इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।

आ जा सुर में सुर मिला

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 विजय कुमार सिंह | ऑस्ट्रेलिया

आ जा सुर में सुर मिला ले, यह मेरा ही गीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।
सुर में सुर मिल जाए इतना, सुर अकेला न रहे,
मैं भी मेरा न रहूँ और, तू भी तेरा न रहे,
धड़कनों के साथ सजता, राग का संगीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।

नीले-नीले इस गगन में, पंख धर कर उड़ चलें,
चल कहीं पतझड़ में हम तुम, पुष्प बनकर खिल उठे,
जो है खोता वो ही पाता, यह सदा की रीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।
सूने-सूने से पलों को, सुर-सुरभि से भर ज़रा,
साथ अपने हर-इक मन को, छंद लयमय कर ज़रा,
नेह से ही नेह पलता, प्रीत से ही प्रीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।

साथ मिल कर गाएँ ऐसे, सुर लहर लहरा उठे,
सप्त स्वर हर ओर गूँजे, हर दिशा भी गा उठे,
प्रेम का पथ है अनोखा, हार में ही जीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।

--विजय कुमार सिंह
  ऑस्ट्रेलिया

 

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश