कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।

ज़िंदगी

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 राजगोपाल सिंह

ज़िंदगी इक ट्रेन है
और ये संसार
भागते हुए चित्रों की
एक एल्बम

- राजगोपाल सिंह

Back
 
Post Comment
 
 

भारत-दर्शन रोजाना

Bharat-Darshan Rozana

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें