हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

विक्रमादित्य का न्याय

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

विक्रमादित्य का राज था। उनके एक नगर में जुआ खेलना वर्जित था। एक बार तीन व्यक्तियों ने यह अपराध किया तो राजा विक्रमादित्य ने तीनों को अलग-अलग सज़ा दी। एक को केवल उलाहना देते हुए, इतना ही कहा कि तुम जैसे भले आदमी को ऐसी हरकत शोभा नहीं देती। दूसरे को कुछ भला-बुरा कहा, और थोड़ा झिड़का। तीसरे का मुँह काला करवाकर गधे पर सवार करवा, नगर भर में फिराया।

एक दरबारी ने महाराज के न्याय का आधार जानने की विनती की, "महाराज! एक ही अपराध का दंड कम-ज्यादा क्यों? अपराध तो तीनों ने एक-सा किया है।"

राजा विक्रमादित्य ने दरबारी को तीनों की खोज़-ख़बर लेने को कहा। जानकारी मिली कि पहले आदमी, जिसे राजा ने केवल उलाहना दिया था, उसने शर्म के मारे फाँसी लगाकर अपनी जान दे दी। दूसरा आदमी, जिसे झिड़का गया था, वह नगर छोड़कर वन को चला गया। कुछ गाँव वालों का कहना था, वह अब घरबार छोड़ साधू हो गया। मगर तीसरा आदमी, जिसका नगर भर में जुलूस निकाला गया था, वह अब भी शराब के नशे में जुआ खेलता देखा गया।

विक्रमादित्य ने अपराधियों की प्रकृति को पहचान ही उनका दण्ड निर्धारित किया था।

-रोहित कुमार 'हैप्पी'

 
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