कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।

माँ अमर होती है, माँ मरा नहीं करती

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 आराधना झा श्रीवास्तव

माँ अमर होती है,
माँ मरा नहीं करती।
माँ जीवित रखती है
पीढ़ी दर पीढ़ी
परिवार, परंपरा, प्रेम और
पारस्परिकता के उस भाव को
जो समाज को गतिशील रखता है
उससे पहिए को खींच निकालता है
परिस्थिति की दलदल से बाहर।

माँ ममता का बीजारोपण करती
अनुवांशिकी के धागों में
अमृत की धारा बनकर
प्रवाहित होती रहती धमनियों में
उनमें सतत भरती रहती तरलता।
माँ आँखों का पानी बनकर
भर देती हृदय में कोमलता
और भर देती धरती की कोख में
जीवन-संस्कारों की उर्वरता।
इस उर्वर धरा पर लहलहा उठती
सभ्यता की नई पौध
जिस पर संस्कृतियों का
सदाबहार सुमन है खिलता
जो सदियों तक मानव मन को
सुगंधित और सुवासित करता रहता।

माँ मन में भरती जिजीविषा
भाल पर सजाकर
अपने नेह का कुमकुम
जिसमें दमकती है
उसके शौर्य की लाली
सीमाओं से खिंचते काजल से लगाती
अपने असीमित आशीष का टीका
जो कवच बनकर बचाती है
नियति के क्रूर प्रहार से।

जीवन के कुरुक्षेत्र में
अपनी इकहरी काया में
अभिमन्यु सा साहस और
अनंत योद्धाओं सा बल लिए
माँ अनवरत लड़ती रहती है
चुनौतियों से और चिंताओं से
जो उसे अपनी संतति से
कभी पृथक नहीं होने देती।

समय के हल के प्रहार को सहती
माँ धरती बन धैर्य से धारण करती
जीवन की वह नन्हीं कोंपल
जिनमें अंतस्थ होती अनंत संभावनाएँ
और भावनाओं का अनुपम विस्तार।

माँ फैला देती है आकाश का आँचल
धरती की तपती रग पर
रखती है मेघ के उजले फाहे
कोरों से बहने लगती है करुणा
और तृप्त हो जाता वसुंधरा का आकुल मन।

माँ आकाश की ऊँचाइयों से
अपलक देखती रहती है
तप, त्याग और श्रम से सिंचिंत
अपने सृजन का संसार
स्वयं की अमरता का बोध
भर देता माँ को आत्मिक संतोष से
होने और न होने से परे
माँ सृष्टि की समग्रता है
जो अनंत आकाशगंगाओं में
सजा रही है जीवन के कई रुप
क्योंकि माँ अमर होती है
माँ मरा नहीं करती।

-आराधना झा श्रीवास्तव
  सिंगापुर

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