जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी

 (बाल-साहित्य ) 
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रचनाकार:

 द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी
गुड़िया खूब सजाई।
किस गुड्डे के साथ हुई तय
इसकी आज सगाई?

मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी
कौन खुशी की बात है!
आज तुम्हारी गुड़िया प्यारी
की क्या चढ़ी बरात है?

मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी
गुड़िया गले लगाए
आँखों से यों आँसू ये क्यों
रह-रह बह-बह जाए!

मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी
क्यों ऐसा यह हाल है?
आज तुम्हारी गुड़िया प्यारी
जाती क्या ससुराल है!

-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 

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