समरेश राव हैं। वे फीजी के जाने-माने संगीतकार हैं। उन्होंने ‘झंकार म्यूजिक अकादमी’ नाम से नांदी शहर में एक संगीत प्रशिक्षण केंद्र खोला है। इसके अतिरिक्त समरेश राव भारतीय उच्चायोग, फीजी के साथ मिलकर युवकों को संगीत सिखाते हैं। प्रस्तुत सीडी में श्री कृष्णनील चंद तबला वादक हैं, आप नरेश जी के पुत्र है। फीजी में कुशल तबलची, गिटार वादक बहुत कम है। इसलिए नरेश को अपने संगीत दल का चयन और समय पर संगीतकारों के साथ मिलनकर रिहर्सल करना एक जटिल चुनौती रही है। यह भी ध्यान देने की बात है कि फीजी में ज्यादातर संगीत बॉलीवुड या पहले से रिकॉर्ड किए गए गीतों के धुनों और बोल पर आधारित होते हैं। मगर नरेश जी की सीडी की खासियत यह है कि इनके सभी गीत नए हैं और संगीत भी मौलिक है। हालांकि रिकॉर्डिंग संसाधनों की कमी के कारण नरेश और उनके संगीत दल को सीडी तैयार करने में असुविधाएं हुईं और काफी समय भी लग गया।

‘गिरमिट गाथा- गिरमिटिया को श्रद्धांजलि (भाग 2)’ के संबंध में फीजी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. सुब्रमनी का कहना है कि “यह एल्बम उनकी संगीत यात्रा का प्रतिनिधित्व करती है। वे अपनी देश की संस्कृति, इतिहास, लोक परंपराओं और कालातीत की यादों से प्रेरणा लेते हैं।“ ‘गिरमिट गाथा- गिरमिटिया को श्रद्धांजलि (भाग 2)’ के ऑडियो सीडी में आठ गीत सकलित हैं जो फीजी के प्रवासी भारतीयों के इतिहास, बलिदान और विकास के कहानी को आनंदमय शैली में श्रोताओं तक पहुँचाने में सफल हुए हैं। सीडी में संकलित गीतों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

प्रस्तुत सीडी का पहला गीत ‘हरा भरा कर दिया देश को’ है । यह गीत गिरमिटिया पूर्वजों के परिश्रम और फीजी देश को आबाद करने में उनके योगदान को रेखांकित करता है। अपने पूर्वजों की कुर्बानियों को गायक याद करता है और गर्वित महसूस करता है। ‘कितनी यातनाएं’ दूसरा गीत है जो गिरमिटिया महिलाओं की परिस्थितियों का बेहद मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। नरेश के इस गीत में गिरमिटिया स्त्रियों पर हुए शोषण, दमन, अत्याचार और क्रूरता के विरुद्ध विद्रोह का स्वर दर्ज हैं। नारियों पर किए गए शोषण की यह अति करूण गाथा है। गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं-

कितनी यातनाएं कितना दुःख मिला था गिरमिट काल में
अबलाओं का जीना दूभर हुआ था ऐसे हाल में
महिलाओं की कमी गंभीर, समस्या बन कर छाई थी
बहुपतित्व की चक्की में, अबलायें पिसती आईं थीं
कट मर रहीं थीं कितनी फस कर, इस कुप्रथा की जाल में
कितनी यातनाएं कितना दुःख मिला था गिरमिट काल में...

‘बिदेसिया’ और ‘कौने देस आए बसा’ गीतों में भी प्रवासी भारतीयों की संवेदनाओं को अंकित किया गया है। ये गीत बहुत ही भावुक हैं, इन्हें सुनते ही हृदय में एक पीड़ा उठती है और आँखों से मोती टपकने लगते हैं।

‘बहुत याद आवत है हमका घर और गाँव रे’ यह इस एल्बम का तीसरा गीत है। इसमें एक गिरमिटिया युवक सोते-जागते और सपने में भी अपने परिवारजनों की समृतियों में खोया हुआ है। इस गीत को सुनते ही मुझे प्रसिद्ध गायक जगजीत सिंह का गीत "हम तो है परदेश में, देश में निकला होगा चाँद " याद आ जाता है। नरेश के गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं-

काला पानी पार लई गएँ, गिरमिट लिखाए के
फस गई ले फीजी अई के, कैसे घर जाऊँ रे
बहुत याद आवत है, हमका घर और गाँव रे

परदेश में स्वदेश की स्मृति प्रवासी रचनाकारों के मन में एक असंतोष पैदा कर देती है। गीतकार बार-बार अपने अतीत, घर, परिवार, गाँव की यादों को चित्रित करता है जिसे नॉस्टेल्जिया के नाम से जाना जाता है जो प्रवासी लेखन की विशेषता है।

‘आभार प्रकट करने को’ गीत फीजी के मूल निवासियों को संबोधित करता हैं। इस गीत में नरेश फीजियन लोगों को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। गिरमिट काल में सन् 1884 को सीरिया नामक जहाज 487 यात्रियों को कलकत्ता, भारत से फीजी लेकर आ रहा था। उस समय रात के वक्त नसीलाई रीफ से गुजरने वाले जहाजों के मार्गदर्शन के लिए कोई लाइटहाउस नहीं था और खराब मौसम की वजह से सीरिया जहाज चट्टान से जा टकराया और क्षतिग्रस्त हो गया। रात होने के कारण उसी समय यात्रियों को सहयोग पहुँचाना मुश्किल था। लेकिन जैसे ही सुबह की पहली किरण मिली वैसे ही आसपास के फिजियन गांवों से आदिवासी फीजियन अपने नाव लेकर यात्रियों की सुरक्षा के लिए वहाँ पहुँच गए। 14 मई, 1884 को, नुकुलाऊ में अप्रवासियों की अंतिम गणना की गई। सभी बचे लोगों के आने के बाद, यह पता चला कि नसीलाई रीफ पर 57 लोगों की जान चली गई थी। सीरिया के मृतकों को ताइलेवू में नाकेलो के नाइविलादा गाँव के पास दफनाया गया है। वहां के ग्रामीण आज भी इस जगह का रखरखाव कर रहे हैं जो एक ऐतिहासिक स्थल है। इसी प्रसंग को गीतकार ने इस गीत में इस प्रकार व्यक्त किया है-

नोदो जिले के दस गाँवों ने, ऐसा उपकार किया
जानें बचाईं गिरमिटियों की उनका सत्कार किया
मृतकों के शवों को यथाशक्ति, आदर सम्मान दिया
अपने ईसाई मज़हब के तहत, अंतिम संस्कार किया
नाइविलादा वाईवाई और ताऊलूँगा की बस्तियां
दफ्न है जहाँ उनसठ गिरमिटियों की अस्थियाँ, धन्यवाद शुक्रिया शुक्रिया

मातृप्रेम को लेकर बहुत कुछ लिखा और गाया है। एक माँ निस्वार्थ भाव से अपने बच्चों से प्रेम करती हैं। हन्ना डडली, फीजी के भारतीयों के लिए एक ऐसी ही माँ थी जिसका उल्लेख नरेश ने अपने गीतों में किया है। वे कहते हैं- “गिरमिटियों-की माता कहलाई, वो दया की देवी हन्ना डडली/ जन सेवा में अर्पित जीवन था, प्यारी थी सभी को माँ डडली…।” हन्ना डडली मेथोडिस्ट मिशन चर्च की सिस्टर थी। वह अनाथ बच्चों की देख-रेख, उनसे स्नेह और उन्हें शिक्षित करती थी। उनका प्रेम एक माता के प्रेम की तरह निर्मल था जिसमें कोई स्वार्थ और भेद-भाव नहीं था।

आदमी नित्य अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है। वह जीते जी और मरणोपरांत भी मिट्टी का ही हिस्सा रहता है। ‘We love our Fiji, We love our Fiji’ यह गीत इस सीडी का बहुत ही उपयुक्त अंत है। यह सुमधुर गीत फीजी देश के प्रति गायक और यहाँ के प्रवासी भारतीयों के प्रेम को दर्शाता हैं।

‘गिरमिट गाथा- गिरमिटिया को श्रद्धांजलि (भाग 2)’ में संकलित गीतों की संवेदना को समझने के लिए फीजी के गिरमिटिया भारतीयों के परिवेश, उस परिवेश में शामिल व्यक्तियों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थिति आधार का काम करती है। नरेश चंद ने अपने पूर्वजों के इतिहास को एक नया संस्कार दिया जिसका संबंध फीजी के जीवनानुभव और भारतभूमि के लिए तड़प की प्रतिक्रिया को दर्शाती है। इन गीतों का आधार गिरमिटिया मजदूरों के वंशजों से है जो अपने समाज से कटकर सात समुद्र पार फीजी में आ बसे। फीजी द्वीप के गिरमिटिया मजदूरों की वर्तमान पीढ़ी जो यहाँ पैदा हुई लेकिन आज भी अपने पूर्वजों की पीड़ा को भूला नहीं पाई हैं। वे उस दर्द को कहानी, उपन्यास, कविता, गीत आदि माध्यमों द्वारा व्यक्त कर रहे हैं।


संदर्भ ग्रंथ

1.नरेश चंद. 2022. ‘गिरमिट गाथा- गिरमिटिया को श्रद्धांजलि (भाग 2)’

नरेश चंद. 20 मई 2022. (साक्षात्कार) लौतोका, फीजी।
अभिमन्यु अनत. वह अनजान आदमी. https://www.hindiadda.com/vah-anajaan-aadami-poem/
विनोद कुमार. 2017. प्रवासियों का सतत जीवन-संघर्ष और सृजना की गुणवत्ता https://www.setumag.com/2017/04/Research-article-Dr-Vinod-Kumar-Hindi-April.html

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