परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।

नमन करें इस देश को

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 सुब्रह्मण्य भारती | Subramania Bharati

इसी देश में मातु-पिता जनमे पाए आनंद अपार,
और हजारों बरसों तक पूर्वज भी जीते रहे--
अमित भाव फूले-फले जिनके चिंतन में यहीं।
मुक्त कंठ से वंदना और प्रशंसा हम करें--
कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को ॥1॥

इसी देश में जीवन पाया, हमको बौद्धिक शक्ति मिली,
माताओं ने सुख लूटा है, जीवन का वात्सल्य भरे--
मोद मनाया है यहीं जुन्हाई में हंसकर क्वाँरेपन का।
घाटों पर, नदियों के पोखर के क्रीड़ाओं की आनंदभरी
कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥2॥

गार्हस्थ्य को यहाँ नारियों ने पल्लवित किया है,
गले लगाया है जनकर सोने के-से बेटों को--
भरे पड़े हैं नभचुंबी देवालय भी इस देश में।
निज पितरों की अस्थियाँ इस माटी में मिल गईं-
कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥3॥
मूल शीर्षक : 'नाट्टु वणक्कम्‌'

-सुब्रह्मण्य भारती

(साभार : सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं एवं पांचाली शपथम् )
विशेष टिप्पणी : यह रचना भारती की तमिल रचना 'नाट्टु वणक्कम्' का हिंदी रूपांतर है।

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