राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

नेता

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

नेता ! नेता ! नेता !

क्या चाहिए तुझे रे मूरख !
सखा ? बन्धु ? सहचर ? अनुरागी ?
या जो तुझको नचा-नचा मारे
वह हृदय-विजेता ?
नेता ! नेता ! नेता !

मरे हुओं की याद भले कर,
किस्मत से फरियाद भले कर,
मगर, राम या कृष्ण लौट कर
फिर न तुझे मिलनेवाले हैं ।
टूट चुकी है कडी,
एक तू ही उसको पहने बैठा है ।
पूजा के ये फूल फेंक दे,
अब देवता नहीं होते हैं ।
बीत चुके हैं सतयुग-द्वापर,
बीत चुका है त्रेता ।
नेता ! नेता ! नेता !

नेता का अब नाम नहीं ले,
अंधेपन से काम नहीं ले,
हवा देश की बदल गयी है;
चाँद और सूरज, ये भी अब
छिपकर नोट जमा करते हैं ।
और जानता नहीं अभागे,
मन्दिर का देवता चोर-बाजारी में पकड़ा जाता है ?
फूल इसे पहनायेगा तू ?
अपना हाथ घिनायेगा तू ?

उठ मन्दिर के दरवाजे से,
जोर लगा खेतों में अपने,
नेता नहीं, भुजा करती है
सत्य सदा जीवन के सपने ।
पूजे अगर खेत के ढेले
तो सचमुच, कुछ पा जायेगा,
भीख याकि वरदान माँगता
पड़ा रहा तो पछतायेगा ।
इन ढेलों को तोड़,
भाग्य इनसे तेरा जगनेवाला है ।
नेताओं का मोह मूढ़ !
केवल तुमको ठगनेवाला है ।
लगा जोर अपने भविष्य का बन तू आप प्रणेता ।
नेता ! नेता ! नेता !

(1952)

- रामधारी सिंह 'दिनकर'

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश