हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

मन की आँखें खोल

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 सुदर्शन | Sudershan

बाबा, मन की आँखें खोल!
दुनिया क्या है खेल-तमाशा,
चार दिनों की झूठी आशा,
पल में तोला, पल में माशा,
ज्ञान-तराजू लेके हाथ में---
तोल सके तो तोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

झूठे हैं सब दुनियावाले,
तन के उजले मनके काले,
इनसे अपना आप बचा ले,
रीत कहाँ की प्रीत कहाँ की---
कैसा प्रेम-किलोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

नींद में माल गँवा बैठेगा,
मन की जोत बुझा बैठेगा,
अपना आप लुटा बैठेगा,
दो दिन की दुनिया में प्यारे--
पल पल है अनमोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

मतलब की यह दुनियादारी,
मतलब के सारे संसारी,
तेरा जग में को हितकारी?
तन-मन का सब ज़ोर लगाकर---
नाम हरी का बोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

-सुदर्शन

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