जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

एक दीया मस्तिष्क में जलाएं

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 दीपा शर्मा | फीजी

आजकल हर समय विचारों के झंझावात चलते रहते हैं
सही गलत का नहीं पता कुछ, बस यह यूं ही बढ़ते रहते हैं 
कभी किसी बात में होता चिंतन किसी ने मनन 
यह यूं ही चलता रहा,  समय हर क्षण। 

कितनी गहन मशीनरी है, यह मस्तिष्क हमारा
कितनी अनमोल रचना है,  प्रदत प्रभु द्वारा
इसके जैसी ना मानव बना पाएगा, कोई कृत्रिम मशीन
यह हर वक्त ही चलती रहती, होकर तल्लीन। 

कभी कुछ अच्छा सोचते, कभी बुरा हम
फिर भी कोशिश करते खुद को, रखकर हरा-भरा हम 
जब बुरा मन में आता तो हर चीज निफरान लगती
मगर अच्छाई के आवेग में निर्जीव में भी जान लगती। 
बुरे में किसी की छोटी सी बात भी सौ-सी चुभती 
मगर अच्छाई में दिल बलिया उछलकर हर खुशी को चुनती 
मित्रों यह खेल दिमाग का ऐसा है जैसे शतरंज की हर चाल
जो ना समझा वह मूर्ख है और जो जाना उसके लिए शह और मात |

यह हमारे हाथों में है इसका प्रयोग कैसे करें हम सृजन या विध्वंस
सृजन रचनात्मकता और अच्छाई को जन्म देती है
जबकि विध्वंस नकारात्मकता की चादर ओढ़ हर उजाले को हर लेती है
ऐसे में सृजनात्मकता और आशावादी सोच को जिंदा रखना होगा
तभी मानवता का भला और कल्याण होगा। 

प्रकृति के दिए इस खजाने को सहेज कर नव रूप प्रदान करें 
आओ मिलकर सृजनात्मकता को जीवन में जगह दे नई पहल करें
इस जग को सुंदर बना मानवता का सच्चा धर्म निभाएं 
आओ नफरत मिटा एक दूसरे को गले लगाए। 

 जीवन की इस चक्की में मानवता का सच्चा अर्थ समझाएं
 भावार्थ में न जाकर सारांश में समझाएं
 सकारात्मकता का एक दीया चलो आज अपने मस्तिष्क में जलाएं। 

- दीपा शर्मा, फीजी
  ईमेल: dipa.9nov@gmail.com

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