साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

कबीरा क्यों खड़ा बाजार

 (विविध) 
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रचनाकार:

 प्रेम जनमेजय

संपादक ने फोन पर कहा- कबीरा खड़ा बाजार में।

मैने पूछा – मॉस्क के साथ या बिना मॉस्क के?

संपादक कबीरी शैली में बोला-कबीर ने तो दूसरों के मास्क उतारे हैं, वो क्यों मॉस्क लगाए?

मैं भी कबीरी शैली में बोला-

डाकू मंत्री दोउ खड़े संसद में मुस्काएं।

बलिहारी संत्री आपनो जिन कबीरा चालान काटवाए।

– कबीर  का चालान कौन काट सकता है?

-वही जिनके कबीर ने मॉस्क उतारे हैं।

– हे लेखक तुम भी मॉस्कधारी हो गए? लगता है तुम भी कोरोनाईटर हो गए हैं। हे गंधारीय! तुमने कोरोना लेखन की पट्टी जबरन बांध ली है। या फिर न्यायालाय के गवाह की तरह कसम खा ली है कि जो भी लिखूंगा कोराना लिखूंगा और कोराना के इलावा कुछ नहीं लिखूंगा।

मैंने कहा-सुनो संपादक! इन दिनों साहित्य में कोरोना लेखन की दौड़ चल रही है। इस दौड़ में जो पिछड़ेगा वो कोरोना युगीन साहित्यकार कहलाने से वंचित रहे जाएगा। ऐसा लेखक अपने समय को न पढ़ पाने के कारण निंदित होगा। कोर्स में उसकी किताब नहीं लगेगी, उसपर शोध नहीं होगा। और फिर  व्यंग्यकार का तो धर्म है कि जैसे ही कोई सामयिक विषय मिले, उसपर पिल जाए, कूट कूट कर उसका भूसा बना दे।

संपादक ने कहा- पर मुझे भूसा नहीं चाहिए। मुझे कबीर चाहिए। मुझे कबीर की चिंता चाहिए। मुझे इस विषय पर अंक निकालना है । नहीं लिख सकते तो…

मैं देश की अर्थव्यवस्था की तरह हकलाया — हे माई बाप संपादक! आप जो कहें लिख सकता हूं। आप बाएं हाथ से कहे तो बाएं से लिख दूं और दाएं से कहें तो दाएं से लिख दूं। आप कहें तो बीच वाला लेखन भी कर सकता हूं….

— तो बताओ कबीरा काहे खड़ा बाजार

— हे संपादक, कुछ संकेत करें आपने कुछ तो सोचा होगा…

– बहुत कुछ सोचा है।

– तो बताएं कि क्या सोचा है?

– वो सब मैं अपने संपादकीय में लिखूंगा, तुम तो बस व्यंग्य लिख दो, जल्दी।

हर संपादक जल्दी में ही होता है। कबीर सुखी थे कि उनके समय में प्रकाशक और संपादक नहीं थे। शायद इसलिए कबीर ‘आंखन देखी कह लेते थे। शायद इसलिए कबीर को लताड़ने के लिए सोचना नहीं पड़ता था कि जिसे वो लताड़ रहे हैं वो किस धर्म या जाति का है। कबीर को कोई चुनाव नहीं लड़ना होता था। न ही कबीर को ब्लक परचेज में अपनी पुस्तक बिकवानी होती थी। वे तो उलटबांसियों  रचते थे… न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर वाली पर उलटबांसियां ।

मैंने आत्मसमर्पण किया – जो आज्ञा मित्र संपादक!

पर मन में उठे प्रश्न आज्ञा नही दे रहे थे।

संपादक को इस विषय पर अंक निकालने की जल्दी क्या है?  कहीं ऐसा तो नहीं कि इसका संबंध आने वाले चुनाव से हो। चुनाव आते हैं हर धर्म के ईश्वर याद आते हैं।  पहले गांधी जैसे महापुरुष याद आते थे आजकल धार्मिक महापुरुष याद आते हैं। हर धर्म के धर्मात्मा याद आते हैं। कबीर भी याद आते हैं। कबीर पंथियों से वोट चाहिए हो तो कबीर याद आते हैं।कबीर का ‘ न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ याद आता है।

पर कबीर तो ऐसे नहीं थे। वो किसी भी युग में आएं, चुनाव तो कम से कम नहीं लड़ेंगे। हां चुनाव लड़ने वाले का पर्दाफाश जरूर कर सकते हैं। कबीर के अनुयायी तो चुनाव के लिए बाजार में खड़े हो सकते हैं पर कबीर चुनाव के लिए बाजार में खड़े नहीं हो सकते हैं।

संपादक का कहना है कि कबीर बाजार में खड़ा है और मेरा सोचना है कि क्यां खड़ा है ?

मैं सोचने लगा।मैं केवल सोच सकता हूं।मैं कबीर नहीं हूं। मैं बस आधा कबीर हूं। कबीर बिना मसि कागद के आपनी बात कहते थे। मैं मोबाईली लेखक हूं। कबीर के हाथ में मुराड़ा था मेरे पास घर है जिसके जलने से मैं डरता हूं।

कबीर  के समय में लोग, बाजार में बस सौदा लेने जाते थे। वो बाजार में खड़े नहीं होते थे। उन दिनों बाजार खरीदने के लिए होता था खड़े होने के लिए नहीं। उन दिनो लोग खड़े-खड़े बतियाते भी नहीं थे। बतियाने के लिए उनके पास चौपाल होती थी। उन दिनों बाजार सुंदर भी नहीं होता था कि खड़े होकर भकुवे -सा उसे देखने लग जाओ। बाजार लुभाने के लिए भी नहीं होता था। बाजार सजता नहीं था। अस्त-व्यस्त बालों और वेश भूषा वाला पुरुष दूकानदार अपनी आत्मीयता से आपके जेब का पैसा खींचता था। दुकान मे ए सी, नहीं और पंखा भी अपनी मर्जी का मालिकं होता। जरूरतें कम होती थीं इसलिए जरूरत की हर चीज मिल जाती थी। लाईन भी नहीं लगानी पड़ती थी। खरीदने और बेचने वाला एक दूसरे को जानता था। एक दूसरे के हाल-चाल पूछने का समय होता था।

आज तो  बड़े-बड़े सजे-धजे मॉल हैं। जिस शोरूम के आगे चाहें, खड़े होकर नारी के अंग- अंग की आप शोभा निहार सकते हैं– सवस्त्र नारी, कम वस्त्र नारी और …।  बाजार में सजी धजी नव यौवनाएं बाजार की शोभा बढ़ाती हैं। जो कुछ भी नहीं  खरीदना चहता वह भी खरीददार बन जाता है। दुकाने शोरूम हो गई हैं। इस शोरूम में पुरुष दुकानदार कम मिलते हैं, सजी -धजी मनमोहक मुस्कान बिखेरती नवुयवतियां अधिक होती हैं। इन सबका लक्ष्य बाजार को लुभावना बनाना होता है। कुछ नौजवान अधिक लुभ जाते हैं तो दुष्कर्म हो जाता है।

इस बाजार में तो आप तो घंटो खड़े रह सकते हैं। पर क्या इस बाजार में कबीर एक पल भी खड़े रह सकते थे?

पर संपादक ने तो कबीर को बाजार में खड़ा कर दिया है। संपादक चुनौती भी दे रहा है कि हे लेखक ! बता कबीर बाजार में क्यों खड़े हैं और क्या कर रहे है ? संपादक बेताल बन कह रहा है कि तूं यदि मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं देगा तो तेरा लेखन टुकड़े – टुकड़े हो जाएगा। इधर मेरा समय मुझे डरा रहा है कि यदि तूने कबीर के बारे में कुछ कहा तो तेरा सर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। कबीर सार्वजनिक रूप से सवाल दाग सकते थे पर आज क्या कबीर पर सवाल दागे जा सकते सकते हैं? मैं कायर लेखक हूं इसलिए कबीर पर कुछ भी कहने से डरता हूं। कबीर पर तो कोई कबीर ही कुछ कह सकता है।

कबीर बाजार में सार्वजनिक रूप से खड़े हैं पर मैं सार्वजनिक कुछ नहीं कह सकता।

मैंने कबीर को क्लास में पढा और पढ़ाया है। क्लास में कबीर क्या तुलसी सूर आदि किसी को भी पढ़ना-पढ़ाना सुरक्षित कर्म होता है। हमारे समय में पढ़ना और पढ़ाना दोनो सुरक्षित कर्म होते थे। क्लास में सवाल पूछने के खतरे कम थे। मास्टर जी अधिक से अधिक मुर्गा बनाते थे या बेंत मारते थे। उन दिनों पिटना एक सांस्कृतिक कर्म था। स्कूल में पिटना मास्टर के मूड पर निर्भर करता था। मास्टर जी का मूड पीटने का है तो पिटना ही पड़ता था। गलत सवाल करो तो पिटो सही करो तो भी। घर में जाकर मास्टर की शिकायत करो तो बाप से पिटो- तूने ही कुछ किया होगा।

पीटने की संस्कृति आज भी फल फूल रही है। आप कमजोर हैं तो किसी भी चौराहे पर पिट सकते हैं। चौराहे पे पिटने की शिकायत माई -बाप थोनदार से करेंगें तो वहां पिटेंगे। वैसे आजकल तो पुलिसवाले भी सरेआम पिट रहे हैं, बेचारे, मास्टर की औकात क्या है! केवल पिट जायें तो जान बची और लाखों पाते हैं।

मैंने जिनको कॉलेज में पढ़ाया है वे मेरी ओर ऐसे घूर के देखा करते थे कि मास्टर हिम्मत है तो हमें पढ़ा के  दिखा। मैंने जिनको कबीर पढ़ाया उनको कबीर से मतलब नहीं होता था। उन्हें तो मतलब होता था कि इक्जाम में कौन- सा क्योशचन आएगा और उन्हें कितने नंबर मिलेंगें।

बाजार को जितना नई पीढ़ी जानती है उतना संपादक या मैं नहीं जानते। इसलिए कबीर के दोहे को पढ़ाने मैं अपनी क्लास में चला गया। बच्चों पर पढ़ाई का अधिक बोझ न पढे इसलिए मैंने दोहे की पहली पंक्ति पढ़ी-कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर ।

मैंने पूछा- कोई बता सकता है कि कबीर कहां खड़ा है और क्या मांग रहा है। बहुत ईजी है। इसी दोहे में मीनिंग छुपा हुआ है।’

क्लास में सांप नहीं था पर सबको सूंघ गया।

मैंने छात्रा से पूछा- यू टेल मी कबीर बाजार में क्यों खड़ा है?

उसने कधे उचकाए और बोली -हाऊ कुड आई नो ? आई एम नॉट कबीरा। आई एम सायना। एंड ये रेलेवेन्ट क्योश्चन नहीं है। 500 ईयर बिफोर कबीरा मार्केट में क्यों खड़ा था ? रिडिकल्यूस… दिस इज आउट ऑफ कोर्स हैं। किसी हेल्प बुक में नहीं मिलता है। हा हा, व्हाई कबीरा स्टैंडिंग इन बाजार। वॉज देयर ए बिग बाजार ….

इस बार क्लास ने हा हा किया।

मैंने क्लास के ब्रिलियंट लड़के से पूछा – यू… तुम बताओ।

– यस सर! यू नो …कबीर इज थोड़ा कन्फयूजड । वो मार्केट में स्टैंड है। या तो गर्ल फ्रेंड का वेट कर रहा है… या एनी टाईप ऑफ सेल का…। वो सेलर नहीं है बॉयर है, मांग रहा है। मार्केट में सेल लगा है… एंड … एंड उसके पास क्रेडिट कार्ड नहीं है… वो सबसे खैर… खैर… खैरात, खैरात  मांग रहा है। एंड सर उसको खैरात नहीं मिलता तो वो कबीरा हो जाता है। आपने ‘हेरा फेरी’ मूवी देखा होगा। क्या धांसू आवाज में बोलता है- हैलो, कबीरा स्पीकिंग।’’ एंड उसका डॉयलाग- तेरी पोती के छोटे-छोटे टुकड़े करके कुत्तों को डाल दूंगा।’ क्लास के लड़के -लड़कियां इस डॉयलाग डिलिवरी पर ताली बजाते हैं।

अब आप समझ गए होंगें कि हिंदी पढ़ाने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान क्यों आवश्यक है। नौजवान पीढ़ी को आप इसी भाषा के द्वारा समझ सकते हो।

नौजवान पीढ़ी बाजार में खड़ी नहीं होती है। इसके पास इतना समय ही नहीं है। वो तो सीधा लक्ष्य साधती है। नेट पर सर्च किया, शोरूम में घुसे, बाप के क्रेडिट कार्ड से खरीदा, कैब पकड़ी और डेट पर निकल गए।

कबीर के समय बाजार खुले में लगता था पर खुला बाजार नहीं था। आज खुला बाजार है पर वो चारदिवारी में बंद, एयरकंडिशंड मॉल में लगता है।

तो हे सपांदक! कबीर को बाजार में मत खड़ा करें। कबीरों को नाहक परेशान मत करें। ये बाजार कबीर जैसों के लिए नहीं बना है। बाजार जो चाहता है वो ले लेता है। वो मंगता नहीं है इसलिए मांगता नहीं है। मंगते तो आप हैं। बाजार सबकी खैर भी नहीं मांगता है, केवल अपनी खैर चाहता है।

हे संपादक!  इस बाजार में यदि कबीर अधिक देर रहे तो उसकी खैर नही, मांगनी पड़ेगी।

-प्रेम जनमेजय

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