यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

देश पीड़ित कब तक रहेगा

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 डॉ रमेश पोखरियाल निशंक

अगर देश आँसू बहाता रहा तो,
ये संसार सोचो हमें क्या कहेगा?
नहीं स्वार्थ को हमने त्यागा कहीं तो
निर्दोष ये रक्त बहता रहेगा,
ये शोषक हैं सारे नहीं लाल मेरे
चमन तुमको हर वक़्त कहता रहेगा।
अगर इस धरा पर लहू फिर बहा तो
ये निश्चित तुम्हारा लहू ही बहेगा,
अगर देश आँसू बहाता रहा तो,
ये संसार सोचो हमें क्या कहेगा?
अगर देश को हमसे मिल कुछ न पाया
तो बेकार है फिर ये जीवन हमारा,
पशु की तरह हम जिए तो जिए क्या
थूकेगा हम पर तो संसार सारा।
जतन कुछ तो कर लो, सँभालो स्वयं को
भला देश पीड़ा यों कब तक सहेगा,
अगर देश आँसू बहाता रहा तो,
ये संसार सोचो हमें क्या कहेगा?
यौवन तो वो है खिले फूल-सा जो
चमन पर रहे, कंटकों में महकता,
शूलों से ताड़ित रहे जो सदा ही
समर्पित चमन पर रहे जो चमकता।
अँधेरा धरा पर कहीं भी रहे तो
ये जल-जल स्वयं ही सवेरा करेगा,
अगर देश आँसू बहाता रहा तो,
ये संसार सोचो हमें क्या कहेगा?
आँसू बहाए चमन, तुम हँसे तो
ये समझो कि जीवन में रोते रहोगे,
बलिदान देकर जो पाया वतन है
उसे भी सतत यों ही खोते रहोगे।
अगर ज्योति बनकर नहीं झिलमिलाए
तो धरती में जन-जन सिसकता रहेगा,
अगर देश आँसू बहाता रहा तो,
ये संसार सोचो हमें क्या कहेगा?

-रमेश पोखरियाल ‘निशंक'
    [मातृभूमि के लिए]

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