मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।

काँटों की गोदी में

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 डॉ रमेश पोखरियाल निशंक

काँटों की शैया में जिसने
कोमलता को छोड़ा ना,
चुभन पल-पल होने पर भी
साहस जिसने तोड़ा ना।

जो विकसित संघर्ष में होता
काँटों से लोरी सुनता,
धैर्य सदा ही मन में रखता
नहीं विपदा से वह डरता।

पास आ मुझे कहता वो
जीवन में हर कष्ट सहो,
संकट की इन घड़ियों में
आगे बढ़ते सदा रहो।

- रमेश पोखरियाल 'निशंक'
   [ मातृभूमि के लिए ]

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश