हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

महानगर पर दोहे

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 राजगोपाल सिंह

अद्भुत है, अनमोल है, महानगर की भोर
रोज़ जगाता है हमें, कान फोड़ता शोर

अद्भुत है, अनमोल है, महानगर की शाम
लगता है कि अभी-अभी, हुआ युद्ध विश्राम

अद्भुत है अनमोल है, महानगर की रात
दूल्हा थानेदार है, चोरों की बारात

-राजगोपाल सिंह 
(1 जुलाई 1947- 6 अप्रैल 2014 )

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