हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

उलहना

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

कहो तो यह कैसी है रीति?
तुम विश्वम्भर हो, ऐसी,
तो होतो नहीं प्रतीति॥

जन्म लिया बन्दीगृह में
क्या और नहीं था धाम?
काला तुमको कितना प्रिय है,
रखा कृष्ण ही नाम॥

पुत्र कहाये तो ग्वाले के,
बने रहे गोपाल।
मणि मुक्ता सब छोड़,
गले में पहने क्या बनमाल॥

चोर बने मक्खन के,
दुनिया हँसती आज तमाम।
जहाँ देखता, वहाँ तुम्हारा
टेढ़ा, ही है काम॥

टेढ़ा मुकुट, खड़े रहना भी
टेढ़ा, टेढ़ी दृष्टि।
टेढ़ेपन की, नाथ, हुई है-
तुम से जग में सृष्टि॥

-पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश