समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर

देशभक्त

 (विविध) 
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रचनाकार:

 नरेन्द्र कोहली

रामलुभाया बहुत जल्दी में था। मैं उसे पुकारता रहा और वह मुझ से भागता रहा। अंततः मैंने दौड़ कर उस को पकड़ ही लिया।

‘‘क्या बात है रामलुभाया ?’’

‘‘वह अपनी क्रिकेट की टीम आ रही है न। उन का स्वागत करने मैं एयरपोर्ट जा रहा हूँ।’’

‘‘हवाई अड्डा नहीं कह सकते, एयरपोर्ट के बच्चे।’’

‘‘कहने को तो मैं विमान पत्तन भी कह सकता हूँ, पर दैट इज़ नॉट फैशनेबल।’’ वह बोला।

‘‘पर मुझ से क्यों भाग रहे हो ? ’’

‘‘तुम्हारे पास खड़ा हो गया तो तुम मुझे देर करा दोगे।’’ वह बोला।

‘‘कैसे कह सकते हो कि मैं तुम्हें देर करा ही दूंगा ?’’ मैंने पूछा।

‘‘मैं तुम्हें जानता नहीं क्या।’’ उस ने एक उपेक्षा भरी दृष्टि मुझ पर डाली, ‘‘तुम मुझे कारगिल के समाचार सुनाने लगोगे।’’

‘‘तो क्या बुराई है इस में ?’’ मैं ने कहा, ‘‘कारगिल में इस समय हमारे सैनिक अपने प्राणों पर खेल रहे हैं। हमें उन का ध्यान होना चाहिए। हमें उन से प्यार होना चाहिए। हमें उन पर गर्व होना चाहिए।’’

‘‘यही बात मैं अपने खिलाड़ियों के विषय में भी कह सकता हूँ।’’ रामलुभाया ने बहुत वक्र होकर कहा, ‘‘हमें अपने खिलाड़ियों से प्रेम होना चाहिए। हमें उन पर गर्व होना चाहिए। हमारा ध्यान उन में लगा होना चाहिए। वे देश के गौरव की रक्षा करते हैं।’’

‘‘हाँ। कभी कभी करते हैं।’’ मैं ने कहा, ‘‘तुम कह सकते हो, कभी कभी शहीद भी हो जाते हैं।’’

‘‘और क्या!’’ वह इठला कर बोला, ‘‘ कभी कभी शहीद भी हो जाते हैं। आफ्टर ऑल दैट इज़ पार्ट ऑफ द गेम।’’

‘‘देखो रामलुभाया! मैं अपने देश के खिलाड़ियों का विरोधी नहीं हूँ।’’ मैंने कहा, ‘‘पर तुम्हारी प्राथमिकताएं मुझे बहुत कष्ट दे रही हैं।’’

‘‘क्यों? देश के लिए क्या सैनिक ही आवश्यक हैं, खिलाड़ी आवश्यक नहीं हैं। कलाकार और अभिनेता आवश्यक नहीं हैं ?’’ वह इतना उत्तेजित हो गया था कि मुझे लगा, उसे दिल का दौरा भी पड़ सकता था, ‘‘ तुम सब को एक ही सांचे में ढाल देना चाहते हो। अपने विचारों को सब पर आरोपित करना चाहते हो। किसी की हँसी खुशी तुम से देखी नहीं जाती।’’

‘‘शांत हो रामलुभाया!’’ मैंने कहा, ‘‘ मैं देश की हँसी खुशी के लिए ही चिंतित हूँ, इसीलिए चाहता हूँ कि तुम्हारा और तुम्हारे जैसे खिलंदड़े लोगों का थोड़ा ध्यान देश की सीमाओं की ओर भी रहे। देश के रक्षकों की ओर रहे। वे सीमा पर अपना रक्त बहा रहे हैं, इसीलिए हम सब की हँसी खुशी सुरक्षित है।’’

‘‘तुम ने देखा नहीं कि जब हमारी टीम जीतती है तो हमारे देश को कितनी प्रसन्नता होती है।’’ उस ने मुझे आंखें दिखाईं।

‘‘वह भी देखता हूँ।’’ मैंने कहा, ‘‘ सैनिक विजय दिलाता है तो एक प्रकार का गर्व होता है। सैनिक शहीद होता है तो देश का एक रक्षक जाता है। देश के लिए लड़ने वाला एक योद्धा कम होता है। तब भी वह अपने परिवार, समाज और देश के गर्व का कारण होता है। तुम्हारे खिलाड़ी शहीद होते हैं तो भी धन की बड़ी बड़ी राशियां पाते है ; और अगली बार फिर शहीद होने के लिए मैदान में उपस्थित हो जाते हैं।’’

‘‘फिर भी शहीद तो होते ही हैं।’’ वह मुस्कराया।

‘‘हाँ! शहीद होते हैं तो सारा देश पूछता है कि कितनी पैसे लिए शहीद होने के ?’’ मैं बोला, ‘‘इस से देश का गौरव बढ़ता है?’’

‘‘क्यों नहीं बढ़ता।’’ वह अपना हठवाद ले कर बैठ गया।

‘‘हाँ! जब वे लाखों रुपए ले कर विदेशी कंपनियों के शर्बत और शराब बेचते हैं। उन के दंत मंजन और क्षौर लेप बेचते हैं, तो देश अपने गौरव से झूम झूम जाता है। क्यों ?’’
‘‘तुम तो अपने देश के कलाकारों के विषय में भी यही कहो गे। हमारी मुंबई की फिल्में ...।’’

‘‘मुंबई की फिल्में हैं कहां ?’’ मैंने उसे बात पूरी नहीं करने दी, ‘‘वह तो बॉलीवूड है। उसी से पता चल जाता है कि उन्हें अपने देश पर कितना गर्व है। विदेशों का सारा कूड़ा परौस रहे हैं वे हमारे देश की जनता को। प्रेम के स्थान पर वासना, शालीनता के स्थान पर नंगई। विदेशी कंपनियों के साबुन, तेल और सुगंधों को बेचने के लिए उन्हें कपड़े उतारते देख कर देश भक्ति ही जागती होगी तुम्हारी ?’’

‘‘देश भक्ति की फिल्में भी तो बनती हैं।’’ वह बोला।

‘‘बनती हैं कभी कभी। सौ में से एक।’’ मैंने कहा, ‘‘किंतु वे क्या भाषा दे रहे हैं। कैसे कपड़े पहना रहे हैं। किस प्रकार आलिंगन और चुंबन की खेती करा रहे हैं। वे देश भक्ति नहीं वासना और व्यसन की फसल उगा रहे हैं। उन पर गर्व है तुम को और जो देशभक्त तुम्हारे जैसे राष्ट्रवादियों की रक्षा के लिए अपना रक्त बहा रहे हैं, उन की ओर ध्यान देने का भी समय नहीं है तुम्हारे पास।’’

‘‘दोस्त !’’ वह बोला, ‘‘तुमसे नहीं निभेगी हमारी।’’ उस ने घड़ी देखी, ‘‘अरे देर हो गई। प्लेन तो लैंड भी कर गया होगा।’’ ( 15. 6. 1999 )

- नरेन्द्र कोहली, 175, वैशाली, पीतमपुरा, दिल्ली 110034

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